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मध्य प्रदेश में 12 करोड़ का आयुष्मान घोटाला: 69 अस्पताल योजना से बाहर

मध्य प्रदेश में 12 करोड़ का आयुष्मान घोटाला उजागर, 69 अस्पताल योजना से बाहर - News Critic

मध्य प्रदेश में आयुष्मान भारत योजना के तहत करीब 12 करोड़ रुपये के संदिग्ध क्लेम सामने आने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठे हैं। शुरुआती जांच में मृत व्यक्तियों के नाम पर इलाज दर्ज करने और मरीजों को बिना जरूरत आईसीयू में भर्ती दिखाने जैसी संभावित अनियमितताओं के संकेत मिले हैं।

इस मामले में अस्पतालों के क्लेम की जांच की जा रही है। हालांकि, संदिग्ध क्लेम सामने आने का अर्थ यह नहीं है कि हर संबंधित अस्पताल दोषी साबित हो गया है। अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही सामने आएगा।

12 करोड़ रुपये के संदिग्ध क्लेम की जांच क्यों शुरू हुई?

आयुष्मान भारत योजना के तहत सूचीबद्ध अस्पताल मरीजों के उपचार के बाद सरकार से भुगतान मांगते हैं। इसके लिए अस्पताल मरीज के पंजीयन, बीमारी, भर्ती, उपचार और डिस्चार्ज से जुड़ी जानकारी दर्ज करते हैं।

मध्य प्रदेश में इन जानकारियों की जांच के दौरान कुछ क्लेम में असामान्य गतिविधियां सामने आईं। इसके बाद राज्य स्वास्थ्य एजेंसी ने 71 अस्पतालों के करीब 12 करोड़ रुपये के क्लेम को जांच के दायरे में लिया।

इस जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि अस्पतालों ने वास्तव में मरीजों का इलाज किया था या दस्तावेजों में गलत जानकारी दर्ज की गई। साथ ही, भुगतान के लिए प्रस्तुत दावों की वास्तविकता भी जांची जा रही है।

फिलहाल 12 करोड़ रुपये की राशि संदिग्ध क्लेम से जुड़ी है। जांच पूरी होने से पहले इसे पूरी तरह साबित हो चुका घोटाला मानना उचित नहीं होगा।

मृतकों के नाम पर इलाज दिखाने का मामला

इस प्रकरण में सबसे गंभीर आशंका मृत व्यक्तियों के नाम पर इलाज दर्ज करने से जुड़ी है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके नाम पर उपचार का दावा किया गया है, तो यह जांच का महत्वपूर्ण विषय बन जाता है।

ऐसे मामलों में अस्पताल के रिकॉर्ड और मरीज से संबंधित दस्तावेजों का मिलान करना जरूरी होता है। जांचकर्ता यह पता लगा सकते हैं कि मरीज की मृत्यु कब हुई और उपचार किस तारीख को दर्ज किया गया।

इसके अलावा, मरीज की पहचान और अस्पताल में भर्ती होने से जुड़े रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण होंगे। इन जानकारियों के आधार पर ही पता चलेगा कि मामला रिकॉर्ड की गलती है या जानबूझकर किया गया फर्जी दावा।

यदि जांच में गलत जानकारी देकर सरकारी भुगतान लेने की पुष्टि होती है, तो संबंधित अस्पताल के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।

फर्जी आईसीयू क्लेम पर भी उठे सवाल

जांच में दूसरी प्रमुख आशंका मरीजों को बिना चिकित्सकीय जरूरत आईसीयू में भर्ती दिखाने से जुड़ी है। आईसीयू में गंभीर मरीजों की निगरानी और विशेष उपचार किया जाता है। इसलिए यहां भर्ती होने का दावा चिकित्सा रिकॉर्ड से मेल खाना चाहिए।

यदि किसी मरीज को सामान्य वार्ड में रखा गया, लेकिन कागजों में आईसीयू में भर्ती दिखाया गया, तो यह गंभीर अनियमितता हो सकती है। इसी तरह, वास्तविक उपचार और बिल में दर्ज सेवाओं के बीच अंतर मिलने पर भी जांच की जरूरत पड़ती है।

जांच के दौरान अस्पतालों के भर्ती रिकॉर्ड, डॉक्टरों के नोट्स, उपचार विवरण और डिस्चार्ज दस्तावेजों का मिलान किया जा सकता है। इससे यह स्पष्ट करने में मदद मिलेगी कि क्लेम वास्तविक उपचार के आधार पर किए गए थे या नहीं।

हालांकि, केवल सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी का संकेत मिलना किसी अस्पताल को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए दस्तावेजों और परिस्थितियों की विस्तृत जांच जरूरी है।

भोपाल से इंदौर तक अस्पताल जांच के दायरे में

इस मामले की जांच प्रदेश के अलग-अलग जिलों के अस्पतालों तक पहुंची है। इनमें भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, रीवा, सागर, सतना, नीमच, शाजापुर और टीकमगढ़ सहित कई क्षेत्रों के अस्पताल शामिल हैं।

इससे स्पष्ट है कि जांच केवल एक शहर या जिले तक सीमित नहीं है। स्वास्थ्य एजेंसी संदिग्ध लेनदेन और अस्पतालों की ओर से प्रस्तुत क्लेम की पड़ताल कर रही है।

अस्पतालों की पहचान और क्लेम की जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कितने मामलों में वास्तव में अनियमितता हुई। इसके साथ ही, संदिग्ध राशि में से कितने रुपये गलत भुगतान से जुड़े हैं, इसकी जानकारी भी जांच के नतीजों से सामने आएगी।

