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बेंगलुरु AI सिटी प्रोजेक्ट पर बवाल, करोड़ों का मुआवजा ठुकराकर जमीन अधिग्रहण के विरोध में सड़कों पर उतरे किसान

बेंगलुरु AI सिटी प्रोजेक्ट के लिए जमीन अधिग्रहण का विरोध, मुआवजे को ठुकराकर प्रदर्शन करते किसान - न्यूज़ क्रिटिक

कर्नाटक में प्रस्तावित बेंगलुरु AI सिटी प्रोजेक्ट को लेकर किसानों और राज्य सरकार के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। सरकार इस परियोजना को आधुनिक तकनीक, निवेश और रोजगार से जोड़कर देख रही है। वहीं, किसान अपनी उपजाऊ जमीन के अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं।

यह परियोजना बिदादी क्षेत्र में प्रस्तावित ग्रेटर बेंगलुरु इंटीग्रेटेड टाउनशिप (GBIT) का हिस्सा है। सरकार इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर आधारित आधुनिक शहर के रूप में विकसित करना चाहती है।

हालांकि, प्रभावित किसानों का कहना है कि उनकी जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि पीढ़ियों से आजीविका का आधार रही है। वे मुआवजे के प्रस्ताव के बावजूद जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं। उनका जोर परियोजना की समीक्षा और स्थानीय लोगों से पारदर्शी बातचीत पर है।

अक्टूबर 2026 में भी इस विवाद को लेकर विरोध जारी है। किसानों और स्थानीय समूहों ने भूमि अधिग्रहण की अधिसूचनाओं को वापस लेने और परियोजना पर नए सिरे से विचार करने की मांग उठाई है।

क्या है बेंगलुरु AI सिटी प्रोजेक्ट?

बेंगलुरु के पास बिदादी क्षेत्र में प्रस्तावित यह परियोजना एक बड़े आधुनिक टाउनशिप के रूप में तैयार की जा रही है। इसका उद्देश्य तकनीकी उद्योगों, आवासीय क्षेत्रों, व्यावसायिक गतिविधियों और जरूरी सुविधाओं को एक साथ विकसित करना है।

सरकार की योजना में बेहतर सड़कें, मेट्रो संपर्क, आवास, पार्क, स्कूल, अस्पताल और अन्य शहरी सुविधाएं शामिल हैं। परियोजना को इस सोच के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है कि लोग एक ही क्षेत्र में रह सकें, काम कर सकें और जरूरी सुविधाओं का लाभ उठा सकें।

कितनी जमीन पर विकसित होगी AI सिटी?

परियोजना के अलग-अलग चरणों में इसके प्रस्तावित क्षेत्र को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। जून 2026 की रिपोर्टों में लगभग 9,000 से 9,600 एकड़ क्षेत्र का उल्लेख किया गया था। बाद की एक रिपोर्ट में लगभग 7,481 एकड़ में टाउनशिप विकसित करने की योजना बताई गई।

इस अंतर को समझना जरूरी है। परियोजना का प्रस्तावित कुल क्षेत्र और किसी चरण में अधिग्रहण के लिए अधिसूचित जमीन अलग हो सकती है। इसलिए सभी आंकड़ों को एक ही अधिग्रहण आदेश का हिस्सा नहीं समझना चाहिए।

जून 2026 में सरकार ने तीन गांवों की लगभग 499 से 518 एकड़ जमीन के अधिग्रहण से संबंधित अंतिम अधिसूचना जारी की थी। इसके बाद किसानों की चिंताएं और विरोध दोनों बढ़े।

करोड़ों के मुआवजे के बावजूद जमीन देने को तैयार नहीं किसान

इस विवाद का सबसे अहम पहलू मुआवजे और जमीन के मालिकाना हक को लेकर है। कर्नाटक सरकार ने परियोजना के लिए प्रभावित जमीन मालिकों को बेहतर मुआवजा देने की बात कही है।

