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छत्तीसगढ़ में माओवाद के बाद ‘दिमागी नक्सलवाद’ पर विजय शर्मा का बड़ा बयान

छत्तीसगढ़: माओवाद खत्म, अब दिमागी नक्सलवाद को बाहर निकालेंगे - News Critic

छत्तीसगढ़ के डिप्टी सीएम और गृह मंत्री विजय शर्मा ने नक्सलवाद को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि राज्य में माओवादी हिंसा के खिलाफ बड़ी सफलता मिली है। अब सरकार कथित ‘दिमागी नक्सलवाद’ और नक्सलवाद के नाम पर चंदा वसूली करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई करेगी।

माओवाद के बाद अब ‘दिमागी नक्सलवाद’ पर निशाना

छत्तीसगढ़ में माओवाद के खिलाफ अभियान को लेकर सरकार लगातार अपनी उपलब्धियां गिना रही है। इसी कड़ी में डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने अब ‘दिमागी नक्सलवाद’ को लेकर सख्त रुख दिखाया है।

उन्होंने कहा कि सरकार ने बंदूक के दम पर चलने वाले माओवाद को खत्म करने की दिशा में बड़ी सफलता हासिल की है। अब उन गतिविधियों पर भी नजर रखी जाएगी, जो उनके अनुसार नक्सली विचारधारा या नेटवर्क को किसी दूसरे तरीके से बढ़ावा देती हैं।

विजय शर्मा के बयान में ‘दिमागी नक्सलवाद’ शब्द खास तौर पर चर्चा में रहा। यह शब्द हाल के दिनों में राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त के भाषण में भी वैचारिक नक्सलवाद से निपटने की बात कही थी।

विजय शर्मा ने क्या कहा?

विजय शर्मा ने माओवाद के खिलाफ सरकार की कार्रवाई का जिक्र करते हुए कहा कि अब लड़ाई का अगला चरण अलग तरह की चुनौतियों से निपटने का है।

उनके अनुसार, जिन लोगों ने नक्सलवाद के नाम पर चंदा लिया या आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया, उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ऐसे लोग ‘न यहां बचेंगे, न वहां बचेंगे।’

इस बयान के जरिए डिप्टी सीएम ने संकेत दिया कि सरकार केवल जंगलों में सक्रिय सशस्त्र कैडर पर ही ध्यान नहीं देगी। अब कथित आर्थिक नेटवर्क और समर्थन तंत्र की भी जांच की जा सकती है।

हालांकि, किसी व्यक्ति या संगठन को ‘दिमागी नक्सल’ या नक्सल समर्थक मानने का अंतिम आधार जांच और कानूनी प्रक्रिया ही होगी। इसलिए राजनीतिक बयान और किसी व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को अलग-अलग समझना जरूरी है।

छत्तीसगढ़ में माओवाद के खिलाफ बड़ी कार्रवाई

छत्तीसगढ़ लंबे समय तक माओवादी हिंसा से प्रभावित रहा है। खासतौर पर बस्तर संभाग के कई जिले नक्सली गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहे हैं।

सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा अभियान के साथ-साथ नए सुरक्षा कैंप, सड़क निर्माण और विकास योजनाओं पर भी जोर दिया है। डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने मार्च 2026 में कहा था कि राज्य में करीब 99 प्रतिशत माओवाद खत्म हो चुका है और सक्रिय कैडर बेहद सीमित रह गए हैं।

सरकार की रणनीति केवल सुरक्षा कार्रवाई तक सीमित नहीं रही। आत्मसमर्पण और पुनर्वास को भी अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया।

विजय शर्मा ने पहले भी कहा था कि सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल और इंटेलिजेंस सिस्टम को मजबूत करने से सटीक अभियान चलाने में मदद मिली।

बस्तर में बदली तस्वीर का दावा

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर विजय शर्मा ने बस्तर के जवानों को संबोधित करते हुए नक्सलवाद के खिलाफ मिली सफलता का श्रेय सुरक्षा बलों को दिया था।

उन्होंने कहा था कि जवानों के साहस और बलिदान ने बस्तर का नया इतिहास लिखा है। सरकार का दावा है कि जिन क्षेत्रों में पहले नक्सलियों का प्रभाव था, वहां अब सुरक्षा और विकास की गतिविधियां बढ़ी हैं।

करेगुट्टा पहाड़ी भी इसी बदलाव का उदाहरण बताई जा रही है। यहां 14 अगस्त को पहली बार तिरंगा फहराया गया। यह क्षेत्र पहले माओवादियों के प्रभाव वाले इलाके के रूप में जाना जाता था।

इससे सरकार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि बस्तर में सुरक्षा व्यवस्था पहले के मुकाबले मजबूत हुई है।

‘दिमागी नक्सलवाद’ का मुद्दा क्यों उठा?

