April 28, 2026

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ईरान-अमेरिका तनाव का असर: महंगा हुआ पाम ऑयल, रसोई का बजट बिगड़ा

करीब दो महीनों से चल रहे ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का असर अब आम लोगों की जेब पर साफ दिखाई देने लगा है। रोजमर्रा की चीज़ें जैसे खाने का तेल, रसोई गैस, साबुन और बिस्किट धीरे-धीरे महंगे होते जा रहे हैं। इनमें सबसे बड़ा असर पाम ऑयल की कीमतों में बढ़ोतरी से पड़ा है। पाम ऑयल का इस्तेमाल सिर्फ खाने के तेल में ही नहीं, बल्कि कई दैनिक उपयोग की चीजों में होता है। यही वजह है कि इसकी कीमत बढ़ने से घर का बजट प्रभावित हो रहा है।

पाम ऑयल की सप्लाई और बढ़ती कीमतें

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा खाद्य तेल के रूप में विदेशों से आयात करता है। हर साल देश करीब 1.67 करोड़ टन खाद्य तेल मंगाता है, जिसमें लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा पाम ऑयल का होता है। यह मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है। यह तेल समुद्री रास्तों से होकर भारत पहुंचता है, खासकर मलक्का जलडमरूमध्य के जरिए।

लेकिन मौजूदा अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण समुद्री व्यापार महंगा हो गया है। जहाजों के बीमा और माल ढुलाई (फ्रेट) की लागत बढ़ने से आयात महंगा हो गया है। इसका सीधा असर बाजार में मिलने वाले खाने के तेल की कीमतों पर पड़ा है।

दूसरी ओर, इंडोनेशिया ने भी अपने घरेलू उपयोग को प्राथमिकता देते हुए पाम ऑयल के निर्यात पर नियंत्रण लगाने के संकेत दिए हैं। वहां पाम ऑयल का उपयोग बायोडीजल बनाने में भी होता है। इस कारण वैश्विक बाजार में इसकी उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है।

आयात में गिरावट और बढ़ती महंगाई

मार्च 2026 में भारत में पाम ऑयल का आयात लगभग 19 प्रतिशत कम हो गया, जो पिछले तीन महीनों में सबसे निचले स्तर पर रहा। इसका मुख्य कारण बढ़ती कीमतें हैं, जिसके चलते आयातकों ने खरीद घटा दी। इसके अलावा, फरवरी में सनफ्लावर ऑयल का आयात भी लगभग आधा रह गया। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ऊंची कीमतों ने सप्लाई को प्रभावित किया है।

जब बाजार में दो बड़े खाद्य तेलों की आपूर्ति कम हो जाती है, तो कीमतों का बढ़ना स्वाभाविक है। यही कारण है कि कई जगहों पर खाने का तेल 180 रुपये प्रति लीटर से भी ज्यादा महंगा हो चुका है। औसतन देखा जाए तो तेल की कीमतों में करीब 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

रोजमर्रा की चीज़ों पर असर

पाम ऑयल सिर्फ खाना बनाने में ही इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि यह कई अन्य उत्पादों का भी अहम हिस्सा है। साबुन, हेयर ऑयल, बिस्किट, नमकीन और नूडल्स जैसे प्रोडक्ट्स में इसका उपयोग होता है। जब इसकी कीमत बढ़ती है, तो कंपनियों की लागत भी बढ़ जाती है।

इस स्थिति में कंपनियां आमतौर पर दो तरीके अपनाती हैं—या तो उत्पाद की कीमत बढ़ा देती हैं या फिर उसी कीमत में मात्रा कम कर देती हैं। इस प्रक्रिया को “श्रिंकफ्लेशन” कहा जाता है। दोनों ही हालात में नुकसान उपभोक्ता का ही होता है।

इसके अलावा, रसोई गैस की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है। घरेलू गैस सिलेंडर पहले से महंगा हो चुका है, जबकि होटल और रेस्टोरेंट में इस्तेमाल होने वाली कमर्शियल गैस की कीमत में और ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। इसका मतलब है कि बाहर खाना भी अब महंगा हो गया है।

आगे क्या हो सकता है?

सरकारी आंकड़े भी इस बढ़ती महंगाई की पुष्टि कर रहे हैं। खुदरा महंगाई दर में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि थोक महंगाई भी ऊपर गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में खाद्य पदार्थों की कीमतें और बढ़ सकती हैं।

सरकार के पास आयात शुल्क कम करने जैसे कुछ विकल्प हैं, जिनका पहले भी इस्तेमाल किया जा चुका है। इसके अलावा देश में पाम ऑयल की खेती बढ़ाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं, लेकिन इसका असर लंबे समय बाद ही दिखेगा।

फिलहाल स्थिति यह है कि आम आदमी को अपने खर्चों में संतुलन बनाकर चलना होगा। अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो आने वाले महीनों में रसोई का बजट और ज्यादा प्रभावित हो सकता है।

 

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