राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की बस्तर से अपील, जल-जंगल बचाएं; कहा- नक्सलवाद से मुक्त होकर विकास की राह पर छत्तीसगढ़
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बस्तर से जल-जंगल और प्राकृतिक संपदा बचाने का संदेश दिया। उन्होंने लोगों से प्रकृति की रक्षा करने की अपील की। साथ ही कहा कि छत्तीसगढ़ नक्सलवाद की चुनौती से आगे बढ़कर विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहा है।
राष्ट्रपति ने 23 अक्टूबर 2026 को जगदलपुर में बस्तर दशहरा के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित किया। उन्होंने आदिवासी समाज की प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली की सराहना की। इसके अलावा, उन्होंने आदिवासी उद्यमियों को आर्थिक सहायता देने और बाजार से जोड़ने के प्रयासों का भी जिक्र किया।
राष्ट्रपति मुर्मू ने बस्तर से क्या संदेश दिया?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने संबोधन में प्रकृति संरक्षण को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदायों की जीवनशैली से समाज को कई मूल्यवान सीख मिल सकती हैं। इन समुदायों की परंपराएं प्रकृति के प्रति सम्मान और उसके संरक्षण पर जोर देती हैं।
राष्ट्रपति ने बस्तर दशहरा को छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक गौरव और सामूहिक आस्था का प्रतीक बताया। इस उत्सव में समाज के अलग-अलग वर्ग भाग लेते हैं। इससे लोगों के बीच आपसी जुड़ाव और सामाजिक एकता को बढ़ावा मिलता है।
कार्यक्रम में राज्यपाल रमेन डेका और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय भी मौजूद रहे। राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में विकास, पर्यावरण और आदिवासी समाज की भागीदारी पर जोर दिया। उन्होंने इन विषयों को राज्य के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बताया।
जल-जंगल बचाने की अपील क्यों की?
बस्तर अपनी प्राकृतिक संपदा और जंगलों के लिए जाना जाता है। यहां के वन स्थानीय समुदायों की आजीविका और संस्कृति से जुड़े हैं। इसलिए जंगलों की सुरक्षा केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि स्थानीय जीवन से भी जुड़ी है।
राष्ट्रपति ने लोगों से पेड़-पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने का आग्रह किया। उन्होंने जंगलों और पहाड़ियों को सुरक्षित रखने की जरूरत बताई। साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने पर जोर दिया।
पेड़ हमें स्वच्छ हवा, फल और कई उपयोगी संसाधन देते हैं। जंगल अनेक जीव-जंतुओं को आश्रय भी प्रदान करते हैं। इसके अलावा, पेड़ मिट्टी के कटाव को रोकने और पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।
हालांकि, केवल पौधे लगाना पर्याप्त नहीं है। उनकी नियमित देखभाल भी जरूरी है। यदि स्थानीय लोग संरक्षण के प्रयासों में भाग लें, तो जंगलों को सुरक्षित रखने में बेहतर मदद मिल सकती है।
आदिवासी जीवनशैली से सीखने की जरूरत
राष्ट्रपति मुर्मू ने आदिवासी समुदायों की प्रकृति से जुड़ी परंपराओं की सराहना की। कई जनजातीय समुदाय पेड़-पौधों, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों को अपने जीवन का अहम हिस्सा मानते हैं। उनकी परंपराएं प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर रहने का संदेश देती हैं।
आज पर्यावरण संरक्षण दुनिया के सामने बड़ी चुनौती है। बढ़ते शहरीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के अधिक इस्तेमाल से कई जगह पर्यावरण पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को समझना उपयोगी हो सकता है।
आदिवासी समुदाय अपने क्षेत्र की वनस्पतियों और प्राकृतिक परिस्थितियों से लंबे अनुभव के आधार पर परिचित होते हैं। इस जानकारी का उपयोग संरक्षण योजनाओं में किया जा सकता है। साथ ही, स्थानीय लोगों की भागीदारी से योजनाओं को जमीन पर लागू करना आसान हो सकता है।
