अपने बच्चों को मोबाइल की लत न लगाएं, मोबाइल की लत बच्चों में वैसी ही है जैसे किसी नशा करने वाले को नशे की
अभी कुछ समय पहले एप्पल कंपनी के सीईओ टिम कुक भारत आये थे। तब उन्होंने माता पिता से कहा था कि वे अपने बच्चों को मोबाइल की लत न लगने दें। उन्होंने कहा कि आजकल के बच्चे तो वैसे ही पैदाइशी डिजिटल हो गए हैं। भारत के बच्चों पर कुछ सर्वेक्षण हुए जिनके नतीजे चौकाने वाले हैं। भारत में करीब 1000 बच्चों और उनके माता पिता पर सर्वे किया गया। जिसमे पाया गया कि 92 प्रतिशत बच्चे बाहर खेलने के बजाय मोबाइल पर गेम खेलना पसंद करते हैं। करीब 82 प्रतिशत बच्चे स्कूल से वापिस आने पर मोबाइल मांगते हैं। करीब 78 प्रतिशत बच्चों को खाना खाते हुए मोबाइल चाहिए। एक अन्य सर्वे में यह पाया गया कि लगभग 9 से 13 साल तक के बच्चों पर हमेशा स्मार्टफोन रहता है। एक और अन्य रिपोर्ट में एक चौकाने वाला सर्वे सामने आया है कि भारतीय बच्चे सबसे काम उम्र में मोबाइल उपयोग करने वाले बच्चे हैं। अक्सर देखा जाता है कि कुछ बच्चे मोबाइल देखते हुए खाना खाते हैं। बच्चों को मोबाइल दिया भी जाता है जिससे बच्चे मोबाइल में लगे रहें और माता पिता आपस में बातचीत या आराम कर सकें।
बच्चों को मोबाइल देखने से रोकना चाहिए। मोबाइल का असर बच्चों पर वैसा ही होता है जैसा कि एक नशा करने वाले पर नशे का होता है। स्मार्टफोन को ज्यादा उपयोग करने की न्यूरोकेमिस्ट्री वही है जो कि नारकोटिस्ट ड्रग की होती है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रो. ऐना लेब्के के मुताबिक हम अपनी पसंद की डिजिटल ड्रग ले रहे हैं और इसमें मोबाइल शामिल है। यह डिजिटल वायरों में उलझी पीढ़ी के लिए नशे की सुई जैसा काम करती है।
हम सभी जानते है कि हम सभी को मोबाइल की लत लग चुकी है। हम लोग भी कुछ समय बिना मोबाइल के नहीं बिता सकते है। यदि एक दिन हम मोबाइल न देखें तो ऐसा लगता है कि उस दिन किसी चीज की कमी रही है और उस दिन हम सभी बैचेन से रहते हैं। जब बड़ों में यह लत ऐसी है तो बच्चों में तो यह लत और भी भयानक हो सकती है।
जब भी हमें आनंद की अनुभूति होती है उस समय हमारे दिमाग में डोपामाइन नाम का एक न्यूरोकेमिकल रिलीज़ होता है। डोपामाइन की वजह से ही हम आंनद देने वाले उस अनुभव या पदार्थ को और चाहते हैं। यह खाना, शराब, धूम्रपान, ड्रग्स, वीडियो गेम, पोर्नोग्राफी या फ़ोन देखते रहना भी हो सकता है। जब हमसे यह अनुभव छिना जाता है तो उसे पाने की और इच्छा होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योकि हमारे दिमाग में आनंद और दर्द का प्रोसेस एक ही जगह से होता है। हमारा दिमाग आनंद और दर्द को एक दूसरे से संतुलित करने की कोशिश करता रहता है। इसे हम इस तरह समझ सकते हैं कि किसी नशा करने वाले व्यक्ति को एक दिन नशा न करने दिया जाये तो वह असहज महसूस करता है और उसे पाने की कोशिश करता है। ऐसा ही मोबाइल फ़ोन के साथ भी होता है यदि हमें कुछ घंटे फ़ोन चलाने को न मिले तो हम असहज महसूस करते हैं। और हम अपने फ़ोन को ढूढ़ने लगते हैं।
किसी व्यक्ति या बच्चे को जब मोबाइल फ़ोन की लत लग जाती है और जब उससे उसे छीन लिया जाये तो ऐसे व्यक्ति या बच्चे में अलग ही प्रकार के लक्षण देखने को मिलते हैं। उस व्यक्ति या बच्चे के सिर में दर्द, एंग्जायटी, निरुत्साह, अवसाद और चिढ़चिढ़ापन देखने को मिलता है। फिर उस व्यक्ति या बच्चे का मन किसी और काम में नहीं लगता। क्या आपको आपके बच्चे में यह लक्षण दिखाई देते हैं ?
हम सभी को चाहिए कि हम बच्चों को मोबाइल की ज्यादा लत न लगने दें। माता पिता को चाहिए कि वह भी बच्चों के सामने जयादा मोबाइल का उपयोग न करें। जितना हो सके अपने बच्चों के साथ समय व्यतीत करें। अपने बच्चों में अलग अलग प्रकार की किताबें पढ़ने का शौक पैदा करें। जिससे उन का ज्ञान बढ़े।

