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जयशंकर बोले- भारत मिडिल पावर नहीं, ‘पावर इन द मिडिल’, अपने हितों से तय करेगा नीतियां

विदेश मंत्री एस जयशंकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर संबोधन देते हुए और वैश्विक मानचित्र पर भारत का प्रभाव - News Critic

भारत की विदेश नीति और वैश्विक भूमिका को लेकर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक अहम विचार रखा है। उन्होंने भारत को केवल ‘मिडिल पावर’ मानने के बजाय ‘पावर इन द मिडिल’ बताया। इस बयान का मुख्य संदेश है कि भारत अपनी विदेश नीति किसी दूसरे देश के दबाव में नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों और परिस्थितियों के अनुसार तय करना चाहता है।

‘मिडिल पावर’ और ‘पावर इन द मिडिल’ के बीच का अंतर भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। यह दृष्टिकोण बताता है कि भारत अलग-अलग देशों और वैश्विक शक्तियों के साथ अपने संबंधों को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ाना चाहता है।

ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में क्या बोले जयशंकर?

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने यह टिप्पणी नई दिल्ली में आयोजित ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम की चर्चा के दौरान की। उनसे पूछा गया था कि भारत को ‘मिडिल पावर’ के रूप में परिभाषित किए जाने पर असहजता क्यों होती है।

जयशंकर ने कहा कि भारत को केवल मध्यम शक्ति कहना उसकी वास्तविक क्षमताओं और भविष्य की संभावनाओं को सीमित करके देखने जैसा है। उन्होंने देश की बड़ी आबादी, लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और विकास की संभावनाओं का उल्लेख किया।

उनके मुताबिक, भारत की भूमिका को समझने के लिए केवल पारंपरिक श्रेणियों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। देश की आर्थिक क्षमता, जनसंख्या, रणनीतिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उसकी भूमिका को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

इस बयान के जरिए उन्होंने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि भारत अपनी वैश्विक पहचान को किसी एक निर्धारित श्रेणी में सीमित नहीं देखता।

‘मिडिल पावर’ और ‘पावर इन द मिडिल’ में क्या अंतर है?

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ‘मिडिल पावर’ शब्द का इस्तेमाल ऐसे देशों के लिए किया जाता है, जो दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्तियों की श्रेणी में नहीं आते, लेकिन क्षेत्रीय और वैश्विक मामलों में प्रभाव डालने की क्षमता रखते हैं।

ऐसे देश अक्सर कूटनीति, व्यापार, बहुपक्षीय संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से अपनी भूमिका निभाते हैं। वे बड़ी शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखते हुए अन्य देशों के साथ भी साझेदारी विकसित करते हैं।

इसके विपरीत, ‘पावर इन द मिडिल’ कहकर जयशंकर भारत की ऐसी भूमिका पर जोर दे रहे थे, जिसमें देश अलग-अलग वैश्विक शक्तियों और समूहों के बीच अपने हितों के अनुसार निर्णय ले सके।

इस विचार का मतलब केवल दो पक्षों के बीच संतुलन बनाना नहीं है। इसमें अपने संसाधनों, आर्थिक क्षमता और कूटनीतिक प्रभाव के आधार पर अंतरराष्ट्रीय समझौते करने की क्षमता भी शामिल है।

हालांकि, ‘पावर इन द मिडिल’ कोई सर्वमान्य औपचारिक अंतरराष्ट्रीय श्रेणी नहीं है। यह जयशंकर द्वारा भारत की स्थिति और विदेश नीति के दृष्टिकोण को समझाने के लिए इस्तेमाल किया गया विचार है।

भारत अपनी विदेश नीति स्वतंत्र रूप से क्यों बनाना चाहता है?

