एमपी हाई कोर्ट को मिलेंगे 7 नए जज, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने सात नामों पर लगाई मुहर
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की दिशा में अहम कदम उठाया गया है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने सात अधिवक्ताओं को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश को मंजूरी दी है। यह फैसला 26 अक्टूबर 2026 को हुई कॉलेजियम की बैठक में लिया गया। इन नियुक्तियों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अदालत में न्यायिक कामकाज की क्षमता बढ़ने की उम्मीद है।
एमपी हाई कोर्ट में 53 न्यायाधीशों के पद स्वीकृत हैं, लेकिन सितंबर 2026 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अदालत में 38 न्यायाधीश कार्यरत थे। इस स्थिति में 15 पद खाली थे। सातों नियुक्तियां औपचारिक रूप से पूरी होने पर कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या 45 हो सकती है। इसके बावजूद आठ पद रिक्त रहेंगे। <Cite refs={[“turn541649search0″,”turn541649search10”]}/>
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने सात नामों को दी मंजूरी
कॉलेजियम की बैठक में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में नियुक्ति के लिए सात अधिवक्ताओं के नामों को मंजूरी दी गई। इस सूची में अलग-अलग स्थानों पर वकालत करने वाले अनुभवी अधिवक्ता शामिल हैं।
कॉलेजियम की ओर से अनुशंसित सात नाम इस प्रकार हैं:
- डॉ. विवेक शरण
- राजेश कुमार शुक्ला
- कनक गहरवार उर्फ कनक लता सिंह
- भक्ति व्यास
- श्रेयस पंडित
- मृणाल एलकर उर्फ मृणाल मजुमदार
- अविनाश जरगर
इन नामों पर मुहर लगना नियुक्ति प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है। हालांकि, कॉलेजियम की सिफारिश के बाद भी न्यायाधीशों की नियुक्ति अपने आप पूरी नहीं हो जाती। इसके लिए केंद्र सरकार और राष्ट्रपति के स्तर पर निर्धारित औपचारिक प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में कितने पद हैं खाली?
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में न्यायाधीशों के कुल 53 पद स्वीकृत हैं। उपलब्ध सितंबर 2026 के आंकड़ों के अनुसार, इनमें से 38 पदों पर न्यायाधीश कार्यरत थे। इस तरह उस समय 15 पद खाली थे।
यदि कॉलेजियम की सिफारिश के अनुसार सातों अधिवक्ताओं की नियुक्ति हो जाती है, तो कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर 45 हो सकती है। इसके बाद भी स्वीकृत पदों के मुकाबले आठ पद खाली रहेंगे।
न्यायाधीशों के रिक्त पदों का असर अदालत के कामकाज पर पड़ सकता है। अदालतों में बड़ी संख्या में मामले सुनवाई की प्रतीक्षा करते हैं। ऐसे में न्यायाधीशों की उपलब्धता बढ़ने से मामलों को सुनने और उन पर निर्णय देने की क्षमता में सुधार हो सकता है।
हालांकि, केवल नियुक्तियों से सभी लंबित मामलों का तुरंत निपटारा संभव नहीं है। इसके लिए प्रभावी केस मैनेजमेंट, पर्याप्त न्यायिक और प्रशासनिक संसाधन तथा नियमित सुनवाई भी जरूरी हैं।
लंबित मामलों की सुनवाई में तेजी आने की उम्मीद
एमपी हाई कोर्ट में सात नए न्यायाधीशों की नियुक्ति से न्यायिक व्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है। न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने पर अदालत के पास मामलों की सुनवाई के लिए अधिक क्षमता उपलब्ध हो सकती है।
हाई कोर्ट में नागरिक और आपराधिक मामलों के अलावा संवैधानिक याचिकाएं, सरकारी फैसलों को चुनौती देने वाले मामले और अन्य कानूनी विवाद भी सुने जाते हैं। अलग-अलग श्रेणियों के मामलों में सुनवाई और निर्णय के लिए समय तथा न्यायिक संसाधनों की जरूरत होती है।
यदि सातों नियुक्तियां पूरी हो जाती हैं, तो अदालत के प्रशासन को उपलब्ध न्यायाधीशों के अनुसार कामकाज की योजना बनाने में मदद मिल सकती है। इससे मामलों के आवंटन और नियमित सुनवाई की व्यवस्था को बेहतर बनाने का अवसर मिलेगा।
वहीं, लंबित मामलों में वास्तविक कमी कितनी होगी, यह कई बातों पर निर्भर करेगा। इनमें नए न्यायाधीशों की कार्यभार संभालने की तारीख, मामलों की संख्या और प्रकृति तथा अदालत के समग्र कामकाज की स्थिति शामिल हैं।
कॉलेजियम की सिफारिश के बाद क्या होगी प्रक्रिया?
