चेन्नई में नकली सरकारी मुहरें बनाने वाला गिरोह पकड़ा गया, 6 गिरफ्तार
चेन्नई में पुलिस ने कथित तौर पर नकली सरकारी मुहरें, शैक्षणिक प्रमाणपत्र और जाली मुद्रा तैयार करने वाले गिरोह का पर्दाफाश किया है। इस मामले में छह लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस के मुताबिक, यह नेटवर्क करीब एक दशक से सक्रिय था।
मामला एक छात्र के कथित फर्जी स्थानांतरण प्रमाणपत्र से सामने आया। जांच के दौरान पुलिस ने 100 से अधिक मुहरें और कई संदिग्ध दस्तावेज बरामद किए। अब पुलिस उन लोगों की पहचान करने में जुटी है, जिन्होंने गिरोह से कथित तौर पर फर्जी प्रमाणपत्र बनवाए थे।
एक छात्र के प्रमाणपत्र से खुला फर्जीवाड़े का मामला
इस पूरे मामले का खुलासा पुलिस की एक जांच के दौरान हुआ। पिछले सप्ताह पुलिस एक अन्य मामले की जांच कर रही थी। इसी दौरान विम्को नगर इलाके में ड्रिल मशीन किराये पर देने वाली एक दुकान के पास पुलिसकर्मी की नजर एक छात्र पर पड़ी।
छात्र के पास स्थानांतरण प्रमाणपत्र यानी ट्रांसफर सर्टिफिकेट था। दुकान के अंदर मेज पर बड़ी संख्या में रबर की मुहरें भी रखी हुई थीं। यह देखकर पुलिसकर्मी को दस्तावेज की प्रामाणिकता पर संदेह हुआ।
इसके बाद पुलिस ने प्रमाणपत्र को सत्यापन के लिए भेजा। जांच में दस्तावेज कथित तौर पर फर्जी पाया गया। इसी सुराग के आधार पर पुलिस ने आगे की पड़ताल शुरू की।
जांच के दौरान पुलिस को आशंका हुई कि यह केवल एक फर्जी प्रमाणपत्र का मामला नहीं है। इसके पीछे दस्तावेज तैयार करने और ग्राहकों तक पहुंचाने वाला एक संगठित नेटवर्क काम कर रहा था।
इसके बाद पुलिस ने संबंधित परिसर की तलाशी ली। वहां से बड़ी संख्या में मुहरें, शैक्षणिक प्रमाणपत्र और अन्य संदिग्ध सामग्री मिली। इस बरामदगी के बाद पुलिस ने मामले में छह आरोपियों को गिरफ्तार किया।
100 से अधिक नकली मुहरें बरामद
पुलिस ने चेन्नई के एर्णावूर स्थित अंबेडकर नगर इलाके में एक परिसर पर छापा मारा। यहां से 100 से अधिक रबर की मुहरें बरामद की गईं। इन मुहरों पर विभिन्न सरकारी विभागों और संस्थानों के नाम दर्ज होने की बात सामने आई है।
बरामद मुहरों में तहसीलदार और उप-तहसीलदार जैसे अधिकारियों के नाम वाली मुहरें भी शामिल बताई गई हैं। इसके अलावा मिनजूर टाउन पंचायत और कई शैक्षणिक संस्थानों से जुड़ी मुहरें भी मिलीं।
पुलिस के अनुसार, बरामद सामग्री में मद्रास विश्वविद्यालय, एसआरएम विश्वविद्यालय, स्कूलों और इंजीनियरिंग कॉलेजों से संबंधित मुहरें भी शामिल थीं। कुछ मुहरें निजी कंपनियों और अन्य संस्थानों के नाम पर बनाई गई थीं।
इसके अतिरिक्त, भारतीय वाणिज्य दूतावास, न्यूयॉर्क और सऊदी अरब के एक राजनयिक कार्यालय से संबंधित मुहरें भी बरामद होने की जानकारी सामने आई है।
पुलिस को कुछ मुहरों पर नमूना हस्ताक्षर और तारीख दर्ज करने वाले निशान भी मिले। इनका इस्तेमाल किस तरह किया जाता था और किन दस्तावेजों पर इनका प्रयोग हुआ, इसकी जांच की जा रही है।
फर्जी प्रमाणपत्रों के साथ जाली नोट भी मिले
छापेमारी के दौरान पुलिस को केवल नकली सरकारी मुहरें ही नहीं मिलीं। वहां से कई तरह के संदिग्ध दस्तावेज और उपकरण भी बरामद किए गए।
पुलिस की शुरुआती जानकारी के अनुसार, जब्त सामग्री में निम्न चीजें शामिल हैं:
- 100 से अधिक संदिग्ध रबर की मुहरें।
- स्कूल और कॉलेजों के कथित फर्जी प्रमाणपत्र।
- मेडिकल योग्यता से जुड़े संदिग्ध दस्तावेज।
- बैंक के कथित जाली चेक।
- विदेशी पासपोर्ट से संबंधित दस्तावेज।
- 500 रुपये के संदिग्ध नकली नोट और एक रुपये के सिक्के।
- दस्तावेज तैयार करने में इस्तेमाल होने वाले उपकरण और अन्य सामग्री।
पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन सभी चीजों का इस्तेमाल किन उद्देश्यों के लिए किया जा रहा था। बरामद सामग्री के आधार पर फर्जीवाड़े के दायरे की जांच भी की जा रही है।
हालांकि, जब्त की गई हर वस्तु के इस्तेमाल और उससे जुड़े अपराध की पुष्टि जांच के बाद ही होगी। फिलहाल पुलिस सभी साक्ष्यों को एकत्र कर मामले की कड़ियां जोड़ रही है।
छह आरोपियों की पहचान हुई
इस मामले में गिरफ्तार किए गए छह आरोपियों की पहचान करुणाकरण, स्टीफन उर्फ जयकुमार, जॉनसन, विक्टर, करुणानिधि और सत्यामूर्ति के रूप में हुई है।
पुलिस के अनुसार, स्टीफन उर्फ जयकुमार की उम्र 38 वर्ष बताई गई है। उसे विशेष पुलिस टीम ने विम्को नगर मेट्रो रेल डिपो के पास बस स्टॉप के नजदीक पकड़ा था।
