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परिसीमन को लेकर तमिलनाडु में बढ़ी राजनीतिक हलचल, डीएमके ने दोहराया विरोध

केंद्र सरकार की ओर से परिसीमन विधेयक को दोबारा लाने के संकेत मिलने के बाद तमिलनाडु की राजनीति में इस मुद्दे को लेकर हलचल तेज हो गई है। केंद्र सरकार ने परिसीमन की प्रक्रिया को महिला आरक्षण लागू करने से जोड़कर देखा है, जिसके बाद दक्षिण भारत के कई राजनीतिक दलों ने अपनी चिंता जाहिर की है। इसी बीच डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कषगम) के रुख में बदलाव की अटकलें लगाई जा रही थीं, लेकिन पार्टी नेता और तमिलनाडु के उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने साफ कर दिया कि डीएमके पहले भी परिसीमन के खिलाफ थी और आगे भी इसका विरोध जारी रखेगी।

उन्होंने कहा कि पार्टी का इस मुद्दे पर कोई नया रुख नहीं है। डीएमके शुरू से मानती रही है कि परिसीमन की प्रक्रिया सभी राज्यों के हितों को ध्यान में रखकर होनी चाहिए। उनका कहना था कि केंद्र इस विषय को नए मुद्दे की तरह पेश कर रहा है, जबकि यह लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है।

डीएमके ने रखीं अपनी प्रमुख मांगें

उदयनिधि स्टालिन का यह बयान उन खबरों के बाद आया, जिनमें कहा गया था कि डीएमके कुछ शर्तों के साथ परिसीमन विधेयक का समर्थन करने पर विचार कर सकती है। हालांकि, उन्होंने ऐसी सभी अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि पार्टी का विरोध पहले जैसा ही कायम है।

रिपोर्टों के अनुसार, डीएमके की मांग है कि यदि परिसीमन किया जाता है तो 2011 की जनगणना के बजाय 1971 की जनगणना को अगले 25 वर्षों तक आधार बनाया जाए। पार्टी का तर्क है कि इससे उन राज्यों के साथ न्याय होगा जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है।

इसके अलावा डीएमके चाहती है कि देश के सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में समान रूप से 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जाए। पार्टी का मानना है कि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण करने से कुछ राज्यों को अधिक लाभ मिलेगा, जबकि अन्य राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी कमजोर हो सकती है।

डीएमके की एक और मांग यह है कि प्रस्तावित विधेयक में राज्यवार स्पष्ट जानकारी दी जाए कि परिसीमन के बाद प्रत्येक राज्य को लोकसभा की कितनी सीटें मिलेंगी। पार्टी का कहना है कि इससे राज्यों के सामने पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी और किसी तरह की भ्रम की स्थिति नहीं रहेगी।

दक्षिणी राज्यों की चिंता और राजनीतिक प्रतिक्रिया

तमिलनाडु सहित कई दक्षिणी राज्यों का कहना है कि उन्होंने वर्षों से जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू किया है। यदि अब लोकसभा सीटों का निर्धारण केवल बढ़ती जनसंख्या के आधार पर किया जाएगा, तो उन राज्यों को अधिक फायदा मिलेगा जहां जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। इसके विपरीत दक्षिणी राज्यों की संसद में हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम रह सकती है।

इन राज्यों को यह भी चिंता है कि लोकसभा में सीटों की संख्या कम बढ़ने से उनकी राजनीतिक ताकत और नीति निर्माण में प्रभाव घट सकता है। साथ ही उनका मानना है कि केंद्र से मिलने वाले संसाधनों और वित्तीय हिस्सेदारी पर भी इसका असर पड़ सकता है।

हालांकि यदि सभी राज्यों की सीटों में 50 प्रतिशत की समान वृद्धि भी की जाए, तब भी राज्यों के बीच अंतर पूरी तरह समाप्त नहीं होगा। उदाहरण के तौर पर, तमिलनाडु की वर्तमान 39 लोकसभा सीटें बढ़कर 59 हो सकती हैं, जबकि उत्तर प्रदेश की 80 सीटें बढ़कर 120 तक पहुंच सकती हैं। यानी दोनों राज्यों के बीच सीटों का अंतर पहले से अधिक हो जाएगा। इसी तरह केरल की सीटें 20 से बढ़कर 30 होने की संभावना जताई जा रही है।

इसी मुद्दे को समझाने के लिए कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने पहले एक उदाहरण दिया था। उन्होंने कहा था कि यदि दो लोगों की आय अलग-अलग है और दोनों की आय में समान प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है, तब भी दोनों के बीच का वास्तविक अंतर बना रहता है। उनका कहना था कि यही स्थिति लोकसभा सीटों के मामले में भी देखने को मिल सकती है।

सांसदों की बैठक और आगे की रणनीति

परिसीमन के मुद्दे पर तमिलनाडु में राजनीतिक गतिविधियां लगातार तेज हो रही हैं। राज्य के मुख्यमंत्री विजय ने इस विषय पर चर्चा के लिए सभी लोकसभा और राज्यसभा सांसदों की बैठक बुलाई है। इस बैठक में परिसीमन के संभावित प्रभाव और राज्य के हितों की रक्षा के लिए आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा।

मुख्यमंत्री विजय पहले भी प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया का विरोध कर चुके हैं और इसे दक्षिणी राज्यों के हितों के लिए चुनौती बता चुके हैं। वहीं कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने सभी दलों के सांसदों को एक मंच पर लाने के फैसले का स्वागत किया है। दूसरी ओर, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी स्पष्ट किया है कि विपक्ष परिसीमन विधेयक के मौजूदा स्वरूप का समर्थन नहीं करेगा।

यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब तमिलनाडु में डीएमके और टीवीके के बीच राजनीतिक तनाव भी बढ़ा हुआ है। हाल की राजनीतिक घटनाओं के कारण दोनों दलों के बीच टकराव और तेज हुआ है। चूंकि तमिलनाडु से सबसे अधिक सांसद डीएमके के हैं, इसलिए माना जा रहा है कि परिसीमन के मुद्दे पर आगे की राजनीतिक दिशा तय करने में पार्टी की भूमिका अहम रहने वाली है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद के साथ-साथ तमिलनाडु की राजनीति में भी प्रमुख चर्चा का विषय बना रह सकता है।

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