एमपी में सरकारी खरीदी की गड़बड़ी पर बड़ा एक्शन: एआई से खुलासा, 392 अधिकारी कार्रवाई के दायरे में; 250 करोड़ की बचत का अनुमान
मध्य प्रदेश में नगरीय निकायों की सरकारी खरीदी को लेकर बड़ा मामला सामने आया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और तकनीकी विश्लेषण से खरीद के दामों में भारी अंतर का पता चला है। इस मामले में 392 अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। वहीं, सात अधिकारियों को सेवा से हटाया गया है।
जांच में पता चला कि प्रदेश के 374 नगरीय निकायों ने तीन साल में करीब 1,134 करोड़ रुपये की खरीद की। अधिकारियों के मुताबिक, अगर सामान बाजार की औसत दरों पर खरीदा जाता, तो लगभग 250 करोड़ रुपये बचाए जा सकते थे। हालांकि, यह संभावित बचत का अनुमान है। इसे पूरी राशि के प्रमाणित घोटाले के रूप में देखना सही नहीं होगा।
एआई से कैसे सामने आई सरकारी खरीदी की गड़बड़ी?
मध्य प्रदेश के नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने सरकारी खरीद के आंकड़ों की जांच की। इसमें तकनीक और एआई आधारित विश्लेषण की मदद ली गई। जांच के दौरान अलग-अलग नगरीय निकायों में एक जैसे सामान की खरीद कीमतों में काफी अंतर मिला।
सरकारी खरीद में कीमतों का अंतर हमेशा गड़बड़ी का प्रमाण नहीं होता। सामान की गुणवत्ता, अतिरिक्त उपकरण, परिवहन और अन्य शर्तों से भी कीमत बदल सकती है। लेकिन जब समान वस्तुओं के दामों में बहुत बड़ा अंतर दिखाई देता है, तो उसकी जांच जरूरी हो जाती है।
इसी वजह से विभाग ने खरीद के रिकॉर्ड पर ध्यान दिया। विश्लेषण में वाहनों, एलईडी लाइट, सफाई सामग्री और दूसरे सामान की खरीद से जुड़े कई सवाल सामने आए। इसके बाद जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
392 अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई
इस मामले में अब तक 392 अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ अलग-अलग स्तर पर कार्रवाई की गई है। इनमें 135 मुख्य नगरपालिका अधिकारी यानी सीएमओ भी शामिल हैं। कार्रवाई का दायरा केवल वरिष्ठ अधिकारियों तक सीमित नहीं है।
विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे के अनुसार, अलग-अलग मामलों में कर्मचारियों पर विभिन्न प्रकार की विभागीय कार्रवाई की गई है। कुछ मामलों में वेतनवृद्धि रोकी गई, जबकि कुछ अधिकारियों को पद से हटाने या पदावनत करने जैसे कदम उठाए गए।
अब तक सात अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त किया गया है। इसके अलावा, संबंधित कर्मचारियों और अधिकारियों से करीब तीन से चार करोड़ रुपये की वसूली की जानकारी भी सामने आई है। हालांकि, सभी मामलों की स्थिति और जिम्मेदारी एक जैसी नहीं है।
कार्रवाई के मुख्य आंकड़े
- 392 अधिकारी और कर्मचारी: कार्रवाई के दायरे में आए।
- 135 सीएमओ: इनमें मुख्य नगरपालिका अधिकारी भी शामिल हैं।
- 7 अधिकारी: सेवा से बर्खास्त किए गए।
- 80 से अधिक ठेकेदार और सप्लायर: इनके खिलाफ भी कार्रवाई की गई।
- 3 से 4 करोड़ रुपये: संबंधित कर्मचारियों से वसूली की जानकारी दी गई।
ये आंकड़े बताते हैं कि विभाग ने खरीद प्रक्रिया की जांच को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाया है। हालांकि, हर मामले में अंतिम जिम्मेदारी तय करने के लिए संबंधित रिकॉर्ड और जांच के नतीजे महत्वपूर्ण होंगे।
1,134 करोड़ की खरीद में 250 करोड़ की संभावित बचत
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू खरीद की कुल राशि और संभावित बचत है। विभागीय प्रस्तुतीकरण के अनुसार, मध्य प्रदेश के 374 नगरीय निकायों ने पिछले तीन वर्षों में सरकारी ई-मार्केटप्लेस यानी जेम पोर्टल के माध्यम से लगभग 1,134 करोड़ रुपये की खरीद की।
आंकड़ों के विश्लेषण में अनुमान लगाया गया कि बाजार की औसत कीमतों पर सामान खरीदा जाता, तो करीब 250 करोड़ रुपये बच सकते थे। इस अंतर ने सरकारी खरीद की प्रक्रिया, कीमत तय करने और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए।
