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पायलटों के लिए सालाना ड्रग टेस्ट! एयर इंडिया घटना के बाद सरकार का बड़ा प्लान

एयर इंडिया घटना के बाद सिविल एविएशन मंत्रालय द्वारा सभी कमर्शियल पायलटों के लिए सालाना रैंडम ड्रग टेस्ट अनिवार्य करने के फैसले को दर्शाता News Critic का बैनर।

एयर इंडिया की हालिया उड़ान घटना के बाद पायलट ड्रग टेस्ट को लेकर केंद्र सरकार नियम और सख्त करने पर विचार कर रही है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय का प्रस्ताव है कि हर कमर्शियल पायलट का साल में कम से कम एक बार रैंडम तरीके से ड्रग टेस्ट किया जाए।
फिलहाल DGCA के नियमों के तहत हर साल पायलट नेटवर्क के कम से कम 10% लोगों की रैंडम जांच होती है। नए प्रस्ताव से यह कवरेज बढ़कर 100% हो सकती है।

पायलट ड्रग टेस्ट को लेकर सरकार का बड़ा प्लान

केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने 25 अगस्त को बताया कि सरकार सभी कमर्शियल पायलटों के लिए सालाना रैंडम ड्रग टेस्ट की संभावना पर विचार कर रही है। DGCA इस मुद्दे पर एयरलाइंस, पायलट संगठनों और दूसरे संबंधित पक्षों से बातचीत कर रहा है।

मंत्री के मुताबिक, मौजूदा नियम में हर साल कुल पायलट नेटवर्क के 10% की रैंडम जांच का प्रावधान है। अब विचार यह है कि हर पायलट को साल में कम से कम एक बार बिना पूर्व सूचना के जांच के दायरे में लाया जाए।

हालांकि, यह अभी प्रस्ताव और विचार-विमर्श के स्तर पर है। सरकार सुरक्षा जरूरतों के साथ इस व्यवस्था के संचालन पर पड़ने वाले असर को भी देख रही है।

एयर इंडिया की घटना के बाद बढ़ी चिंता

नए पायलट ड्रग टेस्ट प्रस्ताव का सीधा संबंध 4 अगस्त 2026 को हुई एयर इंडिया की घटना से जोड़ा जा रहा है। एयर इंडिया की फुकेत-दिल्ली उड़ान के दौरान विमान ने अचानक करीब 300 फीट की ऊंचाई खो दी थी।

इस घटना में 20 यात्री और चार केबिन क्रू सदस्य घायल हुए थे। मामले की जांच अभी एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो यानी AAIB कर रहा है।

घटना के बाद विमान के कैप्टन का ड्रग टेस्ट किया गया था। रिपोर्टों के अनुसार, पुष्टि वाली जांच में मारिजुआना के लिए टेस्ट पॉजिटिव आया। इसके बाद पायलटों की जांच व्यवस्था को लेकर सवाल उठे और सरकार ने मौजूदा नियमों की समीक्षा के निर्देश दिए।

हादसे की जांच अभी जारी

यह ध्यान रखना जरूरी है कि ड्रग टेस्ट में पॉजिटिव परिणाम और विमान की घटना के बीच सीधा कारणात्मक संबंध अभी जांच से साबित नहीं हुआ है।

AAIB इस पूरे मामले की अलग से जांच कर रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, विमान में हाइड्रोलिक और कंट्रोल सिस्टम से जुड़े कुछ तकनीकी मुद्दों की भी जांच की जा रही है। इसलिए घटना के अंतिम कारण पर निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

अभी सिर्फ 10% पायलटों की होती है रैंडम जांच

मौजूदा DGCA नियमों के अनुसार, शेड्यूल्ड कमर्शियल एयरलाइंस और एयर नेविगेशन सेवा प्रदाताओं को हर साल अपने विमानन कर्मचारियों के कम से कम 10% का रैंडम साइकोएक्टिव सब्सटेंस टेस्ट कराना होता है। इसमें पायलट और एयर ट्रैफिक कंट्रोलर जैसे सुरक्षा से जुड़े कर्मचारी शामिल हैं।

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई कर्मचारी ड्यूटी के दौरान ऐसे पदार्थ के प्रभाव में न हो, जो उसकी कार्यक्षमता और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।

अब सरकार इस कवरेज को काफी बढ़ाने पर विचार कर रही है।

10% से 100% तक हो सकता है दायरा

अगर प्रस्ताव लागू होता है तो हर कमर्शियल पायलट को साल में कम से कम एक बार रैंडम टेस्ट देना होगा। इसका मतलब मौजूदा न्यूनतम 10% कवरेज की तुलना में जांच का दायरा कई गुना बढ़ जाएगा।