राष्ट्रपति का संदेश यही था कि विकास के दौरान प्रकृति की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। प्राकृतिक संपदा का उपयोग करते समय उसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए। इससे आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।
नक्सलवाद से आगे बढ़ रहा छत्तीसगढ़
राष्ट्रपति ने छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की चुनौती का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयासों से प्रदेश नक्सली हिंसा के खतरे से आगे बढ़ा है। उनके अनुसार, राज्य अब तेजी से विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है।
बस्तर क्षेत्र लंबे समय तक नक्सली हिंसा से प्रभावित रहा है। इस समस्या ने कई इलाकों में सामान्य जनजीवन और विकास संबंधी गतिविधियों को प्रभावित किया। सुरक्षा के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर भी महत्वपूर्ण विषय बने रहे।
ऐसे में शांति और विकास को साथ लेकर चलना जरूरी है। बेहतर सड़कें, स्वास्थ्य सुविधाएं और शिक्षा स्थानीय लोगों के जीवन में बदलाव ला सकती हैं। वहीं, रोजगार के अवसर युवाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने में मदद कर सकते हैं।
हालांकि, विकास की वास्तविक स्थिति समझने के लिए आधिकारिक आंकड़ों को देखना जरूरी है। सुरक्षा, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में प्रगति का आकलन अलग-अलग तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। राष्ट्रपति का बयान छत्तीसगढ़ में हो रहे बदलावों को लेकर उनका दृष्टिकोण सामने रखता है।
आदिवासी उद्यमियों को मिलेगा आगे बढ़ने का अवसर
राष्ट्रपति ने आदिवासी उद्यमियों को आर्थिक सहायता देने और बाजार से जोड़ने के प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने उम्मीद जताई कि ऐसी पहल समावेशी विकास को बढ़ावा देंगी। इससे आदिवासी समुदायों की आर्थिक भागीदारी मजबूत हो सकती है।
बस्तर में हस्तशिल्प, स्थानीय उत्पाद और वन उपज से जुड़ी गतिविधियां महत्वपूर्ण हैं। इन उत्पादों को बेहतर बाजार मिलने से कारीगरों और छोटे कारोबारियों को लाभ हो सकता है। इसके लिए उचित कीमत और ग्राहकों तक पहुंच जरूरी है।
इसके अलावा, कारोबारियों को प्रशिक्षण और वित्तीय जानकारी देना भी उपयोगी है। इससे वे अपने व्यवसाय की योजना बेहतर तरीके से बना सकते हैं। उत्पादों की गुणवत्ता और पैकेजिंग में सुधार से बिक्री के अवसर बढ़ सकते हैं।
हालांकि, आर्थिक सहायता के साथ दूसरी सुविधाएं भी जरूरी हैं। परिवहन, डिजिटल सेवाओं और बाजार की जानकारी तक पहुंच इसमें अहम भूमिका निभाती है। इन क्षेत्रों में लगातार प्रयास होने से स्थानीय कारोबार को आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है।
विकसित भारत 2047 में आदिवासी युवाओं की भूमिका
राष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि आदिवासी युवा भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में सक्रिय योगदान देंगे। उन्होंने समान अवसरों और समावेशी विकास के महत्व पर जोर दिया। इसका उद्देश्य विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचाना है।
शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण युवाओं के लिए नए रास्ते खोल सकते हैं। बेहतर शिक्षा से उन्हें रोजगार के अवसर तलाशने में मदद मिलती है। वहीं, तकनीकी प्रशिक्षण उन्हें बदलते बाजार की जरूरतों के अनुसार तैयार कर सकता है।
इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर कारोबार शुरू करने के अवसर भी महत्वपूर्ण हैं। युवाओं को वित्तीय सहायता और सही मार्गदर्शन मिले, तो वे छोटे उद्यम स्थापित कर सकते हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है।
हालांकि, इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार के बीच तालमेल जरूरी है। सरकारी योजनाओं की जानकारी और उनका लाभ प्राप्त करने की आसान व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होगी। युवाओं की भागीदारी विकसित भारत के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में मदद कर सकती है।
बस्तर दशहरा की सांस्कृतिक पहचान
बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ की प्रमुख सांस्कृतिक परंपराओं में शामिल है। यह उत्सव अपनी विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं और सामुदायिक भागीदारी के लिए जाना जाता है। इसकी परंपराएं क्षेत्र के इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं।
राष्ट्रपति ने कहा कि इस उत्सव में समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी विशेष महत्व रखती है। इससे लोगों के बीच आपसी जुड़ाव मजबूत होता है। साथ ही, स्थानीय परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर मिलता है।
अपने दौरे के दौरान राष्ट्रपति ने मुरिया दरबार में स्थानीय मांझी और चालकी प्रतिनिधियों से बातचीत की। उन्होंने जगदलपुर में रंगोली और दशहरा प्रदर्शनी का भी अवलोकन किया। इससे पहले उन्होंने मां दंतेश्वरी मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना की।
बस्तर दशहरा की पहचान केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है। यह स्थानीय समाज की परंपराओं और सामूहिक भागीदारी को भी सामने लाता है। इसलिए इस विरासत को सुरक्षित रखना क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान के लिए महत्वपूर्ण है।
विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण भी जरूरी
बस्तर में विकास की योजनाओं को आगे बढ़ाते समय स्थानीय जरूरतों का ध्यान रखना जरूरी है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी सुविधाएं जीवन को बेहतर बना सकती हैं। दूसरी ओर, जंगलों की अनदेखी से पर्यावरण पर दबाव बढ़ सकता है।
इसलिए विकास योजनाओं में पर्यावरण संरक्षण को भी शामिल करना चाहिए। स्थानीय लोगों की भागीदारी से उनकी जरूरतों को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। साथ ही, प्राकृतिक संसाधनों के जिम्मेदार इस्तेमाल को बढ़ावा देना चाहिए।
पेड़ लगाना, जंगलों की रक्षा करना और पानी के स्रोतों को सुरक्षित रखना सामूहिक जिम्मेदारी है। इन प्रयासों के लिए जागरूकता के साथ नियमित काम भी जरूरी है। इससे प्राकृतिक संपदा को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।
राष्ट्रपति की अपील इसी संतुलन की ओर ध्यान दिलाती है। विकास और प्रकृति संरक्षण को साथ लेकर चलना जरूरी है। इससे स्थानीय समुदायों और आने वाली पीढ़ियों, दोनों को लाभ मिल सकता है।
आगे क्या होगा?
राष्ट्रपति के संबोधन ने बस्तर में पर्यावरण संरक्षण, आदिवासी उद्यमिता और विकास पर ध्यान केंद्रित किया। इन क्षेत्रों में आगे की प्रगति योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। स्थानीय लोगों तक सुविधाएं पहुंचाना भी महत्वपूर्ण होगा।
आदिवासी उद्यमियों को आर्थिक सहायता और बाजार उपलब्ध कराने के प्रयासों से नए अवसर पैदा हो सकते हैं। वहीं, युवाओं के लिए शिक्षा और रोजगार की सुविधाएं बढ़ाना भी जरूरी है। इन प्रयासों से क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को गति मिल सकती है।
इसके साथ ही, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा पर लगातार ध्यान देना होगा। पौधारोपण और संरक्षण में लोगों की भागीदारी महत्वपूर्ण रहेगी। इन कदमों से विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने में मदद मिल सकती है।
निष्कर्ष
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बस्तर से जल-जंगल बचाने और आदिवासी समाज की प्रकृति-आधारित जीवनशैली से सीख लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ नक्सलवाद की चुनौती से आगे बढ़कर विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है।
उन्होंने आदिवासी उद्यमियों को आर्थिक सहायता देने और युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के प्रयासों को भी महत्वपूर्ण बताया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू बस्तर का संदेश स्पष्ट है कि विकास के साथ पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा भी जरूरी है। इसके लिए सरकार और समाज, दोनों की भागीदारी महत्वपूर्ण होगी।

