मूंग खरीदी पर केंद्र-एमपी में टकराव, 87% कोटा मिलने के बावजूद सिर्फ 2% खरीद; किसानों की बढ़ी चिंता
मध्य प्रदेश में मूंग खरीदी मध्य प्रदेश को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के बीच विवाद गहराता नजर आ रहा है। राज्य को मूंग खरीद के लिए 87 प्रतिशत कोटा मिलने के बावजूद अब तक केवल करीब 2 प्रतिशत खरीद होने की बात सामने आई है। इस स्थिति ने हजारों किसानों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि मंडियों में फसल पहुंचने के बाद भी अपेक्षित गति से सरकारी खरीद नहीं हो पा रही है।
मूंग प्रदेश की प्रमुख दलहनी फसलों में शामिल है और बड़ी संख्या में किसान इसकी खेती करते हैं। ऐसे में सरकारी खरीद की धीमी रफ्तार का सीधा असर किसानों की आय, बाजार भाव और कृषि व्यवस्था पर पड़ सकता है। इस मुद्दे पर अब केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज हो गया है।
मूंग खरीदी मध्य प्रदेश में विवाद क्यों बढ़ा?
मूंग खरीद को लेकर विवाद तब सामने आया जब यह जानकारी आई कि राज्य को बड़ी मात्रा में खरीद की अनुमति मिलने के बावजूद वास्तविक खरीद बेहद कम हुई है। राज्य सरकार का कहना है कि खरीद प्रक्रिया में कई स्तरों पर बाधाएं हैं, जबकि केंद्र का पक्ष है कि निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार खरीद की प्रक्रिया संचालित की जानी चाहिए।
इसी मुद्दे को लेकर दोनों पक्षों के बीच अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। इसका असर सबसे अधिक किसानों पर पड़ रहा है, जो अपनी उपज बेचने के लिए सरकारी खरीद केंद्रों का इंतजार कर रहे हैं।
87% कोटा मिलने का क्या मतलब है?
सरकारी खरीद व्यवस्था में प्रत्येक राज्य को एक निश्चित सीमा तक फसल खरीदने की अनुमति या कोटा दिया जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मध्य प्रदेश को मूंग खरीद के लिए लगभग 87 प्रतिशत तक का कोटा उपलब्ध कराया गया।
इतना बड़ा कोटा मिलने का उद्देश्य अधिक से अधिक किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीद सुनिश्चित करना था। लेकिन वास्तविक खरीद केवल लगभग 2 प्रतिशत तक सीमित रहने से व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।
केवल 2% खरीद होने की वजह क्या बताई जा रही है?
खरीद की धीमी गति के पीछे कई संभावित कारण बताए जा रहे हैं। हालांकि, संबंधित विभागों की ओर से अंतिम और आधिकारिक कारणों पर अलग-अलग बयान सामने आए हैं।
संभावित कारणों में शामिल हैं—
- पंजीकरण और सत्यापन प्रक्रिया में देरी
- खरीद केंद्रों की सीमित क्षमता
- तकनीकी और प्रशासनिक अड़चनें
- गुणवत्ता जांच में समय लगना
- भुगतान प्रक्रिया को लेकर सावधानी
- समन्वय की कमी
इन कारणों के चलते बड़ी संख्या में किसान अपनी उपज बेचने का इंतजार कर रहे हैं।
किसानों पर क्या असर पड़ रहा है?
