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धामी सरकार पर कांग्रेस का हमला: जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट समेत सरकारी जमीन निजी हाथों में सौंपने का आरोप

धामी सरकार पर जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की सरकारी जमीन निजी हाथों में सौंपने का आरोप लगाती कांग्रेस — न्यूज़ क्रिटिक

उत्तराखंड में सरकारी जमीनों और ऐतिहासिक संपत्तियों को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार पर बेशकीमती सरकारी जमीन निजी कंपनियों को सौंपने का आरोप लगाया है। इस मुद्दे पर पार्टी ने प्रदेशभर में ‘भूमि बचाओ-धामी हटाओ’ अभियान शुरू किया है।

कांग्रेस के निशाने पर मसूरी का ऐतिहासिक जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट भी है। पार्टी का कहना है कि प्रदेश की प्राकृतिक और ऐतिहासिक संपत्तियों का इस्तेमाल निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। वहीं, राज्य सरकार ने आरोपों को खारिज करते हुए जमीन के योजनाबद्ध इस्तेमाल को आर्थिक विकास से जोड़ा है।

कांग्रेस ने शुरू किया ‘भूमि बचाओ-धामी हटाओ’ अभियान

उत्तराखंड कांग्रेस ने 4 नवंबर 2026 को राज्यव्यापी ‘भूमि बचाओ-धामी हटाओ’ अभियान शुरू किया। इसके तहत प्रदेश के अलग-अलग शहरों में विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए। पार्टी नेताओं ने सरकारी जमीन और ऐतिहासिक संपत्तियों को निजी हाथों में देने के फैसलों पर सवाल उठाए।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने मसूरी में जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट के पास प्रदर्शन का नेतृत्व किया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की जमीन, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रदेश की जनता की धरोहर हैं।

कांग्रेस का आरोप है कि सरकार इन संपत्तियों को निजी कंपनियों के हवाले कर रही है। पार्टी ने मांग की कि जमीन आवंटन से जुड़े फैसलों की पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए।

इसके अलावा कांग्रेस ने सरकार से ऐसे फैसलों पर दोबारा विचार करने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि सरकारी संपत्तियों का उपयोग स्थानीय लोगों और प्रदेश के विकास के हित में होना चाहिए।

जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट को लेकर क्यों उठा विवाद?

मसूरी स्थित जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट उत्तराखंड का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और पर्यटन स्थल है। इसका संबंध प्रसिद्ध ब्रिटिश सर्वेयर जनरल जॉर्ज एवरेस्ट से है। यहां से आसपास की पहाड़ियों और हिमालयी क्षेत्र का सुंदर दृश्य दिखाई देता है।

इस संपत्ति की जमीन को निजी कंपनी को लीज पर देने को लेकर कांग्रेस ने आपत्ति जताई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल के अनुसार, लगभग 144 हेक्टेयर भूमि आचार्य बालकृष्ण से जुड़ी कंपनी को सालाना एक करोड़ रुपये के लीज रेंट पर दी गई है।

गोदियाल ने सवाल उठाया कि इतनी महत्वपूर्ण संपत्ति से प्रदेश को कितना आर्थिक लाभ मिलेगा। उनका कहना है कि इस स्थान को सरकारी स्तर पर विकसित करके स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते थे।

उन्होंने लीज की शर्तों और जमीन के मूल्यांकन को लेकर भी सवाल उठाए। कांग्रेस की मांग है कि सरकार पूरी प्रक्रिया और संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करे।

हालांकि, कांग्रेस के इन आरोपों और सवालों को सरकार का अंतिम पक्ष नहीं माना जा सकता। जमीन के आवंटन की शर्तों और आर्थिक लाभ का आकलन आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर होना जरूरी है।

40 सरकारी संपत्तियों को लेकर कांग्रेस ने उठाए सवाल

कांग्रेस महासचिव और उत्तराखंड प्रभारी कुमारी सैलजा ने भी इस मामले में सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश के 13 में से 12 जिलों में लगभग 40 सरकारी जमीनों और ऐतिहासिक संपत्तियों से जुड़े फैसले किए जा रहे हैं।