हालांकि, संभावित बचत और प्रमाणित वित्तीय नुकसान में अंतर होता है। वास्तविक नुकसान तय करने के लिए प्रत्येक खरीद की शर्तें, सामान की गुणवत्ता, मात्रा और भुगतान का रिकॉर्ड देखना जरूरी है। इसलिए 250 करोड़ रुपये को फिलहाल संभावित बचत का आंकड़ा समझना चाहिए।
सरकारी धन का उपयोग सीधे आम लोगों की सुविधाओं से जुड़ा होता है। नगर निकाय इसी बजट से सफाई, कचरा प्रबंधन, रोशनी और दूसरी स्थानीय सेवाओं के लिए सामान खरीदते हैं। ऐसे में खरीद की कीमतों में अनावश्यक अंतर का असर सार्वजनिक खर्च पर पड़ सकता है।
कचरा वाहन की कीमत में तीन गुना तक अंतर
खरीद के आंकड़ों में कुछ ऐसे उदाहरण सामने आए, जिन्होंने अधिकारियों का ध्यान खींचा। एक नगरीय निकाय ने कचरा वाहन करीब दो लाख रुपये में खरीदा। वहीं, दूसरे निकाय ने समान वाहन और चार अतिरिक्त डस्टबिन के लिए करीब छह लाख रुपये खर्च किए।
दोनों खरीद के बीच कीमत का अंतर होने से सवाल उठे। हालांकि, अंतिम तुलना में अतिरिक्त उपकरणों और अन्य शर्तों को भी देखना जरूरी है। विभाग ने ऐसे मामलों के रिकॉर्ड की जांच पर जोर दिया है।
इसी तरह, कुछ छोटे नगरीय निकायों में महंगे कचरा वाहनों की खरीद पर भी सवाल उठे। अधिकारियों ने यह देखने की जरूरत बताई कि खरीदे गए वाहनों की वास्तविक आवश्यकता कितनी थी। साथ ही, उनकी उपयोगिता और संबंधित निकाय की जरूरतों का आकलन भी जरूरी है।
सरकारी खरीद में केवल सामान खरीद लेना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना चाहिए कि सामान की जरूरत थी या नहीं और उससे नागरिकों को कितना लाभ मिला। इसलिए खरीद की कीमत के साथ उसके वास्तविक उपयोग की जांच भी महत्वपूर्ण है।
एलईडी लाइट और सफाई सामग्री की कीमतों ने चौंकाया
जांच में एलईडी लाइट की खरीद से जुड़ा उदाहरण भी सामने आया। एक निकाय ने 60 वॉट की एलईडी लाइट करीब 306 रुपये में खरीदी। वहीं, भोपाल के एक निकाय में इसी क्षमता की लाइट की कीमत 11,800 रुपये बताई गई।
इतने बड़े अंतर ने खरीद प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए। हालांकि, दोनों खरीद की तकनीकी विशेषताओं और शर्तों की तुलना के बाद ही सही निष्कर्ष निकाला जा सकता है। विभाग ने ऐसे मामलों में रिकॉर्ड के आधार पर कार्रवाई की बात कही है।
सफाई में इस्तेमाल होने वाले रसायन की खरीद को लेकर भी गंभीर सवाल उठे। एक जगह फिनाइल जैसे रसायन की कीमत पांच रुपये प्रति लीटर बताई गई। दूसरी जगह इसी तरह के रसायन के लिए 33,500 रुपये प्रति लीटर तक की राशि दर्ज होने की जानकारी सामने आई।
इसके अलावा, कुछ निकायों में जीआई ऑक्टागोनल पोल की खरीद पर भी सवाल उठे। एक मामले में करीब 97 लाख रुपये के पोल खरीदने का उल्लेख हुआ। जांच में यह देखना जरूरी है कि खरीदी गई सामग्री की मात्रा, कीमत और जरूरत आपस में मेल खाती थी या नहीं।
80 से अधिक ठेकेदारों और सप्लायरों पर भी कार्रवाई
इस मामले में कार्रवाई केवल सरकारी अधिकारियों तक सीमित नहीं रही। विभाग ने 80 से अधिक ठेकेदारों और सप्लायरों के खिलाफ भी कदम उठाए हैं। खरीद प्रक्रिया में उनकी भूमिका और संबंधित लेनदेन की जांच की जा रही है।
सरकारी खरीद में सप्लायर की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण होती है। उसे तय शर्तों के अनुसार सही गुणवत्ता और मात्रा में सामान देना होता है। वहीं, सरकारी अधिकारियों को खरीद के प्रस्ताव, कीमत और भुगतान की उचित जांच करनी चाहिए।
अगर किसी खरीद में नियमों का उल्लंघन मिलता है, तो संबंधित पक्ष की भूमिका के अनुसार कार्रवाई हो सकती है। हालांकि, किसी ठेकेदार या सप्लायर के खिलाफ कार्रवाई शुरू होना अपने आप में अंतिम दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है।
विभाग ने संकेत दिया है कि गड़बड़ियों की पहचान और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया जारी रहेगी। इस वजह से आगे और मामलों की समीक्षा होने की संभावना है। अंतिम नतीजे संबंधित जांच और उपलब्ध दस्तावेजों पर निर्भर करेंगे।
किन शहरों के नगरीय निकाय जांच के दायरे में हैं?
