May 22, 2026

News Critic

Latest News In Hindi

बिहार में चुपचाप एनआरसी लागू करने का आरोप: ओवैसी ने चुनाव आयोग पर उठाए गंभीर सवाल

हैदराबाद से सांसद और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने बिहार में नागरिकता सत्यापन प्रक्रिया को लेकर निर्वाचन आयोग पर बड़ा आरोप लगाया है। उनका कहना है कि आयोग राज्य में चुपचाप राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) जैसी प्रक्रिया लागू कर रहा है, जिससे लाखों गरीबों के वोटिंग अधिकार खतरे में पड़ सकते हैं।

दस्तावेज़ों की मांग पर उठाए सवाल

ओवैसी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए बताया कि अब वोटर लिस्ट में नाम दर्ज करवाने के लिए आम नागरिकों को न केवल अपने जन्म से जुड़े दस्तावेज देने होंगे, बल्कि उनके माता-पिता के जन्म स्थान और जन्म तिथि के प्रमाण भी जमा कराने होंगे। उनका मानना है कि यह नियम विशेष रूप से बिहार के सीमांचल क्षेत्र के गरीब और बाढ़ प्रभावित निवासियों के खिलाफ है, जहां बड़ी आबादी के पास आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।

उन्होंने इस कदम को ‘क्रूर मजाक’ बताते हुए कहा, “सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश में महज 75% लोगों के ही जन्म का पंजीकरण होता है। ऐसे में गरीब तबके के लोगों से यह उम्मीद करना कि वे अपने माता-पिता के जन्म प्रमाण पत्र प्रस्तुत करेंगे, अनुचित और अमानवीय है।”

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

ओवैसी ने 1995 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले (लाल बाबू हुसैन बनाम निर्वाचन अधिकारी) का जिक्र करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट से बिना पर्याप्त प्रमाण के हटाना संविधान के खिलाफ है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग का यह कदम सीधे तौर पर संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए मतदान के अधिकार का उल्लंघन है।

चुनाव आयोग की नई प्रक्रिया क्या है?

निर्वाचन आयोग ने वोटर सूची में नाम जोड़ने की प्रक्रिया के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनके अनुसार:

  • जुलाई 1987 से पहले जन्मे व्यक्ति को स्वयं का जन्म प्रमाण पत्र देना होगा।
  • जुलाई 1987 से दिसंबर 2004 के बीच जन्मे लोगों को अपने साथ माता या पिता में से किसी एक का जन्म प्रमाण पत्र देना होगा।
  • दिसंबर 2004 के बाद जन्मे व्यक्तियों के लिए माता-पिता दोनों के दस्तावेज अनिवार्य कर दिए गए हैं।

घरघर जाकर जानकारी जुटाने की योजना

चुनाव आयोग ने जून-जुलाई 2025 के बीच बिहार में घर-घर जाकर नागरिकों से दस्तावेज़ इकट्ठा करने का लक्ष्य रखा है। इस प्रक्रिया के तहत लाखों परिवारों से व्यक्तिगत जानकारी और उनके पहचान से जुड़े प्रमाण मांगे जाएंगे।

ओवैसी का कहना है कि बिहार जैसे बड़े और पिछड़े राज्य में यह प्रक्रिया पारदर्शिता से कितनी लागू होगी, यह बड़ा सवाल है। उनका दावा है कि यह कदम चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है और देश के लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

गरीब और वंचित वर्ग होंगे प्रभावित?

ओवैसी ने विशेष रूप से सीमांचल और बाढ़ प्रभावित इलाकों में रह रहे लाखों लोगों के लिए चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों में शिक्षा, दस्तावेज़ और प्रशासनिक पहुंच पहले से ही कमजोर है। ऐसे में दस्तावेजों की अनिवार्यता उन लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर सकती है, जो पहले से ही सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं।

ओवैसी के इस बयान ने बिहार की सियासत और आने वाले विधानसभा चुनावों के माहौल को और गरमा दिया है। जहां एक ओर चुनाव आयोग इस प्रक्रिया को पारदर्शी और न्यायसंगत बता रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों के बीच इसे लेकर गहरी चिंता है।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *