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उत्तराखंड में निकाहनामे का ड्राफ्ट तैयार, एक से ज्यादा शादी पर रोक; चुनाव से पहले धामी सरकार का बड़ा कदम

News Critic की ग्राफिक इमेज जिसमें उत्तराखंड में निकाहनामे का ड्राफ्ट तैयार होने, एक से ज्यादा शादी नहीं होने और चुनाव से पहले धामी सरकार के बड़े दांव की जानकारी दी गई है।

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के प्रावधानों के अनुरूप नया निकाहनामा तैयार किया जा रहा है। इसमें एक से ज्यादा शादी पर रोक, बेटियों के संपत्ति अधिकार और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े नियमों को स्पष्ट करने की तैयारी है। इस पहल का उद्देश्य निकाह से जुड़ी प्रक्रिया को राज्य में लागू समान नागरिक संहिता के अनुरूप बनाना है।

उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने सितंबर 2026 में बताया था कि नए निकाहनामे का मसौदा तैयार किया जा रहा है। इसके लिए यूसीसी का मसौदा तैयार करने से जुड़े विशेषज्ञों से भी चर्चा की जा रही है। प्रस्तावित दस्तावेज में विवाह, तलाक और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े प्रावधान शामिल किए जाएंगे।

राज्य में यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उत्तराखंड में 27 जनवरी 2025 से समान नागरिक संहिता लागू है। इसके तहत विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे विषयों के लिए एक समान कानूनी ढांचा बनाया गया है।

नए निकाहनामे में क्या-क्या बदलाव प्रस्तावित हैं?

नए निकाहनामे का उद्देश्य विवाह से जुड़े दस्तावेजों को यूसीसी के प्रावधानों के अनुरूप बनाना है। मौजूदा निकाहनामे में पहली, दूसरी और तीसरी शादी के लिए अलग-अलग जगह होने की बात कही गई है। नए प्रारूप में इन कॉलम को हटाने का प्रस्ताव है, क्योंकि राज्य में लागू यूसीसी के तहत एक से अधिक विवाह की अनुमति नहीं है।

प्रस्तावित निकाहनामे में महिलाओं के अधिकारों और विवाह की कानूनी प्रक्रिया को लेकर भी जानकारी शामिल करने की योजना है। इससे निकाह कराने वाले काजी, दूल्हा-दुल्हन और उनके परिवारों को लागू कानूनी नियमों की जानकारी मिल सकेगी।

नए दस्तावेज को अंतिम रूप देने से पहले संबंधित विशेषज्ञों और मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों से चर्चा करने की योजना है। इसलिए प्रस्तावित प्रावधानों और अंतिम दस्तावेज के बीच अंतर हो सकता है।

एक से ज्यादा शादी पर रोक का क्या होगा असर?

उत्तराखंड में यूसीसी लागू होने के बाद राज्य के नागरिकों के लिए विवाह संबंधी नियमों में समानता लाने का प्रयास किया गया है। इसके तहत लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार एक व्यक्ति के जीवित जीवनसाथी के रहते दूसरी शादी नहीं की जा सकती।

नए निकाहनामे में इस नियम को स्पष्ट रूप से शामिल करने का प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य विवाह के समय ही संबंधित पक्षों को कानूनी व्यवस्था की जानकारी देना है।

पहले पारंपरिक निकाहनामे में एक से अधिक विवाह का उल्लेख करने के लिए जगह होने की बात सामने आई थी। नए प्रारूप में ऐसी व्यवस्था हटाने की योजना है। इससे निकाह के दस्तावेज और राज्य में लागू कानून के बीच तालमेल बनाने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, यह समझना जरूरी है कि निकाहनामे में बदलाव अपने आप में अलग कानून नहीं है। इसके प्रावधान राज्य में लागू यूसीसी और उससे जुड़े नियमों के अनुरूप होने चाहिए।