मूंग की सरकारी खरीद में देरी का सबसे बड़ा असर किसानों पर पड़ रहा है। कई किसान अपनी उपज मंडियों और खरीद केंद्रों तक लेकर पहुंच चुके हैं, लेकिन खरीद की रफ्तार धीमी होने से उन्हें इंतजार करना पड़ रहा है।
इसका असर कई स्तरों पर दिखाई दे रहा है—
- किसानों की नकदी का प्रवाह प्रभावित हो रहा है।
- फसल लंबे समय तक रखने की मजबूरी बढ़ रही है।
- निजी व्यापारियों को कम कीमत पर बेचने का दबाव बन सकता है।
- अगली फसल की तैयारी प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर खरीद नहीं होने से किसानों की लागत और आर्थिक दबाव दोनों बढ़ सकते हैं।
न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का महत्व
सरकार किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की व्यवस्था करती है। यदि खरीद समय पर और पर्याप्त मात्रा में होती है, तो किसानों को बाजार में कम कीमत मिलने की स्थिति से राहत मिलती है।
मूंग जैसी दलहनी फसल के लिए MSP पर खरीद किसानों की आय को स्थिर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए खरीद प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की देरी सीधे किसानों के हितों को प्रभावित करती है।
केंद्र और राज्य सरकार के अलग-अलग दावे
मामले को लेकर केंद्र और राज्य सरकार की ओर से अलग-अलग पक्ष सामने आए हैं।
राज्य सरकार का कहना है कि खरीद प्रक्रिया को तेज करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं और कई प्रशासनिक चुनौतियों का समाधान किया जा रहा है।
वहीं केंद्र का कहना है कि खरीद व्यवस्था निर्धारित नियमों और गुणवत्ता मानकों के अनुसार संचालित की जानी चाहिए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
इसी कारण यह मुद्दा अब राजनीतिक बहस का विषय भी बन गया है।
कृषि विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि दलहनी फसलों की खरीद समयबद्ध तरीके से होना बेहद आवश्यक है। यदि किसान को समय पर भुगतान और खरीद की सुविधा नहीं मिलती, तो वह अगली बार ऐसी फसल की खेती से दूरी बना सकता है।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ाने, डिजिटल सत्यापन प्रक्रिया को सरल बनाने और भुगतान व्यवस्था को तेज करने की जरूरत है।
किसानों की प्रमुख मांगें
मूंग उत्पादक किसान सरकार से कई मांगें कर रहे हैं—
- खरीद प्रक्रिया में तेजी लाई जाए।
- सभी पंजीकृत किसानों की फसल खरीदी जाए।
- भुगतान समय पर किया जाए।
- खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए।
- गुणवत्ता जांच प्रक्रिया को सरल बनाया जाए।
- पारदर्शी और स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
किसानों का कहना है कि समय पर खरीद होने से उन्हें आर्थिक राहत मिलेगी और अगली फसल की तैयारी भी प्रभावित नहीं होगी।
प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था पर असर
मध्य प्रदेश देश के प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों में शामिल है। यदि मूंग खरीद समय पर नहीं होती, तो इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी कृषि अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार—
- ग्रामीण बाजारों में नकदी का प्रवाह कम हो सकता है।
- कृषि निवेश प्रभावित हो सकता है।
- दलहन उत्पादन को प्रोत्साहन कम मिल सकता है।
- किसानों का भरोसा सरकारी खरीद प्रणाली पर कमजोर पड़ सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
अब किसानों और कृषि क्षेत्र की नजर इस बात पर है कि सरकार खरीद प्रक्रिया को तेज करने के लिए क्या कदम उठाती है। यदि लंबित खरीद जल्द पूरी होती है, तो किसानों को बड़ी राहत मिल सकती है।
आने वाले दिनों में केंद्र और राज्य सरकार के बीच समन्वय बढ़ने की स्थिति में खरीद प्रक्रिया में सुधार की उम्मीद की जा रही है। साथ ही प्रशासनिक स्तर पर लंबित मामलों के निस्तारण की दिशा में भी कार्रवाई की संभावना है।
निष्कर्ष
मूंग खरीदी मध्य प्रदेश को लेकर पैदा हुआ विवाद केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि लाखों किसानों से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। राज्य को 87 प्रतिशत कोटा मिलने के बावजूद केवल 2 प्रतिशत खरीद होना कई सवाल खड़े करता है। किसानों की उम्मीद है कि सरकारें राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर खरीद प्रक्रिया को तेज करें और उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य पर समय पर अपनी उपज बेचने का अवसर दें।
यदि खरीद व्यवस्था में तेजी, पारदर्शिता और बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया जाता है, तो इससे न केवल किसानों को राहत मिलेगी बल्कि राज्य की कृषि व्यवस्था और दलहन उत्पादन को भी मजबूती मिलेगी।