हालांकि, सरकार को इसके लिए अतिरिक्त टेस्टिंग व्यवस्था, मेडिकल स्टाफ, प्रयोगशालाओं और एयरलाइन स्तर पर बेहतर समन्वय की जरूरत होगी।

एयर इंडिया ने करीब 5 हजार पायलटों की जांच शुरू की

घटना के बाद एयर इंडिया समूह ने अपने सभी पायलटों की एक बार अनिवार्य साइकोएक्टिव सब्सटेंस टेस्टिंग शुरू की। रिपोर्टों के अनुसार, एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस के करीब 5,000 पायलटों को इस प्रक्रिया में शामिल किया गया।

यह कदम मौजूदा DGCA नियमों के तहत होने वाली नियमित रैंडम जांच से अलग था। इसका उद्देश्य घटना के बाद आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना था।

एयरलाइन की ओर से नियमित रैंडम टेस्टिंग जारी रखने की भी जानकारी सामने आई है।

ड्रग टेस्ट में किन पदार्थों की जांच होती है?

DGCA की मौजूदा व्यवस्था में साइकोएक्टिव पदार्थों की कई श्रेणियों की जांच की जाती है। इसके लिए आमतौर पर यूरिन सैंपल लिया जाता है।

जांच में मुख्य रूप से इन श्रेणियों को शामिल किया जाता है:

  • एम्फेटामाइन और उससे जुड़े स्टिमुलेंट
  • ओपिएट्स और उनके मेटाबोलाइट्स
  • कैनाबिस यानी THC
  • कोकीन
  • बार्बिट्यूरेट्स
  • बेंज़ोडायजेपाइन्स

इस तरह की जांच का उद्देश्य ड्यूटी पर मौजूद विमानन कर्मियों में प्रतिबंधित या प्रभावित करने वाले पदार्थों के इस्तेमाल की पहचान करना है।

पॉजिटिव टेस्ट आने पर क्या होता है?

सिर्फ शुरुआती स्क्रीनिंग में पॉजिटिव या ‘नॉन-नेगेटिव’ परिणाम आने पर इसे अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता। ऐसे मामले में संबंधित कर्मचारी को तुरंत उड़ान ड्यूटी से हटाया जा सकता है और दूसरे सैंपल की पुष्टि वाली जांच कराई जाती है।

इसकी जरूरत इसलिए होती है क्योंकि शुरुआती टेस्ट में कुछ दवाओं, खाद्य पदार्थों या तकनीकी कारणों से गलत परिणाम भी आ सकता है।

यदि पुष्टि वाली जांच भी पॉजिटिव आती है तो मेडिकल रिव्यू की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसके बाद यह देखा जाता है कि परिणाम किसी वैध चिकित्सकीय उपचार की वजह से तो नहीं आया।

पहली बार पॉजिटिव होने पर कार्रवाई

मौजूदा नियमों के अनुसार, पहली बार पुष्टि वाला पॉजिटिव परिणाम मिलने पर कर्मचारी को विशेषज्ञ डॉक्टर, काउंसलर या डी-एडिक्शन सेंटर में पुनर्वास कार्यक्रम के लिए भेजा जा सकता है।

ड्यूटी पर लौटने के लिए उसे दोबारा टेस्ट में नेगेटिव रिपोर्ट और संबंधित मेडिकल अधिकारी से फिटनेस प्रमाणपत्र हासिल करना होता है।

बार-बार पॉजिटिव परिणाम मिलने पर कार्रवाई और सख्त हो जाती है। दूसरी बार पॉजिटिव होने पर लाइसेंस तीन साल के लिए निलंबित किया जा सकता है, जबकि तीसरी बार लाइसेंस रद्द किए जाने का प्रावधान बताया गया है।

पायलट संगठनों ने भी बढ़ाने की मांग की

सरकार के मौजूदा प्रस्ताव से पहले फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स ने भी रैंडम ड्रग टेस्ट का दायरा बढ़ाने की मांग की थी। संगठन ने मौजूदा 10% कवरेज को बढ़ाकर कम से कम 25% करने का सुझाव दिया था।

पायलट संगठन ने यूरिन टेस्ट के साथ ओरल-फ्लूड यानी लार के जरिए जांच को भी शामिल करने का सुझाव दिया था। इसका उद्देश्य टेस्ट प्रक्रिया को तेज करना और ऑपरेशन पर पड़ने वाले असर को कम करना है।

अब सरकार 100% सालाना जांच के विकल्प पर विचार कर रही है। इससे इस मुद्दे पर चर्चा और महत्वपूर्ण हो गई है।

सरकार के सामने क्या हैं चुनौतियां?

