नीट प्रदर्शन मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, गंभीर आरोपियों को नहीं मिलेगी राहत; 19 अगस्त को अगली सुनवाई
छात्रों पर दर्ज एफआईआर और कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
नीट परीक्षा से जुड़े विरोध प्रदर्शनों के दौरान छात्रों पर दर्ज किए गए मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। अदालत ने साफ कहा कि हर मामले को एक जैसा नहीं माना जा सकता। कोर्ट का कहना है कि यह जांचना जरूरी होगा कि कुल कितनी एफआईआर दर्ज हुई हैं और उनमें से कितने लोगों का पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड रहा है। साथ ही यह भी तय करना होगा कि जिन मामलों को वापस लेना है या बंद करना है, उसके लिए कौन-सी कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि सरकार छात्रों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रखने के पक्ष में नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य छात्रों को परेशान करना नहीं है और इस दिशा में आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रदर्शन के दौरान यदि कुछ आपराधिक तत्व भीड़ में शामिल हो गए थे और उन्होंने गंभीर अपराध किए हैं, तो उन्हें किसी तरह की राहत नहीं दी जा सकती।
इस दौरान वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने सुझाव दिया कि जिन मामलों में कार्रवाई खत्म करनी हो, वहां सरकारी वकील क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करें। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि हर मामले में ऐसा करना एक लंबी और समय लेने वाली प्रक्रिया होगी।
बल प्रयोग, फेस रिकॉग्निशन और समिति गठन पर भी हुई चर्चा
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने अदालत से कुछ समय की मांग की। उन्होंने कहा कि सरकार ने अपना जवाब तैयार कर लिया है, लेकिन उन्हें उसे विस्तार से पढ़ने का समय नहीं मिला है। इसलिए सुनवाई कुछ दिनों के लिए टालने का अनुरोध किया गया।
वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण ने अदालत में कहा कि सरकार को अपने हलफनामे में यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि प्रदर्शन के दौरान इतना बल प्रयोग क्यों किया गया। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि बिना पुलिस वर्दी पहने कुछ लोग लाठीचार्ज करते हुए क्यों दिखाई दिए और वे कौन थे।
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत को बताया कि कई लोगों के खिलाफ केवल मामूली अपराधों के मामले दर्ज हैं, जबकि कुछ मामलों में राजनीतिक कारणों से मुकदमे दर्ज किए गए हैं। वहीं वृंदा ग्रोवर ने कहा कि छोटे और सामान्य मामलों में फंसे लोगों को अनावश्यक रूप से निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए।
सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि सरकार ने करीब 2,738 लोगों की पहचान की है और उनके खिलाफ गंभीर अपराधों से जुड़े मामले दर्ज हैं। इसी दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से मांग की गई कि पूरे मामले की निगरानी के लिए भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति बनाई जाए।
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत अभी समिति के सदस्यों के नाम तय नहीं कर पाई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि समिति में किसी पूर्व न्यायाधीश का होना पर्याप्त होगा और इसके लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश का होना जरूरी नहीं है।
गंभीर अपराधियों को राहत नहीं, पुलिस की कार्रवाई की भी होगी जांच
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी सवाल उठाया गया कि दो हजार से अधिक लोगों की पहचान किस आधार पर की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि फेस रिकॉग्निशन तकनीक और आधार से जुड़े डेटा का इस्तेमाल किया गया, जो कानून के खिलाफ हो सकता है।
इस पर सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि केवल फेस रिकॉग्निशन तकनीक के आधार पर कार्रवाई नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि लोगों की पहचान के लिए फील्ड वेरिफिकेशन यानी मौके पर जाकर जांच और अन्य तरीकों का भी इस्तेमाल किया गया है।
वहीं प्रदर्शन के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिवार की ओर से पेश वकील ने अदालत में कहा कि मामले की सुनवाई केवल एक पक्ष की बात सुनकर नहीं होनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान महिला पुलिसकर्मियों के साथ बदसलूकी की गई और उन्हें भीड़ की ओर खींचने की कोशिश की गई थी।
सुनवाई के अंत में मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि छात्रों की आड़ लेकर हिंसा या गंभीर अपराध करने वाले लोगों को किसी भी तरह की राहत नहीं दी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी पुलिस अधिकारी ने अपनी सीमा से बाहर जाकर कार्रवाई की है या अत्यधिक बल प्रयोग किया है, तो उसे भी कानूनी संरक्षण नहीं मिलेगा और उसके खिलाफ भी उचित कार्रवाई हो सकती है।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त को तय की है। इस दौरान प्रस्तावित समिति के गठन, उसके अधिकार क्षेत्र और कार्यप्रणाली पर विस्तार से विचार किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई से पहले अपने-अपने जवाब और आवश्यक दस्तावेज अदालत में दाखिल करें।

