भारत से टकराव के बाद पाकिस्तान में बढ़ा सियासी भूचाल, क्या तख्तापलट की ओर बढ़ रहा है मुल्क?
भारत के खिलाफ हालिया सैन्य तनाव के बाद पाकिस्तान के भीतर राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक संकट गहराता जा रहा है। जहां एक ओर भारत ने आतंक के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों को ध्वस्त कर दिया, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के भीतर राजनीतिक नेतृत्व की कमजोरी और सेना की बढ़ती पकड़ एक बार फिर तख्तापलट की आशंका को जन्म दे रही है।
संसद में शाहबाज शरीफ को कहा गया “बुजदिल“
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ इस समय जबरदस्त आलोचना के घेरे में हैं। भारत के जवाबी हमले के बाद, संसद के भीतर ही उनके नेतृत्व पर सवाल खड़े हो गए। पाकिस्तान के सांसद शाहिद खट्टक ने संसद में तीखा हमला बोलते हुए कहा कि यदि किसी देश का प्रधानमंत्री खुद कमजोर और डरपोक हो, तो उसकी सेना कभी भी जंग नहीं जीत सकती। यह बयान ना सिर्फ वायरल हो गया बल्कि इससे यह स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि देश की आम जनता और राजनीतिक वर्ग दोनों ही प्रधानमंत्री से संतुष्ट नहीं हैं।
सेना को सुप्रीम कोर्ट की खुली छूट
इन राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला भी सुर्खियों में है, जिसने सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को यह अधिकार दिया है कि वे आम नागरिकों पर भी मिलिट्री कोर्ट में मुकदमा चला सकते हैं। यह फैसला लोकतंत्र की कमजोरियों को उजागर करता है और यह आशंका गहरा देता है कि कहीं सेना एक बार फिर से सत्ता पर कब्जा न कर ले।
इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान में जब भी राजनीतिक नेतृत्व कमजोर पड़ा है, सेना ने सत्ता अपने हाथों में ले ली है। मौजूदा हालातों में भी अगर शाहबाज शरीफ अपनी पकड़ मजबूत नहीं कर पाते, तो आसिम मुनीर जैसे सैन्य अधिकारी के लिए तख्तापलट का रास्ता साफ हो सकता है। पहले इमरान खान को किनारे किया गया और अब शाहबाज शरीफ की स्थिति भी कमजोर होती नजर आ रही है।
बलूचिस्तान में बीएलए का बढ़ता प्रभाव
पाकिस्तान को केवल राजनीतिक और आर्थिक ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय विद्रोह का भी सामना करना पड़ रहा है। बलूचिस्तान में बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने पाकिस्तानी सेना के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। बीएलए का दावा है कि उसने बलूचिस्तान के एक तिहाई हिस्से पर नियंत्रण कर लिया है। भले ही इस दावे को पाकिस्तानी सरकार सिरे से खारिज करे, लेकिन ज़मीनी हकीकत यही है कि बलूच विद्रोही अब और अधिक संगठित और आक्रामक हो गए हैं।
आर्थिक संकट और वैश्विक समर्थन की कमी
इन तमाम चुनौतियों के बीच पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट से भी जूझ रहा है। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और विदेशी कर्ज के बोझ ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। पाकिस्तान इस समय अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और अन्य वैश्विक संस्थाओं से मदद की उम्मीद लगाए बैठा है, लेकिन भारत से उलझने की उसकी हालिया कोशिशों ने उसकी वैश्विक छवि को और नुकसान पहुंचाया है। अब कोई भी देश पाकिस्तान की मदद के लिए आगे आता नहीं दिख रहा।
भविष्य क्या कहता है?
इन तमाम घटनाओं से यह संकेत मिल रहे हैं कि पाकिस्तान एक बार फिर राजनीतिक और सैन्य संकट की ओर बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं, सेना को सुप्रीम कोर्ट से मिली शक्तियों ने सत्ता संतुलन बिगाड़ दिया है, और बलूच विद्रोह जैसे आंतरिक संकट पाकिस्तान की एकता पर गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं।
ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि पाकिस्तान का भविष्य फिलहाल बेहद अनिश्चितता से भरा हुआ है। आने वाले कुछ सप्ताह और महीने यह तय करेंगे कि पाकिस्तान लोकतांत्रिक रास्ते पर आगे बढ़ेगा या एक बार फिर सैन्य शासन की गिरफ्त में चला जाएगा।