माओवाद के खिलाफ सैन्य और सुरक्षा कार्रवाई के बाद अब वैचारिक समर्थन का मुद्दा चर्चा में है। सरकार और भाजपा के कई नेता ‘दिमागी नक्सलवाद’ शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं।

इसका इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया जा रहा है, जिन पर माओवादी विचारधारा या उसके समर्थन का आरोप लगाया जाता है। हालांकि, यह शब्द राजनीतिक बहस में इस्तेमाल होता है और इसके दायरे को लेकर अलग-अलग मत हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से अपने भाषण में कहा था कि सशस्त्र नक्सलवाद के साथ-साथ वैचारिक रूप से नक्सलवाद का समर्थन करने वालों को भी पहचानना होगा।

विजय शर्मा का ताजा बयान इसी व्यापक राजनीतिक बहस के बीच आया है।

चंदा चोरी करने वालों पर भी कार्रवाई की चेतावनी

विजय शर्मा ने अपने बयान में चंदा वसूली और आर्थिक गतिविधियों का भी जिक्र किया। उन्होंने ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही, जिन पर नक्सलवाद के नाम पर चंदा लेने का आरोप है।

सरकार के लिए यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि किसी भी सशस्त्र संगठन को लंबे समय तक चलाने के लिए आर्थिक संसाधनों की जरूरत होती है। यदि किसी संगठन को आर्थिक मदद मिलती है, तो उसके स्रोतों की जांच सुरक्षा एजेंसियों के लिए अहम होती है।

हालांकि, चंदा लेने या देने के किसी मामले में कार्रवाई सबूतों और कानून के आधार पर ही की जा सकती है। जांच एजेंसियों को यह भी देखना होगा कि पैसा किस उद्देश्य से लिया गया और उसका इस्तेमाल कहां हुआ।

नक्सल प्रभावित लोगों के पुनर्वास पर भी जोर

छत्तीसगढ़ सरकार अब नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्वास और विकास पर भी जोर दे रही है। अगस्त 2026 में विजय शर्मा ने नक्सल प्रभावित परिवारों और पुनर्वासित युवाओं से जुड़ी योजनाओं की समीक्षा की थी।

बैठक में प्रभावित परिवारों को सहायता देने और पुनर्वास की प्रक्रिया को तेज करने पर चर्चा हुई। सरकार का प्रयास है कि हिंसा से प्रभावित लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आर्थिक और सामाजिक सहायता दी जाए।

इस रणनीति का उद्देश्य केवल नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई करना नहीं है। सरकार चाहती है कि प्रभावित इलाकों में लोगों को शिक्षा, रोजगार और बेहतर सुविधाएं मिलें।

आत्मसमर्पण करने वालों के लिए पुनर्वास योजना

सरकार ने माओवादियों को हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का विकल्प भी दिया है। विजय शर्मा पहले रेडियो संदेश के जरिए सक्रिय माओवादियों से आत्मसमर्पण की अपील कर चुके हैं।

उन्होंने कहा था कि पुनर्वास केंद्र जेल की तरह बंद व्यवस्था नहीं हैं। वहां रहने वालों को स्वास्थ्य जांच, कौशल विकास और दूसरी सुविधाएं दी जाती हैं।

सरकार का मानना है कि सुरक्षा अभियान के साथ आत्मसमर्पण और पुनर्वास की नीति से माओवादी संगठन को कमजोर करने में मदद मिली है।

सुरक्षा बलों की भूमिका सबसे अहम

छत्तीसगढ़ में माओवाद के खिलाफ अभियान में केंद्रीय और राज्य सुरक्षा बलों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। CRPF, BSF, DRG और छत्तीसगढ़ पुलिस ने अलग-अलग इलाकों में अभियान चलाए हैं।