जांच में कथित तौर पर सामने आया कि वह एर्णावूर के अंबेडकर नगर में जेया इंजीनियरिंग वर्क्स नाम से एक इकाई चला रहा था। पुलिस ने इस परिसर की तलाशी के दौरान कई संदिग्ध दस्तावेज और मुहरें बरामद कीं।
अन्य पांच आरोपियों को भी कथित नेटवर्क में उनकी भूमिका के आधार पर गिरफ्तार किया गया। पुलिस का कहना है कि सभी आरोपियों को 12 अक्टूबर 2026 को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच अभी जारी है। अदालत में दोष साबित होने तक उन्हें आरोपी के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
गिरोह में अलग-अलग जिम्मेदारियां होने का संदेह
पुलिस को शुरुआती जांच में संकेत मिले हैं कि कथित गिरोह के सदस्य अलग-अलग काम संभालते थे। इससे फर्जी दस्तावेज तैयार करने और ग्राहकों तक पहुंचाने की प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से चलाया जाता था।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, करुणाकरण कथित तौर पर काम का समन्वय करता था। स्टीफन पर जाली मुद्रा तैयार करने से जुड़ी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप है।
वहीं, जॉनसन और उसके भाई विक्टर पर कथित तौर पर फर्जी प्रमाणपत्र तैयार करने की जिम्मेदारी होने का संदेह है। करुणानिधि और सत्यामूर्ति ग्राहकों से संपर्क करने का काम संभालते थे।
जांच में यह भी सामने आया है कि कथित तौर पर ऐसे दस्तावेज तैयार करने के लिए कम से कम 2,000 रुपये तक लिए जाते थे। गिरोह नए ग्राहकों तक पहुंचने के लिए परिचितों के माध्यम से संपर्क करता था।
पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस नेटवर्क से कितने लोग जुड़े थे और कितने लोगों ने फर्जी दस्तावेज हासिल किए। इसके लिए ग्राहकों और अन्य संभावित सहयोगियों की पहचान की जा रही है।
करीब दस साल से सक्रिय होने का दावा
पुलिस के मुताबिक, यह नेटवर्क करीब दस वर्षों से सक्रिय हो सकता है। शुरुआती जांच में यह भी जानकारी सामने आई है कि कथित तौर पर इस गतिविधि का संचालन पहले जैकब नाम का एक सेवानिवृत्त सरकारी स्कूल प्रधानाध्यापक करता था। उसकी लगभग एक साल पहले मौत हो गई थी।
पुलिस अब इस कथित नेटवर्क के पुराने कामकाज और उससे जुड़े लोगों के बारे में जानकारी जुटा रही है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या पहले तैयार किए गए दस्तावेजों का इस्तेमाल सरकारी कामकाज या अन्य संस्थागत प्रक्रियाओं में हुआ था।
कुछ आरोपियों के खिलाफ वर्ष 2017 में भी फर्जीवाड़े से जुड़े मामले दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। इन पुराने मामलों और मौजूदा जांच के बीच किसी संबंध की पुष्टि करना पुलिस के लिए महत्वपूर्ण होगा।
यदि नेटवर्क लंबे समय से सक्रिय था, तो उसके जरिए तैयार किए गए दस्तावेजों की संख्या अधिक हो सकती है। हालांकि, वास्तविक संख्या का पता जांच पूरी होने के बाद ही चल पाएगा।
अब ग्राहकों की पहचान करेगी पुलिस
पुलिस की जांच अब उन लोगों तक पहुंचने पर केंद्रित है, जिन्होंने कथित तौर पर इस गिरोह से फर्जी प्रमाणपत्र या अन्य दस्तावेज बनवाए थे।
सबसे पहले छात्र के स्थानांतरण प्रमाणपत्र की जांच से मामला सामने आया। इसके बाद बरामद मुहरों और दस्तावेजों ने जांच का दायरा बढ़ा दिया।
पुलिस यह भी पता लगाएगी कि दस्तावेज तैयार करने के लिए किन उपकरणों का इस्तेमाल होता था और ग्राहकों से संपर्क कैसे किया जाता था। इसके अलावा, सरकारी विभागों और शैक्षणिक संस्थानों के नाम पर बनी मुहरों का संभावित दुरुपयोग भी जांच का हिस्सा होगा।
इस मामले में आगे की कार्रवाई बरामद साक्ष्यों, आरोपियों से पूछताछ और दस्तावेजों के सत्यापन पर निर्भर करेगी।
निष्कर्ष
चेन्नई में नकली सरकारी मुहरें और फर्जी दस्तावेज तैयार करने के कथित नेटवर्क का खुलासा एक छात्र के संदिग्ध स्थानांतरण प्रमाणपत्र से हुआ। पुलिस ने छह आरोपियों को गिरफ्तार किया है और 100 से अधिक मुहरों समेत कई तरह की संदिग्ध सामग्री जब्त की है।
अब जांच का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि गिरोह कितने समय से सक्रिय था, उसने कितने लोगों को फर्जी दस्तावेज दिए और इनका इस्तेमाल कहां-कहां हुआ। पुलिस की आगे की कार्रवाई से इस कथित फर्जीवाड़े के पूरे दायरे की जानकारी सामने आने की उम्मीद है।

