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बाजार खुलते ही सेंसेक्स-निफ्टी धड़ाम! सेंसेक्स 503 अंक टूटा, निफ्टी 151 अंक नीचे

शेयर बाजार खुलते ही सेंसेक्स 503 अंक और निफ्टी 151 अंक फिसला - न्यूज़ क्रिटिक

भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को कारोबार की शुरुआत भारी गिरावट के साथ हुई। सेंसेक्स 503 अंक टूटा, जबकि निफ्टी 151 अंक नीचे आ गया। इससे निवेशकों के बीच शुरुआती कारोबार में दबाव बढ़ गया।

बाजार में इस गिरावट के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारण बताए जा रहे हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, पश्चिम एशिया में तनाव, कमजोर वैश्विक संकेत और विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने बाजार की धारणा पर असर डाला।

सेंसेक्स 503 अंक टूटा, निफ्टी भी फिसला

मंगलवार को बाजार खुलते ही प्रमुख सूचकांकों में तेज गिरावट दर्ज की गई। शुरुआती कारोबार में बीएसई सेंसेक्स 503 अंक गिरकर 72,260.09 के स्तर पर पहुंच गया। वहीं, एनएसई निफ्टी 151 अंक फिसलकर 22,626.50 के आसपास आ गया।

गिरावट केवल कुछ चुनिंदा शेयरों तक सीमित नहीं रही। कई प्रमुख सेक्टरों में बिकवाली देखने को मिली। बैंकिंग, वित्तीय और ऑटो शेयरों पर भी दबाव नजर आया।

बाजार में यह कमजोरी सोमवार की तेज गिरावट के बाद आई है। सोमवार को सेंसेक्स 1,124.02 अंक यानी 1.52 प्रतिशत गिरकर 72,771.72 पर बंद हुआ था। वहीं निफ्टी 360.25 अंक यानी 1.56 प्रतिशत की गिरावट के साथ 22,780.25 पर बंद हुआ था।

शेयर बाजार में गिरावट की बड़ी वजह क्या है?

मंगलवार की गिरावट के पीछे सबसे प्रमुख कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी मानी जा रही है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने से आयात बिल, महंगाई और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है।

इसके अलावा पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ाई है। अमेरिका और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों के बीच बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। इसका असर वैश्विक निवेश धारणा पर भी देखने को मिल रहा है।

कच्चे तेल की कीमतों पर नजर

मंगलवार के कारोबार में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 107 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। तेल की कीमतों में इस तेजी ने भारतीय बाजार के लिए चिंता बढ़ाई है।

कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से भारत के आयात खर्च पर असर पड़ सकता है। साथ ही रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है। इसका प्रभाव महंगाई और कंपनियों के मुनाफे पर पड़ने की आशंका रहती है।

विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी बड़ा कारण

भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई की गतिविधियां भी लगातार चर्चा में हैं। 28 सितंबर को विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों में करीब 5,353 करोड़ रुपये की बिकवाली की। इसके मुकाबले घरेलू संस्थागत निवेशकों ने लगभग 5,189 करोड़ रुपये की खरीदारी की।

एफआईआई की लगातार बिकवाली से बाजार पर अतिरिक्त दबाव बनता है। खासकर बड़े और प्रमुख शेयरों में बिकवाली होने पर सेंसेक्स और निफ्टी जैसे प्रमुख सूचकांक तेजी से प्रभावित होते हैं।

वहीं, घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी ने कुछ हद तक बाजार को सहारा देने की कोशिश की। हालांकि, मंगलवार की शुरुआती चाल में यह समर्थन बिकवाली के दबाव को पूरी तरह रोक नहीं पाया।

वैश्विक बाजारों का भी असर

भारतीय शेयर बाजार पर विदेशी बाजारों के संकेतों का भी असर पड़ा। सोमवार को अमेरिकी बाजारों में गिरावट देखने को मिली। इसके बाद मंगलवार को कई एशियाई बाजार भी दबाव में रहे।

अमेरिका में बढ़ती बॉन्ड यील्ड ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ाई। रिपोर्टों के अनुसार अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 5.27 प्रतिशत तक पहुंच गई। ऊंची बॉन्ड यील्ड का असर वैश्विक स्तर पर शेयर बाजारों की धारणा पर पड़ सकता है।

एशियाई बाजारों में भी कमजोरी

मंगलवार को जापान, दक्षिण कोरिया और हांगकांग जैसे प्रमुख एशियाई बाजारों में भी दबाव देखने को मिला। कमजोर वैश्विक संकेतों का असर भारतीय बाजार की शुरुआती चाल पर भी पड़ा।

