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एमपी में हर साल कैंसर से 45 हजार मौतें, 98 हजार से ज्यादा नए मरीज; सरकारी अस्पतालों में इलाज का संकट

एमपी में कैंसर से हर साल 45 हजार मौतों, 80 हजार नए मरीजों और सरकारी अस्पतालों में इलाज के संकट को दर्शाता न्यूज़ क्रिटिक (News Critic) का ग्राफ़िक।

मध्य प्रदेश में कैंसर मरीजों की बढ़ती संख्या स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2025 में प्रदेश में करीब 98,759 नए कैंसर मामलों का अनुमान लगाया गया था, जबकि मौतों का आंकड़ा भी 45 हजार के आसपास पहुंच चुका है।
समस्या सिर्फ मरीजों की बढ़ती संख्या तक सीमित नहीं है। कई जिला अस्पतालों में कैंसर विशेषज्ञ, रेडिएशन जैसी जरूरी सुविधाएं और उपचार की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से मरीजों को बड़े शहरों या निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है।

मध्य प्रदेश में कैंसर के कितने मामले सामने आ रहे हैं?

कैंसर को लेकर उपलब्ध सरकारी आंकड़े मध्य प्रदेश की स्थिति की गंभीरता को सामने रखते हैं। संसद में उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में सभी प्रकार के कैंसर को मिलाकर नए मामलों की अनुमानित संख्या लगातार बढ़ी है।

2021 में मध्य प्रदेश में नए कैंसर मामलों की अनुमानित संख्या 86,126 थी। यह आंकड़ा 2022 में बढ़कर 89,737, 2023 में 93,560 और 2024 में 97,621 तक पहुंच गया। 2025 के लिए यह संख्या 98,759 अनुमानित की गई है।

यानी पांच साल में अनुमानित नए मामलों की संख्या में करीब 12,600 से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। यह बढ़ोतरी बताती है कि प्रदेश में कैंसर की रोकथाम, समय पर जांच और इलाज की व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है।

हर साल 45 हजार के करीब मौतों का आंकड़ा

मध्य प्रदेश में कैंसर से होने वाली मौतों का आंकड़ा भी चिंता बढ़ाने वाला है। केंद्र सरकार द्वारा जारी राज्यवार आंकड़ों में 2022 में मध्य प्रदेश में कैंसर से अनुमानित 45,176 मौतें दर्ज की गई थीं। 2020 में यह संख्या 42,966 और 2021 में 44,056 थी।

यही वजह है कि प्रदेश में कैंसर को लेकर केवल इलाज की सुविधा बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा। बीमारी की शुरुआती पहचान, नियमित स्क्रीनिंग, लोगों में जागरूकता और समय पर विशेषज्ञ तक पहुंच भी उतनी ही जरूरी है।

यहां यह समझना जरूरी है कि अलग-अलग सरकारी रिपोर्टों में कैंसर के आंकड़े अनुमानित हो सकते हैं और नए मामलों तथा मौतों के आंकड़े अलग-अलग वर्षों के होते हैं। इसलिए 80 हजार नए मरीज और 45 हजार मौतों को एक ही वर्ष का आंकड़ा मानना सही नहीं होगा।

सरकारी अस्पतालों में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

कैंसर का इलाज सामान्य बीमारी की तरह केवल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या सामान्य जिला अस्पताल में पूरा नहीं हो सकता। इसके लिए पैथोलॉजी, इमेजिंग, बायोप्सी, सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन और विशेषज्ञ डॉक्टरों जैसी अलग-अलग सुविधाओं की आवश्यकता पड़ती है।

जुलाई 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में सामने आया कि मध्य प्रदेश के कई जिला अस्पतालों में ऑन्कोलॉजिस्ट यानी कैंसर विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं। कई जगह रेडिएशन थेरेपी जैसी बुनियादी कैंसर उपचार सुविधाओं का भी अभाव बताया गया।