सरकार के अनुसार, सुरक्षा बलों के बीच बेहतर तालमेल से अभियान अधिक प्रभावी हुआ। इंटेलिजेंस नेटवर्क मजबूत होने से कई अभियानों में सटीक जानकारी मिली और कार्रवाई को बेहतर तरीके से अंजाम दिया गया।

विजय शर्मा ने भी कई मौकों पर जवानों के साहस और बलिदान को इस सफलता का बड़ा कारण बताया है।

क्या अब पूरी तरह खत्म हो गया माओवाद?

सरकार लगातार माओवाद के लगभग खत्म होने का दावा कर रही है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी पूरी तरह खत्म हो गई है।

छत्तीसगढ़ के पुलिस प्रमुख ने भी हाल ही में कहा था कि कर्रेगुट्टा क्षेत्र नक्सलियों से खाली हो चुका है। लेकिन उन्होंने साथ ही बारूदी सुरंगों और छिपे विस्फोटकों के खतरे को लेकर सावधानी बरतने की बात कही।

इससे साफ है कि सुरक्षा बलों के सामने अभी भी कुछ जोखिम मौजूद हैं। इसलिए सरकार का फोकस अब सुरक्षा के साथ स्थायी शांति स्थापित करने पर है।

आगे सरकार की रणनीति क्या होगी?

विजय शर्मा के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि सरकार अब नक्सलवाद के कथित आर्थिक और वैचारिक नेटवर्क पर भी ध्यान बढ़ा सकती है।

इसमें संदिग्ध फंडिंग, चंदा वसूली और नक्सली संगठनों से जुड़े आर्थिक स्रोतों की जांच शामिल हो सकती है। साथ ही, ऐसे लोगों की गतिविधियों पर भी नजर रखी जा सकती है जिन पर प्रतिबंधित संगठनों के समर्थन का आरोप है।

दूसरी ओर, सरकार के लिए यह भी जरूरी होगा कि कानूनी कार्रवाई स्पष्ट सबूतों के आधार पर हो। इससे सुरक्षा कार्रवाई के साथ नागरिक अधिकारों को लेकर उठने वाले सवालों का भी समाधान किया जा सकेगा।

बस्तर में विकास को मिल सकता है नया रास्ता

नक्सली हिंसा कम होने से बस्तर के कई इलाकों में विकास का रास्ता खुल सकता है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी सुविधाओं को दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचाना अब सरकार की बड़ी चुनौती होगी।

यदि सुरक्षा स्थिति स्थिर रहती है, तो प्रशासन ग्रामीण इलाकों में विकास योजनाओं को तेजी से लागू कर सकता है। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार और बेहतर सुविधाएं मिल सकती हैं।

सरकार का दावा है कि सुरक्षा के साथ विकास को जोड़कर बस्तर को लंबे समय के लिए हिंसा से बाहर निकाला जा सकता है।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ में माओवाद के खिलाफ अभियान के बाद अब सरकार ने कथित ‘दिमागी नक्सलवाद’ और आर्थिक नेटवर्क पर भी सख्ती के संकेत दिए हैं। डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने कहा है कि माओवाद को खत्म करने के बाद अब उन लोगों पर कार्रवाई होगी, जो नक्सलवाद के नाम पर चंदा वसूली या दूसरी गतिविधियों में शामिल हैं।

सरकार का दावा है कि राज्य में माओवादी गतिविधियां लगभग खत्म हो चुकी हैं। अब सुरक्षा के साथ पुनर्वास, विकास और आर्थिक नेटवर्क पर कार्रवाई को आगे बढ़ाने की रणनीति अपनाई जा रही है।

हालांकि, ‘दिमागी नक्सलवाद’ जैसे राजनीतिक शब्दों के इस्तेमाल के बीच यह जरूरी होगा कि किसी भी व्यक्ति या संगठन के खिलाफ कार्रवाई ठोस सबूत और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर हो। आने वाले समय में सरकार की अगली कार्रवाई से साफ होगा कि इस नए अभियान का दायरा कितना व्यापक होता है।

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