इस वजह से घरेलू निवेशकों के बीच भी सतर्कता बढ़ी। बाजार में खरीदारी के बजाय कई शेयरों में मुनाफावसूली और बिकवाली का दबाव नजर आया।

बैंकिंग और बड़े शेयरों पर दबाव

शुरुआती कारोबार में बैंकिंग और वित्तीय शेयर भी दबाव में रहे। एचडीएफसी बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक जैसे प्रमुख शेयरों में कमजोरी दर्ज की गई। इसके अलावा ऑटो और अन्य बड़े शेयरों में भी बिकवाली का असर दिखा।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार मंगलवार के शुरुआती कारोबार में 16 प्रमुख सेक्टरों में से 14 में गिरावट दर्ज की गई। इससे बाजार में बिकवाली की व्यापकता का पता चलता है।

हालांकि, हर शेयर में गिरावट नहीं रही। कुछ कंपनियों के शेयरों में कंपनी से जुड़े सकारात्मक अपडेट के कारण खरीदारी भी देखने को मिली। इसलिए बाजार की चाल अलग-अलग कंपनियों के प्रदर्शन के आधार पर भी बदलती रही।

रुपये की कमजोरी ने बढ़ाई चिंता

शेयर बाजार के साथ भारतीय रुपये पर भी दबाव बना हुआ है। मंगलवार के शुरुआती कारोबार में रुपया 16 पैसे कमजोर होकर 96.13 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर पहुंच गया।

कच्चे तेल की ऊंची कीमतें रुपये के लिए भी चुनौती पैदा करती हैं। तेल आयात के लिए अधिक डॉलर की जरूरत पड़ने से विदेशी मुद्रा बाजार पर दबाव बढ़ सकता है।

रुपये की कमजोरी का असर आयात करने वाली कंपनियों की लागत पर पड़ सकता है। वहीं, निर्यात आधारित कुछ कंपनियों को इससे अलग तरह का प्रभाव देखने को मिल सकता है।

निवेशकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह गिरावट?

सेंसेक्स और निफ्टी में लगातार कमजोरी बाजार की धारणा के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। सोमवार की बड़ी गिरावट के बाद मंगलवार को भी शुरुआती कारोबार में दबाव बना रहा।

हालांकि, केवल शुरुआती गिरावट के आधार पर पूरे कारोबारी दिन का रुख तय नहीं किया जा सकता। बाजार में दिन के दौरान वैश्विक संकेत, कच्चे तेल की कीमत, रुपये की चाल और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

निवेशकों के लिए ऐसे समय में कंपनी के मूलभूत प्रदर्शन और बाजार से जुड़े जोखिमों पर ध्यान देना जरूरी है। तेज उतार-चढ़ाव के बीच केवल सूचकांक की एक दिन की चाल को देखकर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

बाजार में आगे किन संकेतों पर रहेगी नजर?

आने वाले कारोबार में निवेशकों की नजर कई महत्वपूर्ण संकेतकों पर रहेगी। इनमें पश्चिम एशिया की स्थिति, कच्चे तेल की कीमत और विदेशी निवेशकों की खरीद-बिक्री प्रमुख हैं।

इसके अलावा अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और वैश्विक शेयर बाजारों की दिशा भी भारतीय बाजार के लिए महत्वपूर्ण रहेगी। रुपये की चाल पर भी बाजार की नजर बनी रहेगी।

बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख संकेत इस प्रकार हैं:

  • कच्चे तेल की कीमतों में आगे की चाल
  • विदेशी संस्थागत निवेशकों की खरीद-बिक्री
  • रुपये और डॉलर की विनिमय दर
  • अमेरिकी बॉन्ड यील्ड
  • पश्चिम एशिया से जुड़े भू-राजनीतिक घटनाक्रम
  • वैश्विक शेयर बाजारों का प्रदर्शन

निष्कर्ष

मंगलवार को सेंसेक्स 503 अंक टूटा और निफ्टी 151 अंक नीचे आया। कच्चे तेल की बढ़ती कीमत, पश्चिम एशिया में तनाव, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और कमजोर वैश्विक संकेतों ने बाजार पर दबाव बनाया।

सोमवार की बड़ी गिरावट के बाद मंगलवार को भी शुरुआती कारोबार कमजोर रहा। अब बाजार की नजर कच्चे तेल, रुपये, विदेशी फंड फ्लो और वैश्विक संकेतों पर रहेगी। ऐसे अस्थिर माहौल में बाजार की हर चाल को व्यापक आर्थिक और वैश्विक परिस्थितियों के संदर्भ में देखना महत्वपूर्ण होगा।

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