बेटियों को संपत्ति में बराबर अधिकार देने का प्रस्ताव

नए निकाहनामे में बेटियों के संपत्ति अधिकार का मुद्दा भी शामिल किया जा रहा है। प्रस्ताव के अनुसार, शादी के बाद भी बेटी का अपने पिता की संपत्ति में अधिकार बना रहेगा।

इस विषय पर विशेष ध्यान देने का उद्देश्य महिलाओं को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक करना है। कई बार विवाह के बाद महिलाओं को संपत्ति में अपने अधिकारों और कानूनी विकल्पों की पूरी जानकारी नहीं होती।

प्रस्तावित निकाहनामे के जरिए यह स्पष्ट करने की कोशिश होगी कि विवाह होने से महिला के संपत्ति संबंधी अधिकार अपने आप समाप्त नहीं होते। हालांकि, संपत्ति के वास्तविक बंटवारे और उत्तराधिकार का निर्धारण लागू कानून तथा संबंधित परिस्थितियों के अनुसार होगा।

इस प्रावधान को अंतिम रूप देने से पहले कानूनी विशेषज्ञों और संबंधित पक्षों के साथ विचार-विमर्श जरूरी होगा। इसलिए प्रस्तावित व्यवस्था को अंतिम कानूनी नियम मानने से पहले आधिकारिक अधिसूचना देखना महत्वपूर्ण है।

तीन तलाक और हलाला पर भी रहेगा ध्यान

नए निकाहनामे में तलाक से जुड़े प्रावधानों को भी स्पष्ट करने की योजना है। इसमें तीन तलाक और हलाला जैसी प्रथाओं के संबंध में महिलाओं को उनके अधिकारों की जानकारी देने पर जोर रहेगा।

तीन तलाक के मामले में लागू कानून के तहत तत्काल और एकतरफा तीन तलाक को वैध तलाक का तरीका नहीं माना जाता। नए निकाहनामे में इस संबंध में स्पष्ट जानकारी शामिल करने का प्रस्ताव है, ताकि विवाह करने वाले पक्ष कानून को समझ सकें।

हलाला के मुद्दे पर भी महिलाओं की सुरक्षा और उनकी सहमति को महत्व देने की बात कही गई है। किसी महिला को जबरन ऐसी प्रक्रिया से गुजरने के लिए बाध्य करने के मामले में लागू कानून के अनुसार कार्रवाई हो सकती है।

इन प्रावधानों का उद्देश्य विवाह और तलाक से जुड़े मामलों में महिलाओं के अधिकारों की जानकारी बढ़ाना है। साथ ही, विवाद की स्थिति में कानूनी सहायता लेने के विकल्पों के बारे में जागरूकता पैदा करना भी महत्वपूर्ण होगा।

निकाह कराने वाले काजियों के लिए क्या व्यवस्था होगी?

प्रस्तावित निकाहनामे के साथ निकाह कराने वाले काजियों की पहचान और पंजीकरण की व्यवस्था पर भी ध्यान दिया जा रहा है। योजना के अनुसार, निकाह कराने वाले काजियों के लिए पहचान पत्र या निर्धारित अनुमति से जुड़ी व्यवस्था लागू करने पर विचार किया जा रहा है।

इसका उद्देश्य विवाह से संबंधित दस्तावेजों में गड़बड़ी रोकना और पूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना है। यदि निकाह कराने वाले व्यक्ति की पहचान और संबंधित दस्तावेज व्यवस्थित होंगे, तो विवाह के रिकॉर्ड को संभालना भी आसान हो सकता है।

इसके अलावा, निकाह के समय दूल्हा-दुल्हन की उम्र और पहचान से जुड़े दस्तावेजों की जांच पर भी जोर दिया जाएगा। प्रस्तावित व्यवस्था में गवाहों की पहचान सुनिश्चित करने जैसे पहलुओं को भी शामिल किया जा सकता है।

हालांकि, इन व्यवस्थाओं का अंतिम स्वरूप संबंधित नियमों और आधिकारिक मंजूरी के बाद ही स्पष्ट होगा।

दूसरे धर्म में विवाह और धर्म परिवर्तन पर क्या नियम होंगे?

नए निकाहनामे से जुड़े प्रस्तावों में अंतरधार्मिक विवाह और विवाह के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन का विषय भी शामिल है।

प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, यदि दो अलग-अलग धर्मों के व्यक्ति विवाह करना चाहते हैं, तो उन्हें लागू कानून के तहत उपलब्ध उचित कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी। ऐसे मामलों में विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह करने का विकल्प भी उपलब्ध है।

इस विषय पर मुख्य जोर विवाह की कानूनी वैधता, दोनों पक्षों की स्वतंत्र सहमति और आवश्यक दस्तावेजों पर रहेगा। विवाह से जुड़े किसी भी मामले में लागू कानून और संबंधित व्यक्तियों की परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है।

चुनाव से पहले क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?

उत्तराखंड में यूसीसी और उससे जुड़े नियम राज्य की राजनीति में पहले से चर्चा का विषय रहे हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने समान नागरिक संहिता को अपनी प्रमुख नीतिगत पहलों में शामिल किया है।

ऐसे में नए निकाहनामे का प्रस्ताव राजनीतिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक ओर सरकार समान नागरिक संहिता के प्रावधानों को लागू करने पर जोर दे रही है, वहीं दूसरी ओर इसके प्रभाव और समुदायों से जुड़े पहलुओं पर चर्चा जारी है।

हालांकि, किसी फैसले को केवल चुनावी रणनीति के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इसके लिए सरकार के आधिकारिक बयानों, चुनाव कार्यक्रम और संबंधित नीतिगत फैसलों को अलग-अलग समझना जरूरी है।

नए निकाहनामे का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि मसौदे को कब अंतिम रूप दिया जाता है और उसमें कौन-से प्रावधान शामिल किए जाते हैं।

मुस्लिम समुदाय से चर्चा के बाद अंतिम होगा मसौदा

नए निकाहनामे को अंतिम रूप देने से पहले मुस्लिम धर्मगुरुओं, कानूनी विशेषज्ञों और समुदाय के प्रतिनिधियों से चर्चा करने की योजना है। इसका उद्देश्य प्रस्तावित दस्तावेज को लागू कानून के अनुरूप बनाना और उससे जुड़े सवालों को स्पष्ट करना है।

इस प्रक्रिया में निकाह की शर्तों, विवाह पंजीकरण, महिलाओं के अधिकारों और काजियों की भूमिका जैसे विषयों पर विचार किया जा सकता है।

मसौदे को अंतिम मंजूरी मिलने के बाद ही इसकी सभी शर्तों और प्रक्रियाओं की स्पष्ट जानकारी सामने आएगी। तब यह भी पता चलेगा कि निकाहनामे का नया प्रारूप किस तारीख से लागू होगा और इसके लिए संबंधित लोगों को क्या प्रक्रिया अपनानी होगी।

निष्कर्ष

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता के अनुरूप नया निकाहनामा तैयार करने की पहल विवाह से जुड़े नियमों को स्पष्ट करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। प्रस्तावित दस्तावेज में एक से अधिक शादी पर रोक, बेटियों के संपत्ति अधिकार, तलाक से जुड़े प्रावधान और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों को शामिल करने की योजना है।

फिलहाल मसौदे को अंतिम रूप देने के लिए संबंधित विशेषज्ञों और समुदाय के प्रतिनिधियों से चर्चा की जरूरत है। इसकी अंतिम शर्तें और लागू होने की तारीख आधिकारिक मंजूरी के बाद ही स्पष्ट होंगी। इसलिए इस मामले में प्रस्तावित बदलावों और लागू कानूनी प्रावधानों के बीच अंतर समझना जरूरी है।

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