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मुंबई POCSO कोर्ट ने 17 वर्षीय छात्र को दी अग्रिम जमानत, पढ़ाई में बाधा का दिया हवाला

मुंबई POCSO कोर्ट ने 17 वर्षीय आरोपी छात्र को दी अग्रिम जमानत, देखिए News Critic पर कानूनी समाचार।

मुंबई की विशेष POCSO अदालत ने 17 वर्षीय छात्र को अग्रिम जमानत दे दी है। छात्र पर अपनी कॉलेज की सहपाठी का पीछा करने, बार-बार संपर्क करने और उसे परेशान करने का आरोप था। अदालत ने माना कि गिरफ्तारी से उसकी 12वीं की बोर्ड परीक्षा की तैयारी प्रभावित हो सकती है और नाबालिग को हिरासत में लेने से अनुपातहीन परेशानी होगी।

17 वर्षीय छात्र को मिली अग्रिम जमानत

मुंबई की विशेष POCSO अदालत ने 17 साल के एक छात्र को बड़ी राहत देते हुए अग्रिम जमानत मंजूर की है। छात्र पर एक सहपाठी का कथित रूप से पीछा करने और उसे परेशान करने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था।

स्पेशल जज आर.जे. पवार ने 17 अगस्त 2026 को इस मामले में आदेश पारित किया। अदालत ने छात्र की उम्र, उसके छात्र होने और 12वीं की बोर्ड परीक्षा की तैयारी को ध्यान में रखते हुए गिरफ्तारी से पहले जमानत का लाभ दिया।

अदालत ने यह भी माना कि मामले में आरोपी की हिरासत में पूछताछ की तत्काल आवश्यकता नहीं है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक जांच मुख्य रूप से दस्तावेजी और गवाही से जुड़े साक्ष्यों पर आधारित है।

क्या है पूरा मामला?

मामला मुंबई के खार इलाके से जुड़ा है। पुलिस के मुताबिक आरोपी छात्र और शिकायतकर्ता लड़की एक ही कॉलेज में पढ़ते हैं और दोनों के बीच पहले बातचीत होती थी।

पुलिस का आरोप है कि बाद में लड़की के पिता ने उसे आरोपी से दूरी बनाने के लिए कहा। इसके बाद लड़की ने कथित तौर पर छात्र से बातचीत बंद कर दी।

पुलिस के अनुसार, इसके बावजूद आरोपी ने लड़की से संपर्क करने की कोशिश जारी रखी और उसका पीछा करने का आरोप सामने आया। इसी आधार पर खार पुलिस ने मामला दर्ज किया।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आरोपी खुद भी नाबालिग है और उसके खिलाफ POCSO कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है।

किन धाराओं में दर्ज हुआ केस?

17 वर्षीय छात्र के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 78 और 351(2) के साथ POCSO एक्ट की धारा 12 के तहत मामला दर्ज किया गया था।

धारा 78 पीछा करने यानी स्टॉकिंग से संबंधित है, जबकि धारा 351(2) आपराधिक धमकी से जुड़ी है। वहीं POCSO एक्ट की धारा 12 बच्चे के यौन उत्पीड़न से संबंधित प्रावधानों के तहत आती है।

मामले में आरोप गंभीर होने के बावजूद अदालत ने आरोपी की उम्र और परिस्थितियों को देखते हुए उसे गिरफ्तारी से पहले जमानत देने का फैसला किया।

पुलिस ने छात्र पर क्या आरोप लगाए?

पुलिस के मुताबिक लड़की के परिवार को दोनों के बीच बातचीत के बारे में जानकारी थी। लड़की के पिता ने कथित तौर पर बेटी को आरोपी से संपर्क खत्म करने के लिए कहा।

इसके बाद जब लड़की ने बातचीत बंद कर दी तो आरोपी पर कथित रूप से उसका पीछा करने और बार-बार संपर्क करने की कोशिश करने का आरोप लगा।

पुलिस का यह भी आरोप है कि छात्र लड़की से मिलने की कोशिश कर रहा था। जब लड़की के पिता ने मिलने से इनकार किया, तो आरोपी ने कथित तौर पर उनके साथ गाली-गलौज और धमकी दी।

इन आरोपों के आधार पर पुलिस ने FIR दर्ज की और आरोपी की गिरफ्तारी की आशंका के बीच अग्रिम जमानत का मामला अदालत पहुंचा।

बचाव पक्ष ने आरोपों को बताया गलत

अदालत में आरोपी की ओर से पेश वकील ने पुलिस के आरोपों का विरोध किया। बचाव पक्ष ने दावा किया कि आरोपी और लड़की के बीच सितंबर 2025 से बातचीत आपसी सहमति से होती थी।

