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ऑपरेशन सिंदूर के बाद सियासत में उठा भूचाल, विपक्ष की मिली-जुली प्रतिक्रिया

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पाकिस्तान में भारत द्वारा किए गए ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम आतंकी हमले के बाद देश की राजनीति एक अलग ही मोड़ पर आ खड़ी हुई है। जहां एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सेना की कार्रवाई की विपक्षी दलों ने भी सराहना की, वहीं अमेरिका की भूमिका को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में प्रधानमंत्री मोदी हैं, जिनके फैसलों को लेकर विपक्ष की प्रतिक्रिया मिश्रित रही है।

पहलगाम हमले के बाद केंद्र सरकार निशाने पर

22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पर्यटकों पर हुए आतंकवादी हमले के बाद केंद्र सरकार पर विपक्ष ने सीधे हमला बोला। कांग्रेस ने इसे सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी बताते हुए इंटेलिजेंस फेल्योर करार दिया। इस बीच जब सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई तो कांग्रेस और शिवसेना ने प्रधानमंत्री की इस बैठक में अनुपस्थिति को लेकर कड़ी आलोचना की।

कांग्रेस ने तो यहां तक कह दिया कि पीएम मोदी “लापता” हैं और 28 अप्रैल को इसी को लेकर एक पोस्टर भी सोशल मीडिया पर डाला गया, जिसे बाद में भारी आलोचना के चलते हटा लिया गया।

विपक्ष के भीतर भी मतभेद

हालांकि सभी विपक्षी नेता सरकार पर हमलावर नहीं रहे। कांग्रेस नेता शशि थरूर, जो यूपीए सरकार में विदेश राज्य मंत्री रह चुके हैं, ने इंटेलिजेंस फेल्योर पर उठे सवालों का बचाव किया। उन्होंने कहा कि ऐसी चूक किसी भी देश में हो सकती है और उदाहरण के तौर पर इज़रायल का नाम लिया।

इसी तरह नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता फारूक अब्दुल्ला ने पीएम मोदी के समर्थन में बयान देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की गैरमौजूदगी पर सवाल उठाने की जरूरत नहीं है क्योंकि वह दिल्ली में हैं और जरूरी कामों में व्यस्त हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद सियासी समीकरण

7 मई की आधी रात को भारतीय सेना ने पाकिस्तान और पीओके में स्थित आतंकवादी ठिकानों पर हमला कर ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया। इस साहसिक कार्रवाई के बाद जहां पूरे देश में सेना की तारीफ हुई, वहीं विपक्ष ने इसे अंजाम देने के लिए मोदी सरकार को श्रेय देने से कतराया।

कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और शिवसेना ने तो इस ऑपरेशन के बाद सैन्य कार्रवाई रोकने के फैसले पर सवाल खड़े कर दिए और संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग भी रखी।

पवार, ओवैसी और अन्य नेताओं की प्रतिक्रियाएं

इस संवेदनशील मसले पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के प्रमुख शरद पवार ने संयमित रुख अपनाया। उन्होंने संसद सत्र बुलाने की मांग को नकारते हुए कहा कि ऐसे गंभीर मुद्दों पर खुले मंचों पर चर्चा नहीं की जानी चाहिए।

वहीं एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी सैन्य कार्रवाई रोकने पर सवाल उठाए, लेकिन उन्होंने संसद सत्र बुलाने की आवश्यकता नहीं जताई। उन्होंने अमेरिका की भूमिका और डोनाल्ड ट्रंप के ट्वीट पर भी नाराजगी जताई।

शिरोमणि सुखबीर बादल का पीएम मोदी को समर्थन

अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल भी इस मुद्दे पर मोदी सरकार के समर्थन में खड़े नजर आए। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने जिस तरह से स्थिति को कूटनीतिक और सैन्य दोनों स्तरों पर संभाला, वह काबिल-ए-तारीफ है।

बादल ने कहा कि पाकिस्तान को युद्धविराम के लिए अमेरिका के पास जाना पड़ा, यह भारत की निर्णायक कार्रवाई और प्रधानमंत्री के नेतृत्व का परिणाम है।

सियासी बंटवारे के बावजूद दिखा राष्ट्रीय एकजुटता का संकेत

हालांकि राजनीतिक मतभेद स्पष्ट हैं, फिर भी कई विपक्षी नेताओं ने देशहित को प्राथमिकता देते हुए प्रधानमंत्री और सेना के फैसलों का समर्थन किया। उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे नेता भी भारत सरकार के रुख के साथ नजर आए।

साथ ही, अमेरिका की मध्यस्थता को लेकर विपक्ष में सवालों का स्वर जरूर था, मगर बड़े स्तर पर राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर अधिकतर दलों ने भारत की कार्रवाई को सही ठहराया।

ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम हमला केवल सैन्य या रणनीतिक घटनाएं नहीं रहे, बल्कि इसने देश की सियासी सोच और विपक्ष के रवैये को भी उजागर किया है। जहां कुछ नेताओं ने सस्ती राजनीति करने की कोशिश की, वहीं कुछ ने परिस्थिति की गंभीरता को समझते हुए संयम और समर्थन का परिचय दिया। इस पूरे घटनाक्रम में यह स्पष्ट हुआ कि जब देश की सुरक्षा की बात होती है, तब राजनीतिक दलों के बीच मतभेद के बावजूद भी राष्ट्रहित सर्वोपरि रहता है।

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