कांग्रेस ने इन संपत्तियों का अनुमानित बाजार मूल्य करीब एक लाख करोड़ रुपये बताया है। पार्टी का आरोप है कि सरकारी जमीनों को कम कीमत पर निजी कंपनियों के उपयोग के लिए दिया जा रहा है।

कुमारी सैलजा ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को इन फैसलों के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी विभागों की जमीनों को निजी उपयोग के लिए उपलब्ध कराने में मुख्यमंत्री की मंजूरी महत्वपूर्ण रही है।

कांग्रेस ने इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की मांग की है। पार्टी चाहती है कि जमीनों की वास्तविक कीमत, लीज की अवधि और निवेश से जुड़ी शर्तों का विवरण जनता के सामने रखा जाए।

यहां ध्यान देना जरूरी है कि एक लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा कांग्रेस का दावा है। इसे सरकार द्वारा प्रमाणित मूल्यांकन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

सरकार ने आरोपों पर क्या जवाब दिया?

कांग्रेस के आरोपों के बाद उत्तराखंड सरकार ने अपना पक्ष सामने रखा है। प्रमुख सचिव नियोजन आर. मीनाक्षी सुंदरम ने 4 नवंबर को स्पष्ट किया कि सरकार बड़े पैमाने पर सरकारी जमीन निजी हाथों में देने की योजना नहीं चला रही है।

उनके अनुसार, राज्य में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए कुछ चुनिंदा सरकारी भूखंड चिह्नित किए गए हैं। इनका उपयोग निवेश आकर्षित करने और रोजगार के अवसर विकसित करने के लिए किया जाएगा।

सरकार ने कहा कि सरकारी संपत्तियों का योजनाबद्ध इस्तेमाल प्रदेश की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है। इससे पर्यटन, आतिथ्य और अन्य क्षेत्रों में नई परियोजनाएं शुरू करने का अवसर मिलेगा।

प्रमुख सचिव ने यह भी बताया कि अगले दो से तीन महीनों में लगभग छह से सात चयनित भूखंडों के लिए बोली प्रक्रिया शुरू करने का लक्ष्य है।

सरकार का कहना है कि इन परियोजनाओं का उद्देश्य सरकारी संपत्तियों को उत्पादक बनाना है। इसके माध्यम से राज्य को राजस्व मिलने के साथ स्थानीय कारोबारियों और युवाओं को भी लाभ पहुंच सकता है।

जमीन बेचने और लीज पर देने में क्या अंतर है?

इस विवाद में जमीन के स्वामित्व और उसके उपयोग का अंतर समझना जरूरी है। सरकारी जमीन बेचने और उसे निश्चित अवधि के लिए लीज पर देने की प्रक्रिया अलग-अलग होती है।

बिक्री होने पर संपत्ति का स्वामित्व नए खरीदार को स्थानांतरित हो सकता है। वहीं, लीज में जमीन का मालिकाना हक सरकारी विभाग के पास रह सकता है। निजी कंपनी को तय शर्तों के अनुसार निर्धारित अवधि तक उपयोग का अधिकार मिलता है।

उत्तराखंड सरकार का कहना है कि परिसंपत्ति मुद्रीकरण का उद्देश्य सरकारी जमीन बेचना नहीं है। सरकार के अनुसार, इन परियोजनाओं में सरकारी स्वामित्व, नियामक नियंत्रण और जरूरत पड़ने पर संपत्ति वापस लेने का अधिकार सुरक्षित रहेगा।

दूसरी ओर, कांग्रेस का सवाल है कि लीज की शर्तें जनता के हित में हैं या नहीं। पार्टी चाहती है कि जमीन का मूल्यांकन और चयन प्रक्रिया सार्वजनिक हो।

इसलिए विवाद केवल जमीन के स्वामित्व तक सीमित नहीं है। इसमें लीज की अवधि, किराया, निवेश और स्थानीय लोगों को मिलने वाले लाभ जैसे मुद्दे भी शामिल हैं।

