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MP Operation Hamdard: रेलवे स्टेशनों पर 802 बेसहारा लोगों की पहचान, 50 लोगों का परिवार से पुनर्मिलन

मध्य प्रदेश पुलिस के 'ऑपरेशन हमदर्द' अभियान के तहत भोपाल, इंदौर और जबलपुर में 802 लापता व मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों की पहचान कर उन्हें परिवार से मिलाने की खबर दर्शाता न्यूज़ क्रिटिक (News Critic) का इन्फोग्राफिक।
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मध्य प्रदेश में शुरू हुआ ‘ऑपरेशन हमदर्द’

भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार और गवर्नमेंट रेलवे पुलिस (GRP) द्वारा शुरू किया गया ‘ऑपरेशन हमदर्द’ रेलवे स्टेशनों पर रहने वाले बेसहारा, निराश्रित और परिवार से बिछड़े लोगों के लिए नई उम्मीद बनकर सामने आया है। इस अभियान का उद्देश्य ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें सुरक्षित वातावरण, पुनर्वास और परिवार से दोबारा जोड़ना है।

1 जुलाई से भोपाल, इंदौर और जबलपुर रेल इकाइयों में चल रहे इस अभियान के तहत अब तक 802 लोगों की डिजिटल पहचान की जा चुकी है। इनमें कई लोगों को उनके परिवारों से मिलाने में भी सफलता मिली है।

अब तक 802 लोगों का तैयार हुआ डिजिटल रिकॉर्ड

जीआरपी द्वारा तैयार किए गए आंकड़ों के अनुसार अब तक कुल 802 लोगों का विस्तृत डिजिटल डोजियर तैयार किया गया है।

इनमें शामिल हैं—

  • 597 पुरुष
  • 180 महिलाएं
  • 21 बालक
  • 4 बालिकाएं

प्रत्येक व्यक्ति की लगभग 20 महत्वपूर्ण जानकारियां डिजिटल रूप से दर्ज की जा रही हैं, जिनमें नाम, उम्र, पता, आधार नंबर, मोबाइल नंबर, पारिवारिक संपर्क, आजीविका, स्टेशन पर रहने की अवधि, आपराधिक रिकॉर्ड, नशे की आदत और फोटो शामिल हैं।

50 लोगों की परिवार से कराई गई मुलाकात

अभियान के तहत अब तक—

  • 50 लोगों को उनके परिवारों से दोबारा मिलाया गया।
  • 25 लोगों को शेल्टर होम और वृद्धाश्रम भेजा गया।
  • कई जरूरतमंदों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने और काउंसलिंग के जरिए घर लौटने के लिए प्रेरित किया गया।

यह अभियान फिलहाल प्रदेश के लगभग 700 रेलवे स्टेशनों, जिनमें करीब 540 प्रमुख स्टेशन शामिल हैं, पर संचालित किया जा रहा है।

कैसे काम कर रही है जीआरपी?

रेलवे पुलिस की टीम स्टेशन परिसर में रहने वाले प्रत्येक बेसहारा व्यक्ति की पहचान कर उसका डिजिटल रिकॉर्ड तैयार कर रही है। अभियान को प्रभावी बनाने के लिए पुलिसकर्मियों को भी लक्ष्य दिए गए हैं।

  • प्रत्येक आरक्षक को कम से कम 10 मामलों पर कार्रवाई करनी होगी।
  • प्रधान आरक्षक को 20 मामलों का लक्ष्य दिया गया है।

दिल छू लेने वाली सफल कहानियां

ग्वालियर स्टेशन पर बिछड़े भाई-बहन परिवार से मिले

ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर पिता से बिछड़े दो छोटे भाई-बहन रोते हुए मिले। जीआरपी ने तुरंत उनकी पहचान कर परिजनों से संपर्क किया और दोनों बच्चों को सुरक्षित परिवार को सौंप दिया।

भोपाल स्टेशन पर मिली एक माह की बच्ची

भोपाल रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर-6 के बाहर एक ऑटो में करीब एक माह की बच्ची लावारिस अवस्था में मिली। पुलिस ने बच्ची को सुरक्षित संरक्षण में लेकर बाल संरक्षण संस्था के सुपुर्द किया और मामले की जांच शुरू कर दी।

विदिशा की बुजुर्ग महिला लौटी अपने घर

करीब दो वर्षों से स्टेशन परिसर में रह रही 60 वर्षीय महिला की पहचान कर उसके बेटे से संपर्क किया गया। काउंसलिंग के बाद परिवार ने महिला को अपने साथ घर ले लिया।

इंदौर में बुजुर्ग को मिला आश्रय

राजस्थान के रहने वाले 78 वर्षीय बुजुर्ग लंबे समय से स्टेशन पर रह रहे थे। काउंसलिंग के बाद उन्हें सुरक्षित वृद्धाश्रम में भेजा गया।

क्यों जरूरी है ऑपरेशन हमदर्द?

रेलवे स्टेशनों पर बड़ी संख्या में ऐसे लोग रहते हैं जो परिवार से बिछड़ चुके हैं या आर्थिक एवं सामाजिक कारणों से बेसहारा जीवन जी रहे हैं। ऐसे लोगों की पहचान न होने से वे अपराधियों के निशाने पर आ सकते हैं और स्टेशन की सुरक्षा व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है।

ऑपरेशन हमदर्द का उद्देश्य केवल पहचान करना नहीं बल्कि—

  • परिवार से पुनर्मिलन
  • सुरक्षित पुनर्वास
  • सरकारी योजनाओं से जोड़ना
  • अपराध और मानव तस्करी पर रोक
  • स्टेशन परिसर की सुरक्षा मजबूत करना

भी है।

महिलाओं, बच्चों और दिव्यांगों पर विशेष ध्यान

अभियान के दौरान—

  • नाबालिग बच्चों के मामलों में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत कार्रवाई की जा रही है।
  • महिलाओं को महिला एवं बाल विकास विभाग से जोड़ा जा रहा है।
  • दिव्यांगों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने की पहल की जा रही है।
  • भिक्षावृत्ति से जुड़े संगठित गिरोहों पर भी विशेष निगरानी रखी जा रही है।

हर छह महीने चलेगा अभियान

रेलवे पुलिस के अनुसार यह विशेष अभियान जुलाई माह तक जारी रहेगा। इसके बाद इसे हर वर्ष जनवरी और जुलाई में नियमित रूप से चलाया जाएगा, ताकि रेलवे स्टेशनों पर रहने वाले जरूरतमंद लोगों की पहचान और पुनर्वास लगातार किया जा सके।

मध्य प्रदेश बना देश के लिए मिसाल

‘ऑपरेशन हमदर्द’ केवल कानून व्यवस्था का अभियान नहीं बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता की मिसाल भी है। डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने, परिवारों से पुनर्मिलन कराने और जरूरतमंदों को सरकारी सहायता से जोड़ने जैसी पहल मध्य प्रदेश को इस दिशा में अग्रणी राज्यों में शामिल करती है।

यदि यह मॉडल लगातार सफल रहता है तो अन्य राज्यों में भी इसे अपनाया जा सकता है।

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