सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सीनियरिटी से नहीं मिलता जज बनने का अधिकार, कॉलेजियम की स्वायत्तता बरकरार
नई दिल्ली। न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल वरिष्ठता (Seniority) किसी व्यक्ति को हाईकोर्ट या अन्य उच्च न्यायिक पदों पर नियुक्त होने का स्वतः अधिकार नहीं देती। अदालत ने कहा कि जजों के चयन में योग्यता, अखंडता, पेशेवर क्षमता और समग्र मूल्यांकन अधिक महत्वपूर्ण हैं।
यह टिप्पणी हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी अरविंद मल्होत्रा की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें उन्होंने अपने से जूनियर अधिकारियों को हाईकोर्ट जज बनाए जाने पर आपत्ति जताई थी।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जोयमाल्या बागची की खंडपीठ ने याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि कॉलेजियम की सिफारिशों में न्यायिक दखल उचित नहीं होगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि:
- केवल सीनियर होने से हाईकोर्ट जज बनने का अधिकार नहीं मिलता।
- कॉलेजियम उम्मीदवार की योग्यता, सत्यनिष्ठा और उपयुक्तता के आधार पर निर्णय लेता है।
- किसी जूनियर अधिकारी की नियुक्ति होने मात्र से वरिष्ठ अधिकारी को कानूनी चुनौती का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता।
- कॉलेजियम के निर्णय सामान्यतः न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर रहते हैं।
अरविंद मल्होत्रा की याचिका में क्या था?
याचिकाकर्ता अरविंद मल्होत्रा ने दावा किया था कि उनकी उम्मीदवारी पर उचित विचार नहीं किया गया और उनसे जूनियर अधिकारियों को प्राथमिकता देकर हाईकोर्ट जज के लिए चुना गया।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि संबंधित हाईकोर्ट कॉलेजियम ने पूर्व निर्देशों का सही पालन नहीं किया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि चयन प्रक्रिया व्यापक मूल्यांकन और उपलब्ध रिपोर्टों पर आधारित होती है।
कॉलेजियम प्रणाली क्या है?
भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से होती है।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम
सुप्रीम कोर्ट के लिए नामों की सिफारिश भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और चार वरिष्ठतम जजों का कॉलेजियम करता है।
हाईकोर्ट कॉलेजियम
हाईकोर्ट जजों की नियुक्ति के लिए संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, वरिष्ठ जजों और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के बीच परामर्श किया जाता है।
यह प्रणाली संविधान में सीधे लिखी नहीं गई है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों से विकसित हुई है।
सीनियरिटी बनाम मेरिट की बहस
न्यायपालिका में लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि नियुक्ति के लिए वरिष्ठता को प्राथमिकता दी जाए या योग्यता को।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि:
- सीनियरिटी को उचित महत्व दिया जाना चाहिए।
- लेकिन असाधारण योग्यता (Outstanding Merit) होने पर जूनियर उम्मीदवार को प्राथमिकता दी जा सकती है।
- न्यायिक पदों पर नियुक्ति केवल अनुभव नहीं बल्कि समग्र क्षमता के आधार पर होनी चाहिए।
NJAC और कॉलेजियम विवाद
कॉलेजियम प्रणाली को लेकर वर्षों से विवाद होता रहा है।
2014 में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) कानून लाकर कॉलेजियम व्यवस्था को बदलने का प्रयास किया था। हालांकि 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया।
कॉलेजियम समर्थकों का मानना है कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखता है, जबकि आलोचकों का कहना है कि इसमें पारदर्शिता की कमी है।
फैसले का व्यापक प्रभाव
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला भविष्य की न्यायिक नियुक्तियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस निर्णय से स्पष्ट संदेश गया है कि:
- जज बनना वरिष्ठता का स्वतः अधिकार नहीं है।
- मेरिट, ईमानदारी और पेशेवर क्षमता को प्राथमिकता मिलेगी।
- कॉलेजियम की स्वायत्तता और निर्णय प्रक्रिया को अदालत का संरक्षण प्राप्त है।
- भविष्य में इसी प्रकार की याचिकाओं पर रोक लग सकती है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि न्यायपालिका में नियुक्तियां केवल वरिष्ठता के आधार पर नहीं बल्कि योग्यता, अखंडता और समग्र मूल्यांकन के आधार पर होती हैं। अरविंद मल्होत्रा की याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कॉलेजियम प्रणाली की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को मजबूत समर्थन दिया है। यह निर्णय न्यायिक नियुक्तियों में मेरिट आधारित चयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है।
नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल वरिष्ठता जज बनने का अधिकार नहीं देती। मेरिट और उपयुक्तता भी जरूरी हैं।
यह भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया है, जिसमें वरिष्ठ न्यायाधीश उम्मीदवारों के नामों की सिफारिश करते हैं।
सामान्य परिस्थितियों में कॉलेजियम की सिफारिशें न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर मानी जाती हैं।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) एक प्रस्तावित व्यवस्था थी जिसे 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
जजों की नियुक्ति में सीनियरिटी से अधिक महत्व योग्यता, ईमानदारी और पेशेवर क्षमता का है।