भारत की विदेश नीति में राष्ट्रीय हितों को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। किसी भी देश के साथ संबंध तय करते समय व्यापार, सुरक्षा, ऊर्जा, तकनीक और आर्थिक विकास जैसे मुद्दों पर विचार करना पड़ता है।

जयशंकर ने कहा कि देशों को अपने हितों का आकलन स्वयं करना चाहिए। इसके बाद उन्हें अपनी नीतियां तय करके दूसरे देशों के साथ आपसी सहमति के आधार पर समझौते करने चाहिए।

इस दृष्टिकोण के तहत भारत किसी एक देश के साथ संबंधों को अपने सभी अंतरराष्ट्रीय फैसलों का आधार नहीं बनाना चाहता। अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग देशों के साथ सहयोग करना उसकी कूटनीतिक नीति का हिस्सा है।

उदाहरण के लिए, भारत किसी देश के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा सकता है, जबकि किसी दूसरे देश के साथ व्यापार, ऊर्जा या तकनीक के क्षेत्र में साझेदारी कर सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी देशों के साथ संबंध समान होंगे। प्रत्येक साझेदारी का मूल्यांकन उसके लाभ और राष्ट्रीय हितों के आधार पर किया जाता है।

बदलती वैश्विक व्यवस्था पर जयशंकर की राय

विदेश मंत्री ने कहा कि दुनिया की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में बदलाव हो रहा है। अब वैश्विक मामलों में केवल कुछ शक्तिशाली देशों की भूमिका ही निर्णायक नहीं रह गई है। विभिन्न देशों के पास मौजूद संसाधन, बाजार, तकनीकी क्षमताएं और आर्थिक संबंध भी महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं।

जयशंकर के अनुसार, आने वाले समय में देशों के बीच प्रतिस्पर्धा इस बात पर भी निर्भर करेगी कि वे दूसरे देशों के साथ बातचीत की मेज पर क्या योगदान दे सकते हैं।

कोई देश तकनीक उपलब्ध करा सकता है, तो दूसरा ऊर्जा या प्राकृतिक संसाधनों में सहयोग कर सकता है। इसी तरह, बाजार तक पहुंच, निवेश और आपूर्ति व्यवस्था भी अंतरराष्ट्रीय समझौतों का आधार बन सकते हैं।

इस व्यवस्था में देशों को अपनी क्षमताओं की पहचान करनी होगी। साथ ही, उन्हें ऐसे समझौते करने होंगे, जिनसे उनके अपने हितों को लाभ मिले और दूसरे पक्ष के साथ सहयोग भी आगे बढ़ सके।

जयशंकर ने वैश्विक बदलावों को केवल नकारात्मक नजरिए से देखने के बजाय इस प्रक्रिया को समझने पर जोर दिया।

दुनिया में बढ़ रहे हैं ‘चोक पॉइंट्स’ के खतरे

जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में बढ़ते ‘चोक पॉइंट्स’ का भी उल्लेख किया। इस शब्द का इस्तेमाल ऐसे महत्वपूर्ण संसाधनों, प्रणालियों या नेटवर्क के लिए किया जाता है, जिन पर नियंत्रण होने से दूसरे देशों पर दबाव बनाया जा सकता है।

पहले इस संदर्भ में अक्सर तेल, गैस और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे संसाधनों की चर्चा होती थी। लेकिन अब वित्तीय व्यवस्था, प्रतिबंधों और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता जैसे विषय भी इस बहस का हिस्सा हैं।

यदि किसी देश का दूसरे देश के महत्वपूर्ण संसाधनों या वित्तीय नेटवर्क पर अधिक नियंत्रण है, तो वह इस स्थिति का इस्तेमाल राजनीतिक या आर्थिक दबाव बनाने के लिए कर सकता है।

इस तरह की निर्भरता उन देशों के लिए चुनौती बन सकती है, जो अपनी आर्थिक और रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखना चाहते हैं।

भारत के लिए भी यह मुद्दा महत्वपूर्ण है। ऊर्जा आपूर्ति, महत्वपूर्ण खनिजों, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में विविध साझेदारियां बनाए रखना आर्थिक सुरक्षा के लिहाज से उपयोगी हो सकता है।

