SIR पर चुनाव आयोग का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा, सभी फैसले सर्वसम्मति से लेने का दावा
चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है। आयोग ने कहा है कि इस प्रक्रिया से जुड़े सभी प्रमुख फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। उसने उन आरोपों को भी खारिज किया है, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त पर एकतरफा फैसले लेने के सवाल उठाए गए थे।
आयोग का यह जवाब ऐसे समय आया है, जब उसकी कार्यप्रणाली और एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। हलफनामे में आयोग ने अपने फैसलों की प्रक्रिया और फॉर्म-6 से जुड़े विवाद पर सफाई दी है। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर नजर रहेगी।
चुनाव आयोग ने हलफनामे में क्या कहा?
चुनाव आयोग ने 26 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल किया। इसमें आयोग ने कहा कि एसआईआर से जुड़े तीन प्रमुख आदेश सभी सदस्यों की सहमति से जारी किए गए थे।
इन आदेशों की तारीख 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 बताई गई है। आयोग के अनुसार, ये फैसले किसी एक अधिकारी ने अपनी मर्जी से नहीं लिए थे। इन्हें आयोग के निर्धारित निर्णय लेने के तरीके के अनुसार मंजूरी मिली थी।
हलफनामा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से दाखिल किया गया। इन दोनों चुनाव आयुक्तों के नाम सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी हैं।
आयोग ने यह भी कहा कि किसी अधिकारी या आयुक्त की व्यक्तिगत टिप्पणी को अपने आप आयोग का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। उसके अनुसार, फाइल पर दर्ज सुझाव, सवाल और टिप्पणियां निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं।
इस दलील के जरिए आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी फाइल पर सवाल उठने का अर्थ यह नहीं है कि अंतिम निर्णय असहमति के बावजूद लिया गया।
एसआईआर को लेकर विवाद क्यों बढ़ा?
एसआईआर का पूरा नाम स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन है। हिंदी में इसे मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण कहा जाता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची की जांच करना और उसमें जरूरी सुधार करना है।
इस दौरान पात्र मतदाताओं की जानकारी की पुष्टि की जाती है। साथ ही, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और गलत प्रविष्टियों को सुधारने जैसी प्रक्रियाएं भी महत्वपूर्ण होती हैं।
हालांकि, एसआईआर की प्रक्रिया और चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर विवाद सामने आए हैं। आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि कुछ महत्वपूर्ण निर्णय दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद आगे बढ़ाए गए।
यह विवाद चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़ी रिपोर्टों के बाद तेज हुआ। रिपोर्टों में दावा किया गया था कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ मामलों में अपनी टिप्पणियां दर्ज की थीं।
इसके बाद आयोग के फैसलों और मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका को लेकर कानूनी सवाल उठे। अब आयोग ने अपने हलफनामे में इन आरोपों का जवाब दिया है।
मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगे आरोपों को आयोग ने नकारा
मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और एसआईआर से जुड़े निर्णयों पर सवाल उठाए गए थे। याचिका में यह मुद्दा भी उठाया गया कि क्या कुछ फैसले आयोग के सभी सदस्यों की सहमति के बिना लिए गए थे।
चुनाव आयोग ने अपने जवाब में इस आरोप को खारिज किया। आयोग का कहना है कि एसआईआर से संबंधित तीनों प्रमुख आदेश सामूहिक निर्णय थे।
उसने यह भी तर्क दिया कि याचिका में लगाए गए आरोप मुख्य रूप से एक समाचार रिपोर्ट पर आधारित हैं। आयोग के अनुसार, याचिकाकर्ता ने आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है। इसी आधार पर आयोग ने याचिका की स्वीकार्यता पर भी सवाल उठाए हैं।
हालांकि, आयोग का पक्ष सामने आना और अदालत का अंतिम निर्णय अलग-अलग बातें हैं। हलफनामे में दी गई दलीलों पर सुनवाई के दौरान विचार किया जाएगा। इसके बाद ही मामले में आगे की कानूनी स्थिति स्पष्ट होगी।
फॉर्म-6 में बदलाव के आरोपों पर भी दी सफाई
इस विवाद का एक प्रमुख हिस्सा फॉर्म-6 से जुड़ा है। यह फॉर्म नए मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
आरोपों में कहा गया था कि एसआईआर से संबंधित आदेशों के जरिए फॉर्म-6 में बदलाव किए गए। चुनाव आयोग ने इस आरोप को खारिज किया है।
आयोग के अनुसार, फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं किया गया। उसका कहना है कि यह फॉर्म निर्धारित कानूनी नियमों के तहत आता है और इसमें औपचारिक बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि एसआईआर के दौरान इस्तेमाल किया गया घोषणा-पत्र फॉर्म-6 से अलग दस्तावेज है। इसके जरिए आवेदकों की जानकारी और पुराने मतदाता रिकॉर्ड के बीच मिलान करने में मदद मिलती है।
इसलिए आयोग का तर्क है कि अलग घोषणा-पत्र का इस्तेमाल करना फॉर्म-6 में संशोधन करने के बराबर नहीं है।
यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मतदाता पंजीकरण से जुड़े दस्तावेजों का सीधा संबंध नागरिकों के मताधिकार से है। अदालत में इस विषय पर उठाए गए सवालों का जवाब कानूनी नियमों और संबंधित दस्तावेजों के आधार पर तय होगा।
चुनाव आयोग में फैसले लेने की प्रक्रिया क्या है?
