जी7 शिखर सम्मेलन 2026: चीन की गैरमौजूदगी बनी चर्चा का केंद्र, सम्मेलन के बाहर हजारों लोगों का विरोध प्रदर्श
एवियन-ले-बैन्स (फ्रांस), 15 जून 2026। फ्रांस के खूबसूरत शहर एवियन-ले-बैन्स में शुरू हुए 52वें G7 शिखर सम्मेलन ने वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवालों को फिर से चर्चा में ला दिया है। तीन दिनों तक चलने वाले इस सम्मेलन में दुनिया की प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं के नेता एक मंच पर जुटे हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा चीन की अनुपस्थिति और सम्मेलन के खिलाफ हो रहे बड़े पैमाने के प्रदर्शनों को लेकर हो रही है।
फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन की मेजबानी में आयोजित इस सम्मेलन में अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, जापान और फ्रांस के नेताओं के साथ यूरोपीय संघ के प्रतिनिधि भी हिस्सा ले रहे हैं। वहीं भारत सहित कई देशों को विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है।
G7 में चीन क्यों नहीं है?
चीन आज दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और वैश्विक व्यापार में उसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके बावजूद वह G7 समूह का सदस्य नहीं है। इसका मुख्य कारण यह है कि G7 की स्थापना लोकतांत्रिक देशों के आर्थिक और रणनीतिक सहयोग के मंच के रूप में हुई थी, जबकि चीन की राजनीतिक व्यवस्था इससे अलग मानी जाती है।
हालांकि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में चीन को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। इलेक्ट्रिक वाहनों, स्टील उत्पादन, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और वैश्विक सप्लाई चेन में चीन की मजबूत पकड़ के कारण G7 देशों की कई चर्चाएं सीधे या परोक्ष रूप से चीन से जुड़ी हुई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन सम्मेलन में मौजूद न होते हुए भी एजेंडे के केंद्र में बना हुआ है।
व्यापार और आर्थिक सुरक्षा पर रहेगा फोकस
इस बार G7 नेताओं के बीच वैश्विक व्यापार संतुलन, आर्थिक सुरक्षा और तकनीकी प्रतिस्पर्धा प्रमुख मुद्दे हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी देश चीन की औद्योगिक क्षमता, व्यापार अधिशेष और वैश्विक बाजारों पर बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंतित हैं।
विशेष रूप से स्टील और इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग को लेकर संभावित नीतिगत कदमों पर चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक सुरक्षित और विविध बनाने पर भी विचार किया जाएगा।
सम्मेलन स्थल के बाहर हजारों लोगों का प्रदर्शन
G7 शिखर सम्मेलन के साथ-साथ इसके विरोध में भी बड़ी गतिविधियां देखने को मिल रही हैं। फ्रांस-स्विट्जरलैंड सीमा के पास स्थित जेनेवा में हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे और G7 देशों की आर्थिक तथा विदेश नीतियों के खिलाफ विरोध जताया।
प्रदर्शनकारियों ने असमानता, जलवायु परिवर्तन, युद्धों और वैश्विक आर्थिक नीतियों को लेकर नाराजगी व्यक्त की। कई संगठनों का आरोप है कि G7 केवल अमीर देशों के हितों का प्रतिनिधित्व करता है और विकासशील देशों की आवाज को पर्याप्त महत्व नहीं देता।
कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच तनाव की स्थिति भी बनी, जिसके बाद सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम
सम्मेलन को देखते हुए फ्रांस और स्विट्जरलैंड ने व्यापक सुरक्षा प्रबंध किए हैं। हजारों पुलिसकर्मी और सैनिक तैनात किए गए हैं ताकि किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके।
स्थानीय प्रशासन ने सम्मेलन क्षेत्र के आसपास निगरानी बढ़ा दी है और संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बलों को लगाया गया है।
भारत समेत कई देशों को मिला विशेष निमंत्रण
इस वर्ष भारत, ब्राजील, दक्षिण कोरिया, केन्या, मिस्र, यूक्रेन, कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों को विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सम्मेलन में भाग ले रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिका को देखते हुए G7 देशों के लिए भारत एक महत्वपूर्ण साझेदार बनता जा रहा है।
क्या G7 की प्रासंगिकता पर उठ रहे हैं सवाल?
दुनिया में BRICS जैसे समूहों के बढ़ते प्रभाव और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच G7 की भूमिका को लेकर बहस तेज हो गई है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि वैश्विक चुनौतियों का समाधान केवल विकसित देशों के छोटे समूह के माध्यम से संभव नहीं है।
वहीं समर्थकों का कहना है कि लोकतांत्रिक देशों के बीच समन्वय और साझा रणनीति आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी पहले थी।
सम्मेलन से क्या निकल सकता है?
सम्मेलन के अंत में जारी होने वाले संयुक्त बयान में चीन से जुड़ी आर्थिक चिंताओं, वैश्विक व्यापार नियमों, यूक्रेन संकट, मध्य पूर्व की स्थिति, जलवायु परिवर्तन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से जुड़े मुद्दों पर महत्वपूर्ण घोषणाएं देखने को मिल सकती हैं।
चीन की गैरमौजूदगी और सड़कों पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि G7 केवल आर्थिक मंच नहीं बल्कि वैश्विक रणनीतिक शक्ति संतुलन का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।
G7 Summit 2026 फ्रांस के एवियन-ले-बैन्स शहर में आयोजित किया जा रहा है।
G7 में अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और ब्रिटेन शामिल हैं। यूरोपीय संघ भी इसमें भाग लेता है।
G7 मुख्य रूप से विकसित लोकतांत्रिक देशों का समूह है, जबकि चीन की राजनीतिक व्यवस्था अलग होने के कारण उसे सदस्यता नहीं मिली है।
व्यापार, आर्थिक सुरक्षा, यूक्रेन संकट, मध्य पूर्व की स्थिति, जलवायु परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और वैश्विक शासन इस सम्मेलन के मुख्य मुद्दे हैं।
प्रदर्शनकारी G7 पर आर्थिक असमानता बढ़ाने, जलवायु संकट को पर्याप्त महत्व न देने और विकासशील देशों की आवाज को नजरअंदाज करने का आरोप लगा रहे हैं।