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादलों से जुड़ी सिफारिशें करता है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के लिए सात अधिवक्ताओं के नामों को मंजूरी मिलने के बाद अब अगला चरण नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ा है।
सिफारिशें केंद्र सरकार को भेजी जाएंगी। इसके बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत नियुक्तियों पर आगे की कार्रवाई होगी। नियुक्ति की औपचारिक अधिसूचना जारी होने के बाद ही संबंधित अधिवक्ताओं की न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति पूरी मानी जाएगी।
इसलिए फिलहाल इन सात नामों को नियुक्ति के लिए अनुशंसित अधिवक्ताओं के रूप में देखना सही होगा। अंतिम नियुक्ति और पदभार संभालने से जुड़ी जानकारी आधिकारिक आदेश जारी होने के बाद स्पष्ट होगी।
यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि कॉलेजियम की मंजूरी और न्यायाधीश के रूप में औपचारिक नियुक्ति दो अलग-अलग चरण हैं। आम तौर पर नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही संबंधित व्यक्ति हाई कोर्ट में न्यायाधीश की जिम्मेदारी संभालता है।
न्यायिक व्यवस्था के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
न्यायपालिका में पर्याप्त संख्या में न्यायाधीशों की उपलब्धता न्यायिक व्यवस्था के प्रभावी संचालन के लिए महत्वपूर्ण है। अदालतों में मामलों की संख्या अधिक होने पर प्रत्येक मामले की सुनवाई और निर्णय के लिए उचित समय देना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
ऐसी स्थिति में रिक्त पदों को भरने से अदालत की कार्यक्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। इससे मामलों की सुनवाई के लिए अधिक न्यायिक संसाधन उपलब्ध होते हैं और अदालत प्रशासन को कामकाज की योजना बनाने में सहूलियत मिल सकती है।
हालांकि, न्याय मिलने की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति के साथ अन्य सुधार भी जरूरी हैं। अदालतों में पर्याप्त स्टाफ, आधुनिक तकनीक, प्रभावी सुनवाई व्यवस्था और समय पर जरूरी दस्तावेज उपलब्ध होना भी महत्वपूर्ण है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में सात अधिवक्ताओं की नियुक्ति की सिफारिश इसी लिहाज से अहम मानी जा रही है। अब सभी की नजर नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने और आधिकारिक अधिसूचना जारी होने पर रहेगी।
निष्कर्ष
एमपी हाई कोर्ट में सात नए न्यायाधीशों की नियुक्ति की दिशा में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। डॉ. विवेक शरण, राजेश कुमार शुक्ला, कनक गहरवार, भक्ति व्यास, श्रेयस पंडित, मृणाल एलकर और अविनाश जरगर के नामों को मंजूरी दी गई है।
इन नियुक्तियों की प्रक्रिया पूरी होने पर हाई कोर्ट में कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या 38 से बढ़कर 45 हो सकती है। इससे न्यायिक कामकाज की क्षमता बढ़ने और लंबित मामलों की सुनवाई में मदद मिलने की उम्मीद है। हालांकि, नियुक्तियों को अंतिम रूप देने के लिए निर्धारित सरकारी प्रक्रिया और आधिकारिक अधिसूचना का इंतजार करना होगा।