खरीद से जुड़ी कथित अनियमितताओं के मामले प्रदेश के कई शहरों से सामने आए हैं। इनमें भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, उज्जैन, जबलपुर, रतलाम, सागर, रीवा, गुना और छिंदवाड़ा जैसे शहर शामिल हैं।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नगरीय निकाय स्थानीय स्तर पर नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। सफाई, कचरा उठाने, सड़कों पर रोशनी और सार्वजनिक स्थानों के रखरखाव में खरीदे गए सामान की भूमिका होती है।
यदि सामान जरूरत से ज्यादा महंगे दामों पर खरीदा जाता है, तो सीमित बजट पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, उचित कीमत पर गुणवत्तापूर्ण सामान मिलने से सरकारी संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।
हालांकि, सभी शहरों में एक जैसी गड़बड़ी हुई है, ऐसा मानना सही नहीं होगा। प्रत्येक खरीद का रिकॉर्ड अलग हो सकता है। इसलिए जांच में स्थानीय परिस्थितियों और संबंधित दस्तावेजों को ध्यान में रखना जरूरी है।
एआई निगरानी से आगे क्या बदलेगा?
इस मामले के बाद सरकारी खरीद की निगरानी में तकनीक की भूमिका पर चर्चा तेज हुई है। एआई आधारित विश्लेषण बड़े आंकड़ों में असामान्य कीमतों और लेनदेन की पहचान करने में मदद कर सकता है। इससे अधिकारियों को उन खरीद मामलों पर ध्यान देने का अवसर मिलता है, जिनकी विस्तृत जांच जरूरी है।
उदाहरण के लिए, एक ही तरह की वस्तु अलग-अलग निकायों में कितने दाम पर खरीदी गई, इसकी तुलना की जा सकती है। यदि किसी खरीद की कीमत सामान्य स्तर से काफी अधिक दिखाई देती है, तो संबंधित विभाग उससे जुड़े दस्तावेज मांग सकता है।
हालांकि, एआई अपने आप किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं कर सकता। तकनीक से मिलने वाले संकेतों की पुष्टि दस्तावेजों, खरीद की शर्तों और अन्य तथ्यों से करनी होती है। अंतिम कार्रवाई नियमों और जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही होनी चाहिए।
आगे विभाग के सामने खरीद प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की चुनौती होगी। इसके लिए कीमतों की नियमित तुलना, खरीद की जरूरत का आकलन और भुगतान से पहले रिकॉर्ड की जांच महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
निष्कर्ष
मध्य प्रदेश में सरकारी खरीद से जुड़ी गड़बड़ियों ने नगरीय निकायों की खर्च व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। तीन वर्षों में 1,134 करोड़ रुपये की खरीद के विश्लेषण में 250 करोड़ रुपये की संभावित बचत सामने आई। वहीं, 392 अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई तथा सात अधिकारियों को सेवा से हटाया गया।
एमपी में सरकारी खरीदी में गड़बड़ी के इस मामले में एआई ने कीमतों के अंतर की पहचान करने में मदद की है। अब जांच के जरिए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किन मामलों में नियमों का उल्लंघन हुआ और किसकी क्या जिम्मेदारी थी। इससे सरकारी धन के बेहतर इस्तेमाल और खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