हर पायलट का सालाना रैंडम टेस्ट कराने से विमानन सुरक्षा मजबूत हो सकती है, लेकिन इसके साथ कई व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं।

सबसे बड़ी चुनौती हजारों पायलटों की नियमित जांच की व्यवस्था बनाना होगी। इसके लिए पर्याप्त प्रमाणित प्रयोगशालाएं, मेडिकल विशेषज्ञ और तेज रिपोर्टिंग सिस्टम जरूरी होंगे।

इसके अलावा टेस्ट के कारण उड़ानों में देरी या पायलट की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है। नागरिक उड्डयन मंत्री ने भी सुरक्षा के साथ ऑपरेशनल प्रभाव को संतुलित करने की जरूरत बताई है।

रैंडम टेस्ट का फायदा क्या होगा?

रैंडम जांच की खासियत यह है कि पायलट को टेस्ट का समय पहले से पता नहीं होगा। इससे ड्यूटी से पहले पदार्थों के इस्तेमाल को रोकने में निवारक प्रभाव पैदा हो सकता है।

अगर हर पायलट को साल में कम से कम एक बार जांच से गुजरना होगा तो सिस्टम की निगरानी पहले की तुलना में व्यापक हो जाएगी।

हालांकि, टेस्टिंग के साथ सही प्रक्रिया और गोपनीयता बनाए रखना भी जरूरी होगा। गलत पॉजिटिव परिणाम से किसी पायलट के करियर पर गंभीर असर पड़ सकता है।

क्या सभी विमानन कर्मचारियों की भी जांच होगी?

मौजूदा DGCA नियम केवल पायलटों तक सीमित नहीं हैं। सुरक्षा से जुड़े अन्य विमानन कर्मचारी भी साइकोएक्टिव सब्सटेंस टेस्टिंग के दायरे में आते हैं।

इनमें एयर ट्रैफिक कंट्रोलर, एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर, सर्टिफाइंग स्टाफ, प्रशिक्षु पायलट, इंस्ट्रक्टर और एग्जामिनर जैसे कर्मचारी शामिल हो सकते हैं।

इसलिए भविष्य में नियमों में बदलाव होने पर पूरे सुरक्षा तंत्र की टेस्टिंग व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।

भारत की विमानन सुरक्षा के लिए क्यों अहम है कदम?

भारत में हवाई यात्रा तेजी से बढ़ रही है। नई एयरलाइंस, नए विमान और बढ़ती यात्री संख्या के बीच सुरक्षा मानकों को मजबूत रखना जरूरी है।

पायलट किसी भी उड़ान की सुरक्षा व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में शामिल होते हैं। ऐसे में उनकी मानसिक और शारीरिक फिटनेस के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि वे किसी साइकोएक्टिव पदार्थ के प्रभाव में ड्यूटी न कर रहे हों।

पायलट ड्रग टेस्ट का दायरा बढ़ाने से निगरानी व्यवस्था मजबूत हो सकती है। लेकिन इसे वैज्ञानिक, पारदर्शी और व्यावहारिक तरीके से लागू करना उतना ही जरूरी होगा।

अब आगे क्या होगा?

DGCA फिलहाल इस प्रस्ताव पर संबंधित पक्षों से चर्चा कर रहा है। इसमें एयरलाइंस, पायलट संगठनों और अन्य विमानन हितधारकों की राय ली जा रही है।

सरकार को यह तय करना होगा कि हर पायलट की सालाना जांच किस तरीके से होगी और इससे एयरलाइन संचालन पर कितना असर पड़ेगा।

इसके बाद मौजूदा नियमों में संशोधन या नई व्यवस्था लागू करने को लेकर फैसला हो सकता है। फिलहाल 100% सालाना रैंडम टेस्टिंग एक विचाराधीन प्रस्ताव है, अंतिम नियम नहीं।

निष्कर्ष

पायलट ड्रग टेस्ट को लेकर केंद्र सरकार का नया प्रस्ताव एयर इंडिया की 4 अगस्त की घटना के बाद सामने आया है। सरकार सभी कमर्शियल पायलटों का साल में कम से कम एक बार रैंडम टेस्ट कराने पर विचार कर रही है, जबकि मौजूदा व्यवस्था में कम से कम 10% पायलट नेटवर्क की सालाना जांच होती है।

अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो विमानन सुरक्षा की निगरानी का दायरा काफी बढ़ जाएगा। हालांकि, अंतिम फैसला लेने से पहले सुरक्षा, टेस्ट की विश्वसनीयता, पायलटों की उपलब्धता और एयरलाइन संचालन पर पड़ने वाले असर को संतुलित करना जरूरी होगा।

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