मतदाता सूची पुनरीक्षण पर फिरहाद हकीम का बयान—“यह मुद्दा भाजपा पर पड़ सकता है भारी”
चुनावी माहौल और जमीनी हकीकत
फिरहाद हकीम, जो तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और कोलकाता के महापौर हैं, ने सोमवार को कहा कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) का असर आने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ जा सकता है। उन्होंने दावा किया कि राज्य के लोग अब भी ममता बनर्जी के साथ मजबूती से खड़े हैं।
हकीम ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा कि इस बार भाजपा का प्रचार पहले से ज्यादा आक्रामक जरूर है, क्योंकि उसके कई बड़े केंद्रीय नेता लगातार राज्य का दौरा कर रहे हैं। इससे चुनावी माहौल में हलचल तो दिख रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है। उनके मुताबिक, भाजपा के पास बंगाल में मजबूत स्थानीय नेतृत्व की कमी है, इसलिए उसे अपने राष्ट्रीय नेताओं पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि जनता का भरोसा अभी भी तृणमूल कांग्रेस पर कायम है और लोग ममता बनर्जी को चौथी बार मुख्यमंत्री बनाने के लिए तैयार हैं।
मतदाता सूची पुनरीक्षण पर नाराजगी का दावा
फिरहाद हकीम ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) को लेकर भाजपा और चुनाव आयोग पर अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया ने तृणमूल कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के बजाय आम मतदाताओं में नाराजगी पैदा कर दी है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर किसी परिवार के सात सदस्यों में से दो लोगों के नाम सूची से हटा दिए जाते हैं, तो बाकी परिवार के सदस्य भी इससे नाराज होंगे। उनका कहना था कि जिन लोगों का वोट देने का अधिकार था लेकिन वे मतदान नहीं कर सके, वे इस बात को लंबे समय तक याद रखेंगे।
हकीम के अनुसार, यह गुस्सा आने वाले चुनाव में भाजपा के खिलाफ जा सकता है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से जुड़े मुद्दे को लोग गंभीरता से ले रहे हैं और इसका असर मतदान के समय देखने को मिल सकता है।
एनआरसी और सभी समुदायों पर असर की बात
हकीम ने अपने बयान में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि हर चुनाव से पहले भाजपा ऐसे मुद्दे उठाती है, जो सीधे तौर पर जनता को प्रभावित करते हैं। पिछली बार एनआरसी का मुद्दा था और इस बार मतदाता सूची का मामला सामने आया है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि मतदाता सूची पुनरीक्षण का असर किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी वर्गों के लोग इससे प्रभावित हुए हैं। उनके अनुसार, जब कंप्यूटर के जरिए डाटा का मिलान होता है, तो यह नहीं देखा जाता कि व्यक्ति किस धर्म से जुड़ा है। तकनीकी गड़बड़ियों के कारण हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों के नाम सूची से हट सकते हैं।
हकीम ने कहा कि इस तरह की प्रक्रियाओं से आम लोगों में असंतोष बढ़ता है, और यही असंतोष चुनाव में राजनीतिक परिणामों को प्रभावित कर सकता है।