वकील के मुताबिक, दोनों के बीच पहले से बातचीत और संपर्क था। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि विवाद तब शुरू हुआ जब छात्र को पता चला कि लड़की किसी अन्य लड़के से भी बात कर रही थी।

इसके बाद छात्र कथित तौर पर लड़की के पिता से इस संबंध में बात करने गया था। बचाव पक्ष ने आरोप लगाया कि उसके बाद विवाद बढ़ा और उसके खिलाफ मामला दर्ज किया गया।

वकील ने FIR को बदले की कार्रवाई बताया और दावा किया कि आरोपी के परिवार को धमकी दिए जाने के बाद शिकायत दर्ज कराई गई थी। हालांकि, ये बचाव पक्ष के दावे हैं और मामले की जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया में इनकी पुष्टि होना बाकी है।

12वीं की बोर्ड परीक्षा बनी अहम वजह

अदालत के फैसले में आरोपी छात्र की पढ़ाई और 12वीं की बोर्ड परीक्षा की तैयारी को विशेष महत्व दिया गया।

कोर्ट ने माना कि इस समय छात्र को गिरफ्तार कर हिरासत में रखने से उसकी शिक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है। अदालत के अनुसार, बोर्ड परीक्षा की तैयारी में बाधा डालना उसके लिए अनुपातहीन परेशानी का कारण बन सकता है।

यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आरोपी की उम्र 17 वर्ष है और वह अभी स्कूल-कॉलेज की शिक्षा के महत्वपूर्ण चरण में है।

अदालत ने उसकी शैक्षणिक स्थिति को मामले की अन्य परिस्थितियों के साथ देखते हुए गिरफ्तारी से पहले जमानत देने का फैसला किया।

Juvenile Justice Act का भी दिया गया हवाला

अदालत ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 12(1) का भी उल्लेख किया। इस प्रावधान के तहत कानून से संघर्ष की स्थिति में आए बच्चे को जमानत देने की मजबूत वैधानिक धारणा मौजूद है, हालांकि इसके कुछ अपवाद भी हैं।

कोर्ट ने पाया कि इस मामले में जमानत रोकने वाले निर्धारित अपवाद लागू नहीं होते।

अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि आरोपी पहली बार किसी आपराधिक मामले में फंसा है और उसके खिलाफ पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।

हिरासत में पूछताछ की जरूरत नहीं

अदालत ने आरोपी को अग्रिम जमानत देने के पीछे एक और महत्वपूर्ण कारण माना कि मामले में हिरासत में लेकर पूछताछ करना जरूरी नहीं है।

अदालत के सामने यह बात रखी गई कि मामले में उपलब्ध साक्ष्य मुख्य रूप से दस्तावेजी और गवाही से जुड़े हैं। इसलिए आरोपी को पुलिस हिरासत में रखकर पूछताछ करने की आवश्यकता नहीं मानी गई।

यह किसी भी जमानत मामले में महत्वपूर्ण पहलू होता है, क्योंकि अदालत यह देखती है कि जांच के लिए आरोपी की तत्काल हिरासत वास्तव में जरूरी है या नहीं।

जमानत के साथ लगाई गई सख्त शर्तें

हालांकि अदालत ने आरोपी को राहत दी, लेकिन उसे बिना शर्त नहीं छोड़ा गया। अदालत ने उसके ऊपर कई प्रतिबंध लगाए हैं।

अदालत के आदेश के अनुसार:

  • आरोपी को 15 हजार रुपये के निजी मुचलके पर जमानत दी गई।
  • एक जमानती देने की शर्त रखी गई।
  • आरोपी लड़की से किसी भी तरह संपर्क नहीं कर सकता।
  • वह लड़की के पास नहीं जा सकता।
  • उसे लड़की का पीछा करने से भी रोक दिया गया है।
  • अदालत की अनुमति के बिना वह मुंबई शहर से बाहर नहीं जा सकता।

इन शर्तों का उद्देश्य शिकायतकर्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ जांच प्रक्रिया को प्रभावित होने से रोकना है।

लड़की से संपर्क पर पूरी तरह रोक

जमानत आदेश में सबसे महत्वपूर्ण शर्त लड़की से दूरी बनाए रखने की है। आरोपी को शिकायतकर्ता से किसी भी माध्यम से संपर्क करने से रोक दिया गया है।

इसमें सीधे मिलने के अलावा फोन, संदेश या अन्य माध्यमों से संपर्क की कोशिश भी शामिल मानी जा सकती है।

अदालत की यह शर्त इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मूल शिकायत ही कथित रूप से पीछा करने और बार-बार संपर्क करने से जुड़ी है।

यदि आरोपी जमानत की शर्तों का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ आगे कानूनी कार्रवाई की स्थिति बन सकती है।

POCSO मामलों में उम्र का पहलू क्यों अहम?