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

जयशंकर के बयान को भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के संदर्भ में समझा जा सकता है। रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब है कि भारत अपने महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और विदेश नीति संबंधी फैसले स्वतंत्र रूप से लेने की क्षमता बनाए रखना चाहता है।

इसका अर्थ सभी देशों से दूरी बनाना नहीं है। इसके बजाय, भारत अलग-अलग देशों के साथ संबंधों को अपने हितों और जरूरतों के अनुसार विकसित कर सकता है।

इसके कुछ प्रमुख पहलू हैं:

  • आर्थिक हित: व्यापार, निवेश और बाजार तक पहुंच के लिए अलग-अलग देशों के साथ समझौते करना।
  • ऊर्जा सुरक्षा: तेल, गैस और दूसरे जरूरी संसाधनों की आपूर्ति के लिए विविध विकल्प बनाए रखना।
  • रक्षा सहयोग: राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरतों के अनुसार रक्षा साझेदारियां विकसित करना।
  • तकनीकी विकास: महत्वपूर्ण तकनीकों और औद्योगिक क्षमताओं में सहयोग बढ़ाना।
  • वैश्विक कूटनीति: अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपने हितों और परिस्थितियों के अनुसार रुख तय करना।

हालांकि, स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने के साथ चुनौतियां भी जुड़ी होती हैं। देशों के बीच हितों में टकराव, व्यापारिक प्रतिबंध और सुरक्षा संबंधी मतभेद किसी भी रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए कूटनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए आर्थिक क्षमता और मजबूत अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां भी आवश्यक हैं।

क्या भारत वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ी भूमिका निभा सकता है?

भारत की बड़ी आबादी, विशाल घरेलू बाजार और आर्थिक विकास की संभावनाएं उसे अंतरराष्ट्रीय मामलों में महत्वपूर्ण स्थान देती हैं। इसके अलावा, भारत विभिन्न क्षेत्रीय और वैश्विक मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाता है।

लेकिन किसी देश की वैश्विक शक्ति केवल उसकी आबादी या अर्थव्यवस्था के आकार से तय नहीं होती। तकनीकी क्षमता, सैन्य ताकत, औद्योगिक विकास, आर्थिक स्थिरता और कूटनीतिक प्रभाव भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं।

इसलिए भारत की वैश्विक स्थिति का आकलन करते समय उसकी उपलब्धियों के साथ-साथ चुनौतियों को भी समझना जरूरी है।

जयशंकर का बयान इसी व्यापक चर्चा का हिस्सा है। वह भारत को ऐसी भूमिका में देखना चाहते हैं, जहां देश अपनी क्षमताओं के आधार पर अंतरराष्ट्रीय फैसलों और समझौतों को प्रभावित कर सके।

निष्कर्ष

विदेश मंत्री एस. जयशंकर का ‘मिडिल पावर’ के बजाय ‘पावर इन द मिडिल’ वाला बयान भारत की विदेश नीति के दृष्टिकोण को सामने रखता है। उनका कहना है कि भारत की बड़ी आबादी, आर्थिक आकार और विकास की संभावनाओं को देखते हुए उसे केवल मध्यम शक्ति की श्रेणी में सीमित करना उचित नहीं है।

उन्होंने देशों को अपने हितों का आकलन करने, स्वतंत्र नीतियां बनाने और आपसी सहमति से समझौते करने पर जोर दिया। साथ ही, वित्तीय निर्भरता, संसाधनों और प्रतिबंधों के जरिए दबाव बनाने की बढ़ती संभावनाओं को भी रेखांकित किया।

आने वाले समय में भारत की वैश्विक भूमिका इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपनी आर्थिक और रणनीतिक क्षमताओं का कितना प्रभावी इस्तेमाल करता है। जयशंकर के बयान का केंद्रीय संदेश यही है कि भारत अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अपने हितों के आधार पर फैसले लेने और वैश्विक व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है।

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