प्रदेश के कई शहरों में हुआ विरोध प्रदर्शन

कांग्रेस ने इस अभियान को केवल मसूरी तक सीमित नहीं रखा। प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने विरोध कार्यक्रमों का नेतृत्व किया।

हरीश रावत ने हरिद्वार में अभियान के तहत प्रदर्शन किया। वहीं, प्रदेश चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने विकासनगर क्षेत्र में मोर्चा संभाला।

इसके अलावा हरक सिंह रावत ने ऋषिकेश में और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने नैनीताल में विरोध कार्यक्रमों का नेतृत्व किया।

मसूरी में प्रदर्शन के दौरान भाजपा और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच तनाव भी देखने को मिला। जॉर्ज एवरेस्ट की जमीन के मुद्दे पर दोनों पक्षों के कार्यकर्ताओं के बीच धक्का-मुक्की की खबर सामने आई।

इस घटनाक्रम ने जमीन आवंटन के विवाद को और राजनीतिक चर्चा में ला दिया। कांग्रेस ने संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे को आगे भी उठाती रहेगी।

स्थानीय लोगों और युवाओं के हितों का मुद्दा

उत्तराखंड में सरकारी जमीन का इस्तेमाल केवल आर्थिक विषय नहीं है। इसका संबंध स्थानीय लोगों के अधिकारों, रोजगार और पर्यटन विकास से भी जुड़ा है।

प्रदेश के कई क्षेत्र पर्यटन पर निर्भर हैं। ऐसे में ऐतिहासिक स्थलों और प्राकृतिक संसाधनों का सही प्रबंधन स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है।

कांग्रेस का कहना है कि सरकारी जमीनों का इस्तेमाल स्थानीय युवाओं को रोजगार देने के लिए होना चाहिए। पार्टी निजी कंपनियों को जमीन देने की प्रक्रिया में स्थानीय हितों को प्राथमिकता देने की मांग कर रही है।

वहीं, सरकार का तर्क है कि निजी निवेश से पर्यटन और आतिथ्य क्षेत्र में नई गतिविधियां विकसित हो सकती हैं। इससे रोजगार और सरकारी राजस्व दोनों बढ़ने की संभावना है।

हालांकि, किसी भी परियोजना का वास्तविक लाभ उसकी शर्तों और क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा। इसलिए पारदर्शिता और जवाबदेही इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण हैं।

आगे क्या होगा?

फिलहाल कांग्रेस ने सरकारी जमीनों से जुड़े फैसलों की समीक्षा की मांग तेज कर दी है। पार्टी ने कहा है कि वह इस मुद्दे को राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर उठाएगी।

वहीं, सरकार की ओर से चयनित भूखंडों के लिए बोली प्रक्रिया आगे बढ़ाने की तैयारी है। ऐसे में संबंधित जमीनों का मूल्यांकन, निवेश की शर्तें और सरकारी नियंत्रण महत्वपूर्ण होंगे।

आने वाले समय में जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट सहित अन्य संपत्तियों से जुड़े दस्तावेजों और फैसलों पर राजनीतिक चर्चा जारी रह सकती है।

अब यह देखना होगा कि सरकार कांग्रेस की मांगों पर क्या कदम उठाती है। साथ ही, क्या जमीन आवंटन से जुड़ी पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाती है या नहीं, इस पर भी नजर रहेगी।

निष्कर्ष

उत्तराखंड में धामी सरकार पर कांग्रेस का हमला सरकारी जमीनों और ऐतिहासिक संपत्तियों के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है। जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट सहित कई संपत्तियों को लेकर कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं।

दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि चुनिंदा सरकारी भूखंडों का इस्तेमाल निवेश, रोजगार और आर्थिक विकास के लिए किया जा रहा है। अब इस मामले में पारदर्शिता, लीज की शर्तें और स्थानीय लोगों के हित सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे होंगे।

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