POCSO कानून बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है। ऐसे मामलों में अदालत को शिकायतकर्ता की सुरक्षा और आरोपी बच्चे के अधिकारों, दोनों को कानूनी ढांचे के भीतर देखना होता है।

इस मामले में आरोपी स्वयं 17 वर्ष का है। इसलिए अदालत ने सामान्य आपराधिक प्रक्रिया के साथ-साथ Juvenile Justice Act के प्रावधानों को भी ध्यान में रखा।

अदालत का फैसला यह नहीं कहता कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप सही या गलत साबित हो गए हैं। अग्रिम जमानत का अर्थ केवल यह है कि जांच के दौरान आरोपी को तत्काल गिरफ्तार कर हिरासत में लेने से सुरक्षा दी गई है।

जांच अभी जारी रहेगी

अग्रिम जमानत मिलने के बाद भी पुलिस की जांच समाप्त नहीं होती। पुलिस शिकायत में लगाए गए आरोपों, संबंधित पक्षों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच जारी रख सकती है।

अदालत ने आरोपी को जांच में सहयोग करने और जमानत की शर्तों का पालन करने के लिए बाध्य किया है।

मामले में आगे जांच के आधार पर पुलिस अपनी रिपोर्ट और आवश्यक कानूनी कार्रवाई जारी रखेगी।

अदालत के फैसले का व्यापक संदेश

इस मामले में अदालत ने एक तरफ POCSO मामले की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया, वहीं दूसरी तरफ आरोपी की उम्र और उसकी शिक्षा को भी महत्वपूर्ण माना।

12वीं की बोर्ड परीक्षा की तैयारी के दौरान हिरासत से होने वाले संभावित नुकसान को अदालत ने जमानत पर विचार करते समय अहम परिस्थिति माना। इसके साथ ही आरोपी के खिलाफ पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होने और हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं होने जैसे पहलुओं पर भी ध्यान दिया गया।

इस तरह आदेश में बाल न्याय व्यवस्था के उस सिद्धांत की झलक मिलती है जिसमें बच्चे के पुनर्वास और उसके भविष्य को भी कानूनी प्रक्रिया के दौरान महत्व दिया जाता है।

आरोप साबित होना अभी बाकी

इस मामले में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि छात्र पर लगाए गए आरोप अभी न्यायिक रूप से साबित नहीं हुए हैं। FIR और पुलिस के आरोप जांच का हिस्सा हैं।

बचाव पक्ष ने आरोपों से इनकार किया है और दोनों के बीच पहले से आपसी बातचीत होने का दावा किया है। इसलिए मामले का अंतिम निष्कर्ष जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।

अग्रिम जमानत को दोषमुक्ति नहीं माना जाता। यह केवल गिरफ्तारी से पहले दी गई कानूनी सुरक्षा है।

निष्कर्ष

मुंबई की विशेष POCSO अदालत ने 17 वर्षीय छात्र को अग्रिम जमानत देकर यह स्पष्ट किया कि नाबालिग आरोपी के मामले में उसकी उम्र, शिक्षा, पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड और हिरासत की आवश्यकता जैसे पहलुओं पर भी विचार किया जाना जरूरी है। अदालत ने 12वीं की बोर्ड परीक्षा की तैयारी में बाधा को संभावित गंभीर नुकसान माना।

छात्र पर सहपाठी का पीछा करने, उसे परेशान करने और उसके पिता को कथित रूप से धमकाने के आरोप हैं। बचाव पक्ष ने इन आरोपों से इनकार किया है और FIR को विवाद से जुड़ी कार्रवाई बताया है।

अदालत ने 15 हजार रुपये के मुचलके और एक जमानती के साथ अग्रिम जमानत दी है, लेकिन छात्र को शिकायतकर्ता से संपर्क करने, उसका पीछा करने या उसके पास जाने पर पूरी तरह रोक लगा दी है। साथ ही बिना अदालत की अनुमति मुंबई से बाहर जाने की भी मनाही है।

अब मामले की जांच आगे जारी रहेगी और आरोपों की वास्तविकता का निर्धारण उपलब्ध साक्ष्यों तथा न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगा।

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