अगस्त 2026 में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा था कि किसानों को प्रति एकड़ तीन करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा मिल सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि जो किसान नकद भुगतान के बजाय जमीन चाहते हैं, उन्हें विकसित क्षेत्र की 50 प्रतिशत जमीन देने का विकल्प प्रस्तावित है।

सरकार का तर्क है कि इस व्यवस्था से जमीन मालिकों को भविष्य में विकसित संपत्ति का लाभ मिल सकता है। इसके अलावा, परियोजना से रोजगार और कारोबार के अवसर पैदा होने की उम्मीद जताई जा रही है।

किसान क्यों ठुकरा रहे हैं मुआवजा?

किसानों का विरोध केवल मुआवजे की रकम तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि उपजाऊ कृषि भूमि से उन्हें नियमित आय मिलती है। खेती के साथ कई परिवार बागवानी, डेयरी और दूसरे कृषि कार्यों पर भी निर्भर हैं।

किसानों के मुताबिक, जमीन अधिग्रहित होने पर उनकी आजीविका प्रभावित हो सकती है। उनका यह भी कहना है कि जमीन से जुड़े सामाजिक और पारिवारिक संबंधों की भरपाई केवल आर्थिक भुगतान से नहीं हो सकती।

कुछ प्रभावित लोगों ने परियोजना की योजना बनाने में किसानों की भागीदारी पर भी सवाल उठाए हैं। उनकी मांग है कि सरकार जमीन अधिग्रहण से पहले स्थानीय लोगों की आपत्तियों को गंभीरता से सुने।

इस तरह, विवाद का केंद्र केवल मुआवजे की रकम नहीं, बल्कि जमीन, आजीविका और भविष्य की सुरक्षा भी है।

सड़कों पर उतरे किसान, भूख हड़ताल और प्रदर्शन

बिदादी और आसपास के गांवों में किसान लंबे समय से इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। सितंबर 2026 में प्रदर्शन तेज हुआ था। किसानों ने बिदादी-हरोहल्ली मुख्य मार्ग पर धरना दिया और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल भी शुरू की।

प्रदर्शनकारियों ने भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया रोकने की मांग की। कुछ प्रदर्शनकारियों ने सड़क पर बैठकर और ट्रैक्टर तथा बैलगाड़ियों के जरिए अपना विरोध दर्ज कराया। इस दौरान यातायात और कानून-व्यवस्था को लेकर भी प्रशासन के सामने चुनौतियां आईं।

किसानों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं। उनकी आपत्ति ऐसी परियोजना से है, जिसके कारण उपजाऊ जमीन और कृषि आधारित आजीविका प्रभावित हो सकती है।

अक्टूबर की शुरुआत में भी विरोध अभियान जारी रहा। तीन अक्टूबर को सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार, परियोजना के विरोध में चलाए गए ऑनलाइन और सार्वजनिक अभियान में 85,000 से अधिक हस्ताक्षर जुटाए गए थे।

प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि सरकार जमीन अधिग्रहण पर आगे बढ़ने से पहले सार्वजनिक परामर्श करे। वे परियोजना के दस्तावेजों और पर्यावरणीय प्रभाव से जुड़ी जानकारियों को भी सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं।

खेती और पर्यावरण को लेकर किसानों की चिंता

किसानों और स्थानीय पर्यावरण समूहों ने परियोजना के संभावित प्रभावों पर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, क्षेत्र में कृषि भूमि के साथ बड़ी संख्या में पेड़ और केले के पौधे मौजूद हैं। जमीन का इस्तेमाल बदलने से खेती और स्थानीय हरियाली प्रभावित हो सकती है।

प्रदर्शनकारियों ने भूजल पुनर्भरण और पानी की उपलब्धता को लेकर भी चिंता जताई है। उनका मानना है कि बड़े शहरी विकास के दौरान प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है।

हालांकि, परियोजना के वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन स्वतंत्र और विस्तृत अध्ययन से ही किया जा सकता है। इसी वजह से विरोध कर रहे समूहों ने पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और सामाजिक प्रभाव सर्वेक्षण कराने की मांग की है।

उनका सुझाव है कि सरकार कम उपजाऊ या पहले से खराब हो चुकी जमीन पर परियोजना की संभावनाएं भी तलाशे। इससे आधुनिक शहर विकसित करने की योजना और कृषि भूमि के संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।

सरकार का पक्ष क्या है?