69 अस्पताल योजना से बाहर, लेकिन कार्रवाई का कारण अलग

आयुष्मान योजना को लेकर सामने आई एक अन्य जानकारी के अनुसार, मध्य प्रदेश के 69 अस्पतालों को योजना से बाहर किया गया है। इनमें भोपाल के 27 अस्पताल शामिल बताए गए हैं। हालांकि, इन अस्पतालों को बाहर करने की कार्रवाई को 12 करोड़ रुपये के संदिग्ध क्लेम की जांच से अलग समझना जरूरी है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 69 अस्पतालों की संबद्धता समाप्त करने के पीछे अलग-अलग कारण हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे अस्पतालों की बताई गई है, जो राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड यानी एनएबीएच का गुणवत्ता प्रमाणपत्र हासिल करने की अनिवार्यता पूरी नहीं कर सके।

इसलिए यह मानना सही नहीं होगा कि योजना से बाहर किए गए सभी 69 अस्पतालों पर 12 करोड़ रुपये के संदिग्ध क्लेम में गड़बड़ी करने का आरोप है। दोनों मामलों की कार्रवाई और कारण अलग-अलग हो सकते हैं।

अस्पतालों की संबद्धता खत्म होने से मरीजों को इलाज चुनते समय सावधानी बरतनी चाहिए। आयुष्मान कार्डधारकों को उपचार से पहले अस्पताल की मौजूदा सूचीबद्ध स्थिति की पुष्टि कर लेनी चाहिए।

पहले भी हो चुकी है अस्पतालों पर कार्रवाई

मध्य प्रदेश में आयुष्मान योजना के तहत अस्पतालों की कार्यप्रणाली को लेकर पहले भी कार्रवाई की गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 50 अस्पतालों पर कुल 3.13 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया था। वहीं, 18 अस्पतालों को ब्लैकलिस्ट और 15 अस्पतालों को निलंबित किया गया था।

इसके अलावा, भोपाल के 25 अस्पतालों पर 2.11 करोड़ रुपये की पेनल्टी लगाए जाने की जानकारी भी सामने आई थी। ये आंकड़े योजना के तहत अस्पतालों के दावों और उपचार व्यवस्था की निगरानी के महत्व को दिखाते हैं।

हालांकि, अलग-अलग अवधियों और मामलों के आंकड़ों को जोड़कर एक ही कार्रवाई का हिस्सा नहीं मानना चाहिए। प्रत्येक मामले में कार्रवाई की तारीख, कारण और संबंधित अस्पतालों की स्थिति अलग हो सकती है।

टीएमएस सॉफ्टवेयर कैसे पकड़ता है संदिग्ध क्लेम?

आयुष्मान योजना में अस्पतालों के क्लेम की निगरानी के लिए ट्रांजेक्शन मैनेजमेंट सिस्टम यानी टीएमएस का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें मरीज के पंजीयन से लेकर भर्ती, उपचार, डिस्चार्ज और भुगतान के दावे तक की जानकारी दर्ज होती है।

सिस्टम में असामान्य गतिविधि दिखाई देने पर संबंधित क्लेम को जांच के लिए चिह्नित किया जा सकता है। इसके बाद अधिकारी दस्तावेजों और अस्पताल के रिकॉर्ड की पड़ताल करते हैं।

इस व्यवस्था का उद्देश्य गलत भुगतान रोकना और योजना के पैसे का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करना है। साथ ही, वास्तविक मरीजों को समय पर उपचार का लाभ मिल सके, यह भी महत्वपूर्ण है।

सॉफ्टवेयर से मिले संकेत शुरुआती जांच में मदद करते हैं। अंतिम निर्णय के लिए दस्तावेजों, चिकित्सकीय रिकॉर्ड और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की जांच जरूरी होती है।

आयुष्मान कार्डधारकों पर क्या पड़ेगा असर?

इस मामले का अर्थ यह नहीं है कि मध्य प्रदेश के सभी आयुष्मान कार्डधारकों का इलाज प्रभावित होगा। योजना का उद्देश्य पात्र परिवारों को सूचीबद्ध अस्पतालों में निर्धारित नियमों के अनुसार उपचार उपलब्ध कराना है।

फिर भी, अस्पतालों पर निगरानी बढ़ने से मरीजों के लिए सही जानकारी रखना जरूरी है। उपचार कराने से पहले अस्पताल की सूचीबद्ध स्थिति और संबंधित बीमारी के लिए उपलब्ध सुविधा की पुष्टि करनी चाहिए।

मरीज और उनके परिजन भर्ती से जुड़े दस्तावेज, जांच रिपोर्ट और डिस्चार्ज सारांश संभालकर रखें। यदि इलाज या भुगतान से जुड़ी जानकारी में कोई विसंगति दिखाई देती है, तो संबंधित स्वास्थ्य एजेंसी के समक्ष शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

इससे मरीजों के अधिकारों की रक्षा करने और योजना के तहत पारदर्शिता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

निष्कर्ष

मध्य प्रदेश में आयुष्मान भारत योजना के तहत करीब 12 करोड़ रुपये के संदिग्ध क्लेम और 71 अस्पतालों की जांच ने सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की निगरानी पर ध्यान खींचा है। मृतकों के नाम पर इलाज और बिना जरूरत आईसीयू में भर्ती दिखाने की आशंकाओं की जांच महत्वपूर्ण है।

वहीं, 69 अस्पतालों को योजना से बाहर किए जाने की कार्रवाई को संदिग्ध क्लेम वाले मामले से अलग समझना जरूरी है। जांच पूरी होने के बाद ही अनियमितताओं की वास्तविक स्थिति और जिम्मेदार संस्थानों के बारे में स्पष्ट जानकारी सामने आएगी।

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