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‘जब तक शर्तें पूरी नहीं होंगी, नहीं खुलेगा Strait of Hormuz’—ईरान की इस जिद से क्या दुनिया में बढ़ेगा तेल संकट?

ईरान और अमेरिका तनाव के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तेल टैंकर और कच्चे तेल संकट का खतरा - News Critic

मध्य पूर्व में तनाव के बीच Strait of Hormuz को लेकर संकट फिर गहरा गया है। ईरान ने साफ कहा है कि अमेरिका उसकी तय शर्तें पूरी किए बिना इस अहम समुद्री रास्ते को नहीं खोलेगा। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकर कालीबाफ ने यह बात दोहराई है।

होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। यहां लंबे समय तक बाधा बनी रही तो कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, हाल के आंकड़े बताते हैं कि तेल उत्पादक देश वैकल्पिक रास्तों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं।

Strait of Hormuz को लेकर ईरान ने क्या कहा?

ईरान का कहना है कि Strait of Hormuz तभी खुलेगा, जब जून में हुए अंतरिम समझौते से जुड़ी सात शर्तें पूरी होंगी। कालीबाफ ने कहा कि अमेरिका को इन शर्तों पर ठोस कदम उठाने होंगे।

ईरान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान एक प्रस्ताव भी रखा था। इसके तहत शर्तें पूरी होने पर करीब सात दिनों के भीतर समुद्री मार्ग को सामान्य आवाजाही के लिए खोलने की बात कही गई थी।

तेहरान और वॉशिंगटन के बीच मध्यस्थता की कोशिशें भी चल रही हैं। कतर के जरिए दोनों पक्षों के बीच संदेशों का आदान-प्रदान हुआ है। इसके बावजूद अभी होर्मुज को लेकर कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है।

ईरान की 7 शर्तों से क्यों बढ़ा तनाव?

ईरान की मांगों का संबंध केवल समुद्री रास्ता खोलने से नहीं है। इनमें सैन्य दबाव कम करने, प्रतिबंधों और ईरानी बंदरगाहों से जुड़ी पाबंदियों जैसे मुद्दे भी शामिल हैं।

ईरान चाहता है कि अमेरिका पहले कुछ ठोस कदम उठाए। इसके बाद ही समुद्री रास्ते को सामान्य बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़े। दूसरी ओर, अमेरिका का जोर परमाणु मुद्दे और व्यापक सुरक्षा समझौते पर है।

यही अंतर बातचीत को मुश्किल बना रहा है। दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी भी इस संकट को लंबा खींच सकती है।

तेल की सप्लाई पर कितना बड़ा असर पड़ सकता है?

Strait of Hormuz का महत्व इसकी भौगोलिक स्थिति के कारण बहुत ज्यादा है। सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के करीब पांचवें हिस्से का तेल और प्राकृतिक गैस कारोबार इस रास्ते से जुड़ा रहता है।

अगर इस रास्ते से जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक बाधित होती है, तो बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ सकती है। इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है।

हालांकि, मौजूदा स्थिति पूरी तरह पहले जैसी नहीं है। तेल उत्पादकों ने पाइपलाइन और दूसरे समुद्री रास्तों के जरिए सप्लाई बनाए रखने के तरीके खोजे हैं। इसलिए होर्मुज संकट का पूरा असर एक साथ दिखाई देना जरूरी नहीं है।

तेल उत्पादकों ने खोजे वैकल्पिक रास्ते

हाल के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में होर्मुज क्षेत्र से करीब 16.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का निर्यात हुआ। यह युद्ध से पहले के स्तर के करीब है।

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की पाइपलाइनों ने समुद्री मार्ग पर निर्भरता कम करने में मदद की है। इसके अलावा, कुछ तेल को समुद्र में एक जहाज से दूसरे जहाज में ट्रांसफर किया जा रहा है।

इससे पता चलता है कि बाजार ने संकट से निपटने के लिए कुछ वैकल्पिक व्यवस्था बनाई है। लेकिन इससे जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

फिर भी डीजल सप्लाई पर क्यों बढ़ी चिंता?

कच्चे तेल के मुकाबले रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। खासकर डीजल की सप्लाई पर असर देखने को मिला है।

रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में रिफाइंड उत्पादों की आवाजाही युद्ध से पहले के स्तर से काफी नीचे रही। इससे कुछ बाजारों में डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ा है।

यानी कच्चे तेल की सप्लाई को वैकल्पिक रास्तों से कुछ हद तक संभाला जा सकता है। लेकिन रिफाइंड ईंधन की लॉजिस्टिक्स अलग चुनौती पेश कर रही है।

क्या कच्चा तेल 100 डॉलर के पार रहेगा?