इसका सीधा असर उन मरीजों पर पड़ता है जिनकी शुरुआती जांच जिला स्तर पर हो जाती है, लेकिन आगे के उपचार के लिए उन्हें बड़े चिकित्सा संस्थानों में भेजना पड़ता है।

डॉक्टरों और विशेषज्ञों की कमी भी बड़ी वजह

मध्य प्रदेश में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने केवल कैंसर उपचार की मशीनों की कमी ही चुनौती नहीं है। डॉक्टरों और विशेषज्ञों के खाली पद भी स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावित कर रहे हैं।

जुलाई 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में मेडिकल ऑफिसर और विशेषज्ञ डॉक्टरों के कुल 6,310 पद खाली बताए गए थे। विशेषज्ञों की कमी का असर जिला अस्पतालों से लेकर ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों तक दिखाई देता है।

कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में विशेषज्ञ डॉक्टर की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। मरीज की रिपोर्ट देखकर बीमारी का स्तर तय करना, आगे की जांच, उपचार की योजना और उपचार के दौरान निगरानी के लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञों की जरूरत होती है।

जिला स्तर पर इलाज की सुविधा बढ़ाने की जरूरत

कैंसर के मरीजों के लिए सबसे बड़ी परेशानी यह है कि जांच और इलाज के लिए उन्हें लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है। ग्रामीण और छोटे शहरों से मरीजों का भोपाल, इंदौर, जबलपुर जैसे बड़े चिकित्सा केंद्रों की ओर जाना आम बात है।

इससे मरीज और परिवार दोनों पर आर्थिक तथा मानसिक दबाव बढ़ता है। यात्रा, रहने, जांच और उपचार का खर्च कई परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

केंद्र सरकार ने देशभर में कैंसर की जांच और उपचार को जिला स्तर तक पहुंचाने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत 30 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों में ओरल, ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर सहित प्रमुख गैर-संचारी रोगों की स्क्रीनिंग की जा रही है।

स्क्रीनिंग और शुरुआती पहचान क्यों जरूरी?

कैंसर के मामले में बीमारी की शुरुआती पहचान बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। शुरुआती स्तर पर बीमारी का पता चलने पर मरीज को समय पर विशेषज्ञ तक पहुंचाया जा सकता है और उपचार की संभावनाएं बेहतर हो सकती हैं।

इसी उद्देश्य से आयुष्मान आरोग्य मंदिरों और स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से स्क्रीनिंग पर जोर दिया जा रहा है। प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी संदिग्ध मामलों की पहचान कर मरीजों को आगे की जांच और उपचार के लिए रेफर कर सकते हैं।

प्रदेश में कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए स्क्रीनिंग का दायरा बढ़ाना और रेफरल सिस्टम को मजबूत करना जरूरी है। केवल स्क्रीनिंग करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्क्रीनिंग में संदिग्ध पाए गए मरीज को आगे की जांच और उपचार जल्दी मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

एमपी में कैंसर संस्थानों को मजबूत करने की चुनौती

मध्य प्रदेश में कैंसर उपचार की उच्च स्तरीय सुविधाओं को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। जबलपुर स्थित नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में स्वीकृत स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट को लेकर भी सुविधाओं के पूरी तरह विकसित नहीं होने की रिपोर्ट सामने आई है।

फरवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र से वर्ष 2014 में स्वीकृत इस संस्थान के लिए 120 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई थी, लेकिन एक दशक बाद भी तृतीयक स्तर की कैंसर उपचार सुविधाओं को लेकर स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं थी।

ऐसे संस्थानों को समय पर उपकरण, विशेषज्ञ डॉक्टर और जरूरी मानव संसाधन उपलब्ध कराना प्रदेश के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। इससे मरीजों को इलाज के लिए दूसरे राज्यों या निजी अस्पतालों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

सरकार की योजनाओं से क्या उम्मीद?