कर्नाटक सरकार इस परियोजना को राज्य के भविष्य के विकास से जुड़ी बड़ी योजना मानती है। सरकार का कहना है कि आधुनिक शहरी सुविधाओं और तकनीकी उद्योगों के विकास से निवेश आकर्षित हो सकता है। इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होने की उम्मीद है।

मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने जुलाई 2026 में स्पष्ट किया था कि किसानों की जमीन जबरन नहीं ली जाएगी। उन्होंने किसानों की शिकायतें सुनने और परियोजना के कानूनी पहलुओं की समीक्षा के लिए समिति बनाने की बात भी कही थी।

अगस्त 2026 में सरकार ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुहानाथन नरेंद्र की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की। समिति को परियोजना की कानूनी, मानवीय और विकास संबंधी पहलुओं की समीक्षा करने की जिम्मेदारी दी गई।

सरकार ने सार्वजनिक सुझावों पर विचार करने और प्रभावित लोगों की चिंताओं को सुनने की बात कही है। दूसरी ओर, किसानों की मांग है कि समिति की समीक्षा पूरी होने और आपत्तियों पर स्पष्ट निर्णय आने तक अधिग्रहण की कार्रवाई आगे न बढ़ाई जाए।

आगे क्या हो सकता है?

बेंगलुरु AI सिटी प्रोजेक्ट का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार विकास की योजना और किसानों की आपत्तियों के बीच कितना संतुलन बना पाती है। यदि प्रभावित परिवारों को निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त भागीदारी मिलती है, तो समाधान की गुंजाइश बढ़ सकती है।

इसके लिए मुआवजे की शर्तों को स्पष्ट करना, जमीन मालिकों के विकल्प समझाना और पर्यावरणीय प्रभावों की स्वतंत्र जांच कराना महत्वपूर्ण होगा। साथ ही, अधिग्रहण से प्रभावित परिवारों की आजीविका पर पड़ने वाले असर का आकलन भी जरूरी है।

किसानों की मांग है कि सरकार उपजाऊ जमीन के विकल्पों पर विचार करे और सार्वजनिक परामर्श के बाद ही आगे का फैसला ले। वहीं, सरकार इस परियोजना को रोजगार, निवेश और आधुनिक बुनियादी ढांचे के अवसर के रूप में देख रही है।

निष्कर्ष

बेंगलुरु AI सिटी प्रोजेक्ट को लेकर विवाद यह दिखाता है कि बड़े विकास कार्यों में जमीन और आजीविका से जुड़े सवाल कितने महत्वपूर्ण हैं। सरकार करोड़ों रुपये के मुआवजे और विकसित जमीन के विकल्प की बात कर रही है, लेकिन कई किसान अपनी उपजाऊ जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं।

किसानों की मुख्य मांग है कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया की समीक्षा हो, पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन किया जाए और प्रभावित लोगों की आपत्तियों को सुना जाए। दूसरी ओर, सरकार इस परियोजना के जरिए तकनीकी विकास और रोजगार के अवसर बढ़ाना चाहती है।

अब सबकी नजर समीक्षा प्रक्रिया और सरकार के अगले फैसले पर है। इस विवाद का समाधान तभी टिकाऊ होगा, जब विकास की योजना के साथ किसानों के अधिकारों, आजीविका और पर्यावरण संबंधी चिंताओं पर भी ठोस ध्यान दिया जाएगा।

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