होर्मुज संकट के बीच कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं। हालांकि, 5 अक्टूबर को कीमतों में थोड़ी नरमी भी देखी गई।

रॉयटर्स के अनुसार, ब्रेंट क्रूड करीब 101.59 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया था। इसका एक कारण मध्य पूर्व से बढ़ी तेल सप्लाई और जी7 देशों का रणनीतिक भंडार जारी करने का फैसला रहा।

जी7 देशों ने करीब 100 मिलियन बैरल कच्चा तेल और ईंधन आपात भंडार से जारी करने की योजना बनाई है। इससे बाजार में तत्काल सप्लाई की चिंता कुछ कम हुई है।

भारत पर क्या पड़ सकता है असर?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है। इसलिए वैश्विक तेल कीमतों में लंबे समय तक बढ़ोतरी का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

कच्चा तेल महंगा होने पर पेट्रोलियम उत्पादों की लागत बढ़ सकती है। इसके अलावा, परिवहन, उद्योग और महंगाई पर भी दबाव बन सकता है।

हालांकि, भारत पर वास्तविक असर कई बातों पर निर्भर करेगा। इसमें अंतरराष्ट्रीय तेल कीमत, रुपये की विनिमय दर, आयात के वैकल्पिक रास्ते और घरेलू ईंधन कीमतों की नीति शामिल है।

क्या दुनिया में फिर बड़ा तेल संकट आ सकता है?

फिलहाल इसे सीधे तौर पर वैश्विक तेल संकट कहना जल्दबाजी होगी। इसकी वजह यह है कि तेल उत्पादक देश वैकल्पिक मार्गों का इस्तेमाल कर रहे हैं। जी7 का रणनीतिक भंडार जारी करने का फैसला भी बाजार को अतिरिक्त सप्लाई दे रहा है।

लेकिन जोखिम जरूर बढ़ा हुआ है। अगर होर्मुज लंबे समय तक बंद रहता है और खाड़ी क्षेत्र में जहाजों पर हमले बढ़ते हैं, तो सप्लाई पर दबाव ज्यादा हो सकता है।

ऐसी स्थिति में तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। खासकर डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों पर इसका असर ज्यादा दिखाई दे सकता है।

अमेरिका-ईरान बातचीत पर टिकी नजर

अब इस पूरे संकट का बड़ा हिस्सा अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की दिशा पर निर्भर करता है। मध्यस्थ देशों के जरिए दोनों पक्ष संपर्क में हैं।

ईरान ने कहा है कि वह कूटनीति के लिए तैयार है, लेकिन अपनी शर्तों पर भी कायम है। अमेरिका की ओर से भी बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।

अगर दोनों देशों के बीच समझौता होता है, तो होर्मुज में समुद्री आवाजाही सामान्य करने का रास्ता खुल सकता है। लेकिन बातचीत विफल होने पर ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी रह सकती है।

आने वाले दिनों में क्या होगा?

फिलहाल सबसे अहम सवाल यही है कि ईरान की सात शर्तों पर अमेरिका किस तरह प्रतिक्रिया देता है। अगर दोनों पक्ष किसी समझौते पर पहुंचते हैं, तो समुद्री मार्ग को फिर से खोलने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

वहीं, अगर गतिरोध जारी रहता है, तो बाजार तेल और ईंधन की सप्लाई को लेकर सतर्क रहेगा। ऐसे में कीमतों में उतार-चढ़ाव भी जारी रह सकता है।

इसलिए आने वाले दिनों में कूटनीतिक बातचीत, जहाजों की आवाजाही और खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।

निष्कर्ष

Strait of Hormuz को लेकर ईरान की शर्तों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा दी है। यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहा तो तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है।

हालांकि, अभी बाजार के पास कुछ वैकल्पिक रास्ते और रणनीतिक भंडार मौजूद हैं। इसलिए तत्काल वैश्विक तेल संकट की स्थिति तय नहीं है। लेकिन अमेरिका-ईरान बातचीत में प्रगति नहीं हुई तो आने वाले दिनों में तेल बाजार पर दबाव बढ़ सकता है।

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