केंद्र सरकार के अनुसार देश में कैंसर देखभाल को मजबूत करने के लिए जिला अस्पतालों में डे-केयर कैंसर सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों का उद्देश्य जिला स्तर पर कीमोथेरेपी और अन्य डे-केयर ऑन्कोलॉजी सेवाओं को उपलब्ध कराना है।

आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत पात्र परिवारों को सालाना 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर मिलता है। इसमें मेडिकल ऑन्कोलॉजी, सर्जिकल ऑन्कोलॉजी और रेडिएशन ऑन्कोलॉजी से जुड़ी कई प्रक्रियाएं भी शामिल हैं।

मध्य प्रदेश के 2026-27 के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 23,747 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। राज्य में जिला अस्पतालों, सिविल अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का बड़ा नेटवर्क मौजूद है, लेकिन कैंसर जैसी विशेषज्ञ सेवाओं के लिए इन संस्थानों को अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत है।

मरीजों के लिए क्या बदलना जरूरी है?

कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में कई स्तरों पर सुधार की जरूरत दिखाई देती है।

  • जिला स्तर पर कैंसर स्क्रीनिंग को नियमित और प्रभावी बनाया जाए।
  • संदिग्ध मरीजों की जांच और बायोप्सी में देरी कम की जाए।
  • जिला अस्पतालों में कैंसर विशेषज्ञों और प्रशिक्षित स्टाफ की उपलब्धता बढ़ाई जाए।
  • जरूरत के अनुसार डे-केयर कैंसर सेंटर और कीमोथेरेपी सुविधाएं विकसित की जाएं।
  • रेडिएशन और सर्जिकल ऑन्कोलॉजी जैसी सेवाओं तक मरीजों की पहुंच आसान बनाई जाए।
  • सरकारी योजनाओं की जानकारी मरीजों और उनके परिवारों तक बेहतर तरीके से पहुंचाई जाए।
  • ग्रामीण इलाकों में कैंसर के शुरुआती लक्षणों को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जाएं।

बढ़ते मामलों के बीच जागरूकता भी जरूरी

कैंसर के आंकड़े बढ़ने के पीछे कई तरह के जोखिम कारक हो सकते हैं। ऐसे में लोगों के बीच तंबाकू और अन्य ज्ञात जोखिम कारकों से बचाव, स्वस्थ जीवनशैली और समय पर चिकित्सकीय जांच को लेकर जागरूकता बढ़ाना जरूरी है।

किसी भी संदिग्ध लक्षण को लंबे समय तक नजरअंदाज करना उचित नहीं है। लगातार रहने वाली गांठ, असामान्य रक्तस्राव, लंबे समय तक रहने वाली खांसी, आवाज में बदलाव या बिना स्पष्ट कारण वजन कम होने जैसे लक्षणों पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी हो सकता है।

हालांकि ऐसे लक्षण हमेशा कैंसर का संकेत नहीं होते। सही निष्कर्ष केवल डॉक्टर की जांच और आवश्यक परीक्षणों के बाद ही निकाला जा सकता है।

निष्कर्ष

मध्य प्रदेश में कैंसर का बढ़ता बोझ स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने एक गंभीर चुनौती है। 2025 में करीब 98,759 नए मामलों का अनुमान और 2022 में 45,176 कैंसर मौतों का सरकारी आंकड़ा इस समस्या के बड़े स्तर को दिखाता है।

सबसे बड़ी जरूरत यह है कि बीमारी की पहचान से लेकर अंतिम उपचार तक मरीज को एक मजबूत और आसान स्वास्थ्य व्यवस्था मिले। जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ, जांच सुविधाएं, डे-केयर उपचार और जरूरी उपकरण उपलब्ध होंगे तो मरीजों को बड़े शहरों की ओर कम भागना पड़ेगा।

कैंसर के खिलाफ लड़ाई केवल अस्पतालों और डॉक्टरों की जिम्मेदारी नहीं है। समय पर स्क्रीनिंग, जागरूकता, शुरुआती जांच और सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का बेहतर इस्तेमाल मिलकर इस बढ़ते संकट का सामना करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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