चुनाव आयोग ने हलफनामे में अपनी आंतरिक प्रक्रिया का भी उल्लेख किया है। आयोग के अनुसार, किसी मामले से जुड़ी फाइल सामान्य तौर पर पहले एक चुनाव आयुक्त के पास जाती है। इसके बाद दूसरे चुनाव आयुक्त और फिर मुख्य चुनाव आयुक्त के सामने रखी जाती है।
इस प्रक्रिया के दौरान अधिकारी और आयुक्त अपने सुझाव दे सकते हैं। वे किसी प्रस्ताव पर सवाल भी उठा सकते हैं। आयोग का कहना है कि ये टिप्पणियां निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं।
आयोग ने यह भी बताया कि कुछ जरूरी मामलों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मंजूरी ली जा सकती है। ऐसी स्थिति में संबंधित मंजूरी को बाद में फाइल में दर्ज किया जाता है।
इसके अलावा, आयोग के अनुसार फैसले जहां संभव हो, सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। जरूरत पड़ने पर लागू कानून के तहत बहुमत से भी निर्णय लिया जा सकता है।
इस स्पष्टीकरण का उद्देश्य यह बताना है कि फाइल पर दर्ज हर टिप्पणी अंतिम निर्णय नहीं होती। हालांकि, किसी फैसले से पहले सभी संबंधित सदस्यों को जानकारी और विचार रखने का उचित अवसर मिला या नहीं, यह अलग सवाल है।
जुलाई के कार्य आवंटन आदेश का भी किया जिक्र
हलफनामे में आयोग के भीतर काम के बंटवारे से जुड़े एक आदेश का भी उल्लेख किया गया है। यह आदेश 28 जुलाई 2026 को एक वरिष्ठ अधिकारी ने जारी किया था।
इसके बाद दोनों चुनाव आयुक्तों ने 29 जुलाई को कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखे थे। इन पत्रों में आदेश और संबंधित अधिकारी के आचरण से जुड़ा मामला उठाया गया था।
आयोग के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों के 30 जुलाई के संयुक्त निर्देश के बाद यह आदेश लागू नहीं किया गया। आयोग ने इस घटनाक्रम का जिक्र अपने जवाब में किया है।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि विवाद केवल एसआईआर के फैसलों तक सीमित नहीं रहा। आयोग के भीतर कामकाज, अधिकारियों की भूमिका और सदस्यों के बीच संवाद को लेकर भी सवाल उठे हैं।
हलफनामे में आयोग ने अपने पक्ष को स्पष्ट किया है। फिर भी, इस घटनाक्रम से जुड़े सभी सवालों का अंतिम समाधान न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर ही होगा।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी नजरें
चुनाव आयोग का हलफनामा दाखिल होने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई महत्वपूर्ण हो गई है। अदालत के सामने आयोग की दलीलों के साथ याचिकाकर्ताओं की आपत्तियां भी रहेंगी।
सुनवाई में यह देखा जा सकता है कि एसआईआर से जुड़े फैसले किस प्रक्रिया के तहत लिए गए। साथ ही, फॉर्म-6 और अलग घोषणा-पत्र के बीच अंतर से जुड़े तर्कों पर भी ध्यान दिया जा सकता है।
इस मामले में एक अहम सवाल यह है कि क्या आयोग ने सभी निर्णय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार लिए। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि आयोग के सदस्यों को फैसलों की जानकारी किस समय और किस तरह दी गई।
अभी आयोग की ओर से दाखिल हलफनामा उसका आधिकारिक पक्ष है। इसे अदालत के अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। आगे की सुनवाई से मामले की कानूनी स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।
निष्कर्ष
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर दावा किया है कि एसआईआर से जुड़े तीन प्रमुख आदेश सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर एकतरफा फैसले लेने के आरोपों को खारिज किया है। साथ ही, उसने फॉर्म-6 में बदलाव के आरोपों पर भी सफाई दी है।
दूसरी ओर, आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और फैसलों के समय सदस्यों को जानकारी देने से जुड़े सवाल अभी महत्वपूर्ण हैं। अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से पता चलेगा कि इन दलीलों और आपत्तियों पर अदालत का रुख क्या रहता है। इस मामले का आगे का घटनाक्रम मतदाता सूची की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, दोनों के लिहाज से अहम होगा।

