परिसीमन बिल पर हलचल तेज, DMK ने बुलाई सांसदों की बैठक; विशेष सत्र की भी चर्चा
परिसीमन बिल को लेकर केंद्र की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। संसद के संभावित विशेष सत्र की चर्चाओं के बीच द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) की सांसदों की बैठक भी अहम मानी जा रही है। इस बैठक की अध्यक्षता पार्टी प्रमुख एम.के. स्टालिन ने की। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों पर आगे की रणनीति इस घटनाक्रम से प्रभावित हो सकती है।
परिसीमन का सीधा संबंध लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं तथा प्रतिनिधित्व की व्यवस्था से है। इसलिए यह केवल चुनावी प्रक्रिया का मामला नहीं, बल्कि राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा संवेदनशील विषय भी है। खासकर दक्षिण भारतीय राज्यों में इस बात को लेकर चिंता जताई जाती रही है कि भविष्य में परिसीमन का आधार क्या होगा और इससे अलग-अलग राज्यों की सीटों पर क्या असर पड़ेगा।
इसी बीच, केंद्र सरकार द्वारा संसद का विशेष सत्र बुलाए जाने की संभावनाओं पर भी चर्चा हो रही है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से संबंधित विधेयकों को आगे बढ़ाने के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, विशेष सत्र की तारीख और विधेयकों के एजेंडे को लेकर अंतिम आधिकारिक पुष्टि के बिना इसे तय कार्यक्रम नहीं माना जा सकता।
DMK सांसदों की बैठक क्यों है महत्वपूर्ण?
चेन्नई में हुई DMK संसदीय दल की बैठक की अध्यक्षता एम.के. स्टालिन ने की। इसमें लोकसभा और राज्यसभा के पार्टी सांसद शामिल हुए। बैठक के एजेंडे में राज्य और राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल थे। परिसीमन को लेकर चल रही चर्चाओं के कारण इस बैठक पर भी राजनीतिक नजरें टिकी रहीं।
हालांकि, बैठक का महत्व केवल परिसीमन बिल तक सीमित नहीं था। पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को रद्द करने और मतदान में बैलेट पेपर की व्यवस्था बहाल करने जैसी मांगों पर भी प्रस्ताव पारित किए।
परिसीमन को लेकर DMK की चिंता का संबंध तमिलनाडु के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से है। पार्टी लंबे समय से इस बात पर जोर देती रही है कि जनसंख्या नियंत्रण और विकास के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करने वाले दक्षिणी राज्यों को परिसीमन के दौरान नुकसान नहीं होना चाहिए।
इसी वजह से पार्टी के रुख को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि केंद्र सरकार संविधान संशोधन से जुड़े विधेयक को आगे बढ़ाती है, तो DMK का रुख संसद में राजनीतिक गणित और दक्षिणी राज्यों की चिंताओं के संदर्भ में चर्चा का विषय बना रह सकता है।
परिसीमन बिल क्या है और इसका असर क्या होगा?
परिसीमन का अर्थ चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है। इसका उद्देश्य निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं के प्रतिनिधित्व से जुड़ी व्यवस्था को निर्धारित नियमों के अनुसार व्यवस्थित करना होता है। परिसीमन के तहत लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाओं में बदलाव हो सकता है।
भारत में परिसीमन का विषय संवैधानिक प्रावधानों और संबंधित कानूनों से जुड़ा है। इसके तहत निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने के लिए परिसीमन आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। आयोग संबंधित आंकड़ों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर अपना काम करता है।
इस प्रक्रिया का प्रभाव अलग-अलग राज्यों पर अलग हो सकता है। यदि भविष्य में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाई जाती है, तो राज्यों के बीच सीटों के वितरण और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर चर्चा होना स्वाभाविक है।
दक्षिण भारतीय राज्यों की प्रमुख चिंता यह रही है कि जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व तय करने की प्रक्रिया में जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में प्रगति की है, उन्हें इसका नुकसान नहीं उठाना चाहिए।
दूसरी ओर, परिसीमन समर्थकों का कहना है कि निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं के प्रतिनिधित्व को संतुलित बनाना जरूरी है। इस तरह परिसीमन का मुद्दा प्रशासनिक प्रक्रिया के साथ-साथ संघीय व्यवस्था और राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व के संतुलन से भी जुड़ा हुआ है।
संसद के विशेष सत्र की चर्चा क्यों तेज हुई?
