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भोपाल में तैयार हुई देश की पहली स्वदेशी अफ्रीकन स्वाइन फीवर वैक्सीन, सुअर पालन क्षेत्र को मिलेगी बड़ी राहत

भोपाल में बड़ी उपलब्धि: देश की पहली स्वदेशी अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) वैक्सीन तैयार - न्यूज़ क्रिटिक।
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भारत ने पशु स्वास्थ्य और जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। भोपाल स्थित राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशुरोग संस्थान (NIHSAD) के वैज्ञानिकों ने देश की पहली स्वदेशी अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) वैक्सीन विकसित कर ली है। इस वैक्सीन को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के स्थापना दिवस समारोह में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राष्ट्र को समर्पित किया।

यह उपलब्धि न केवल भारत के पशुपालन क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक मानी जा रही है, बल्कि इससे देशभर के लाखों सुअर पालकों को बड़ी आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद है। अफ्रीकन स्वाइन फीवर एक अत्यंत घातक वायरल बीमारी है, जिसकी वजह से संक्रमित सुअरों की मृत्यु दर लगभग 100 प्रतिशत तक हो सकती है। अब तक इस बीमारी से बचाव के लिए भारत में कोई स्वदेशी वैक्सीन उपलब्ध नहीं थी।

क्या है अफ्रीकन स्वाइन फीवर?

अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) सुअरों में फैलने वाला एक अत्यंत संक्रामक वायरल रोग है। यह बीमारी केवल घरेलू और जंगली सुअरों को प्रभावित करती है। हालांकि यह वायरस इंसानों में संक्रमण नहीं फैलाता, लेकिन पशुधन उद्योग को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाता है।

भारत में यह बीमारी पहली बार वर्ष 2020 में सामने आई थी। इसके बाद कई राज्यों में हजारों सुअरों की मौत हुई और सुअर पालन से जुड़े किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। बीमारी पर नियंत्रण के लिए संक्रमित पशुओं को नष्ट करना ही सबसे प्रभावी उपाय माना जाता था।

भोपाल के वैज्ञानिकों ने रचा इतिहास

इस वैक्सीन का विकास भोपाल स्थित राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशुरोग संस्थान (NIHSAD) के वैज्ञानिकों ने वर्षों के शोध के बाद किया है। संस्थान के निदेशक डॉ. अनिकेत सान्याल के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की टीम ने इस परियोजना को सफल बनाया।

वैक्सीन विकसित करने वाली टीम में डॉ. डी. सेंथिल कुमार, डॉ. के. राजूकुमार, डॉ. जी. वेंकटेश और डॉ. फतेह सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह वैक्सीन भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विकसित की गई है और परीक्षणों में इसके सकारात्मक परिणाम मिले हैं।

वैक्सीन की प्रमुख विशेषताएं

नई स्वदेशी वैक्सीन कई मायनों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसे बड़े पैमाने पर तैयार करना अपेक्षाकृत आसान होगा और यह प्रभावी रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करती है।

वैक्सीन की खास बातें

  • भारत की पहली स्वदेशी ASF वैक्सीन।
  • MA-104 सेल लाइन आधारित तकनीक पर विकसित।
  • सुअरों में मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने में सक्षम।
  • बड़े पैमाने पर उत्पादन की संभावना।
  • देश के सुअर पालकों के लिए किफायती विकल्प बनने की उम्मीद।
  • सफल परीक्षणों के बाद राष्ट्र को समर्पित किया गया।

किसानों और सुअर पालकों को कैसे होगा फायदा?

भारत में पूर्वोत्तर राज्यों सहित कई क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग सुअर पालन से अपनी आजीविका चलाते हैं। अफ्रीकन स्वाइन फीवर के कारण पिछले कुछ वर्षों में किसानों को करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ा।

नई वैक्सीन आने से बीमारी पर नियंत्रण आसान होगा। इससे सुअरों की मृत्यु दर कम करने, उत्पादन बढ़ाने और किसानों की आय सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है। साथ ही पशुधन क्षेत्र में आर्थिक स्थिरता आने की संभावना भी बढ़ेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस उपलब्धि से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और पशुपालन क्षेत्र में निवेश का भरोसा भी बढ़ेगा।

सफल परीक्षण के बाद मिली बड़ी सफलता

इस वैक्सीन का फील्ड ट्रायल सफलतापूर्वक पूरा किया गया। परीक्षण के दौरान वैक्सीन ने सुरक्षा और प्रभावशीलता के अच्छे परिणाम दिए। इसके बाद इसे औपचारिक रूप से देश को समर्पित किया गया।

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह उपलब्धि वर्षों की मेहनत और अनुसंधान का परिणाम है। इससे भारत पशु स्वास्थ्य अनुसंधान के क्षेत्र में नई पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ा है।

भारत के लिए क्यों है यह बड़ी उपलब्धि?

भारत लंबे समय से पशु रोगों की रोकथाम के लिए आयातित तकनीकों और अनुसंधान पर निर्भर रहा है। स्वदेशी वैक्सीन का विकास आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी मजबूती देता है।

यह उपलब्धि केवल एक वैक्सीन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि भारतीय वैज्ञानिक वैश्विक स्तर की चुनौतियों का समाधान विकसित करने में सक्षम हैं। भविष्य में इस तकनीक का उपयोग अन्य देशों के साथ सहयोग और निर्यात के अवसरों के लिए भी किया जा सकता है।

पशुपालन उद्योग को मिलेगा नया भरोसा

अफ्रीकन स्वाइन फीवर के कारण कई राज्यों में सुअर पालन उद्योग प्रभावित हुआ था। बीमारी फैलने पर बड़े पैमाने पर पशुओं को नष्ट करना पड़ता था, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ता था।

नई वैक्सीन के आने से पशुपालकों का भरोसा बढ़ेगा। यदि बड़े स्तर पर इसका उत्पादन और वितरण शुरू होता है, तो आने वाले वर्षों में इस बीमारी से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

सरकार और वैज्ञानिक संस्थानों की भूमिका

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और भोपाल स्थित राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशुरोग संस्थान ने इस परियोजना को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भी पशु स्वास्थ्य से जुड़े अनुसंधान को इसी तरह बढ़ावा दिया गया तो भारत कई अन्य गंभीर पशु रोगों के लिए भी स्वदेशी समाधान विकसित कर सकेगा।

इस उपलब्धि के प्रमुख लाभ

  • सुअर पालन उद्योग को नई सुरक्षा।
  • किसानों के आर्थिक नुकसान में कमी आने की संभावना।
  • पशुधन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा।
  • स्वदेशी अनुसंधान और जैव प्रौद्योगिकी को नई पहचान।
  • भविष्य में निर्यात की संभावनाओं को बल।
  • पशु स्वास्थ्य प्रबंधन को मिलेगा मजबूत आधार।

निष्कर्ष

भोपाल में विकसित देश की पहली स्वदेशी अफ्रीकन स्वाइन फीवर वैक्सीन भारत के पशु स्वास्थ्य क्षेत्र की ऐतिहासिक उपलब्धियों में शामिल हो गई है। यह वैक्सीन न केवल सुअर पालकों को बड़ी राहत देने की क्षमता रखती है, बल्कि देश को पशु चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। यदि इसका बड़े स्तर पर उत्पादन और उपयोग शुरू होता है, तो आने वाले समय में अफ्रीकन स्वाइन फीवर जैसी घातक बीमारी से होने वाले आर्थिक नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकेगा और भारत वैश्विक पशु स्वास्थ्य अनुसंधान में अपनी मजबूत पहचान स्थापित कर सकेगा।

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