परिसीमन और महिला आरक्षण से संबंधित विधेयकों को लेकर संसद का विशेष सत्र बुलाए जाने की चर्चा तेज है। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि केंद्र सरकार अक्टूबर के अंतिम दिनों में विशेष सत्र बुलाने की संभावनाओं पर विचार कर रही है।
इन चर्चाओं की एक वजह यह है कि संसद के पिछले विशेष सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से संबंधित संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव को आवश्यक समर्थन नहीं मिला था। अब इन प्रस्तावों को दोबारा आगे बढ़ाने की संभावना पर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ी हैं।
हालांकि, विशेष सत्र को लेकर चर्चा और औपचारिक घोषणा अलग-अलग बातें हैं। जब तक सरकार की ओर से तारीख, अवधि और कार्यसूची की आधिकारिक जानकारी नहीं आती, तब तक यह स्पष्ट नहीं कहा जा सकता कि सत्र कब बुलाया जाएगा और उसमें कौन-कौन से विधेयक पेश होंगे।
विशेष सत्र बुलाए जाने की स्थिति में सरकार को विधेयक पारित कराने के लिए संसद में जरूरी समर्थन जुटाना होगा। इसी कारण विभिन्न राजनीतिक दलों के रुख और उनके सांसदों की संख्या पर चर्चा हो रही है।
संविधान संशोधन के लिए कितने समर्थन की जरूरत?
परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों में यदि संविधान संशोधन की आवश्यकता होती है, तो उन्हें पारित कराने की प्रक्रिया सामान्य विधेयकों से अलग होती है। संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत ऐसे संशोधनों के लिए संसद के प्रत्येक सदन में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है।
आमतौर पर इसका अर्थ है कि संबंधित सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई समर्थन जरूरी होता है। कुछ संवैधानिक संशोधनों के लिए राज्यों की कम से कम आधी विधानसभाओं की मंजूरी भी आवश्यक होती है। यह जरूरत संबंधित संशोधन के विषय पर निर्भर करती है।
इसलिए किसी विधेयक को पारित कराने के लिए केवल सत्तारूढ़ गठबंधन की संख्या देखना पर्याप्त नहीं है। सदन में कुल सदस्य संख्या, मतदान में भाग लेने वाले सांसदों और संबंधित संवैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखना पड़ता है।
DMK के पास लोकसभा में 22 और राज्यसभा में 8 सांसद हैं। ऐसे में पार्टी के रुख को लेकर चर्चा स्वाभाविक है। हालांकि, सांसदों की संख्या अपने आप में समर्थन की पुष्टि नहीं करती। किसी विधेयक पर पार्टी का वास्तविक रुख आधिकारिक बयान, निर्णय या मतदान के समय ही स्पष्ट होगा।
महिला आरक्षण और परिसीमन का क्या संबंध है?
महिला आरक्षण का मुद्दा भी इस राजनीतिक घटनाक्रम से जुड़ा हुआ है। संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत किया गया था। इसके लागू होने की प्रक्रिया परिसीमन और संबंधित संवैधानिक प्रावधानों से जुड़ी है।
सरकार की ओर से महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने को एक महत्वपूर्ण उद्देश्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वहीं, परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों के बीच अलग-अलग चिंताएं हैं। कुछ दल चाहते हैं कि महिला आरक्षण लागू करने के साथ राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व के संतुलन को लेकर स्पष्टता हो।
इस विषय पर चर्चा में दो सवाल प्रमुख हैं। पहला, महिला आरक्षण को प्रभावी रूप से लागू करने की समयसीमा क्या होगी? दूसरा, लोकसभा सीटों की संख्या और राज्यों के बीच उनके वितरण को किस तरह निर्धारित किया जाएगा?
इन सवालों का जवाब संबंधित विधेयकों के अंतिम प्रारूप और संवैधानिक प्रक्रिया से ही मिलेगा। इसलिए महिला आरक्षण और परिसीमन को एक साथ चर्चा में लाने के बावजूद दोनों से जुड़े प्रावधानों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
आगे क्या हो सकता है?
आने वाले दिनों में परिसीमन बिल को लेकर राजनीतिक दलों के बयान और बैठकों पर नजर रहेगी। यदि केंद्र सरकार विशेष सत्र बुलाने का फैसला करती है, तो उसके एजेंडे और प्रस्तावित विधेयकों को लेकर स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।
DMK समेत विपक्षी दलों की मांग है कि व्यापक संवैधानिक बदलावों पर सभी संबंधित पक्षों से चर्चा होनी चाहिए। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार की ओर से समर्थन जुटाने की कोशिशों को लेकर भी चर्चाएं जारी हैं। लेकिन अंतिम राजनीतिक समीकरण तभी स्पष्ट होंगे, जब संबंधित दल अपना रुख सार्वजनिक करेंगे और संसद की कार्यवाही को लेकर आधिकारिक घोषणा होगी।
निष्कर्ष
परिसीमन बिल को लेकर तेज होती राजनीतिक गतिविधियों के बीच DMK की सांसदों की बैठक और संसद के संभावित विशेष सत्र पर सबकी नजर है। यह मुद्दा केवल लोकसभा सीटों की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्यों के प्रतिनिधित्व, महिला आरक्षण और संघीय व्यवस्था से भी जुड़ा है।
फिलहाल विशेष सत्र की चर्चा को अंतिम घोषणा नहीं माना जा सकता। आने वाले दिनों में सरकार का फैसला, राजनीतिक दलों का रुख और विधेयक का वास्तविक प्रारूप इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करेंगे।

