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बिहार में बढ़ती हत्याएं: क्या नीतीश सरकार में अपराधी हो गए हैं बेखौफ?

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बिहार में अपराध का ग्राफ एक बार फिर चर्चा में है। खासकर जुलाई 2025 के शुरुआती दो हफ्तों में जिस तरह से हत्या की घटनाएं सामने आई हैं, उसने राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आंकड़े बताते हैं कि महज दस दिनों में राज्य में 22 से अधिक लोगों की हत्या की जा चुकी है। राजधानी पटना से लेकर दूरदराज के जिलों तक, अपराधियों ने जिस तरह से बेखौफ होकर वारदातों को अंजाम दिया है, वह साफ इशारा करता है कि अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और शासन-प्रशासन इन पर लगाम लगाने में नाकाम नजर आ रहा है।

पटना और आसपास के इलाकों में मर्डर की बाढ़

राजधानी पटना, जो आमतौर पर सुरक्षा के लिहाज से अधिक चौकस मानी जाती है, वहां भी हत्याओं की झड़ी लग गई है।

  • 13 जुलाई को पटना सिटी में वकील जितेंद्र महतो को गोली मार दी गई। उन्हें पीएमसीएच ले जाया गया जहां उन्होंने दम तोड़ दिया।
  • 12 जुलाई को पिपरा थाना क्षेत्र के शेखपुरा गांव में एक व्यक्ति को गोली मारकर हत्या कर दी गई।
  • 11 जुलाई को पटना के एक व्यवसायी विक्रम झा की हत्या कर दी गई।
  • 10 जुलाई को बालू कारोबार से जुड़े रमाकांत यादव को भी गोली मार दी गई थी।
  • 6 जुलाई को निजी स्कूल चलाने वाले अजीत कुमार को भी गोलियों से भून दिया गया।

इन वारदातों ने यह दिखा दिया कि अपराधी पटना में भी खुलेआम कत्ल कर रहे हैं और पुलिस कार्रवाई का कोई डर नहीं है।

नालंदा, सारण और अन्य जिलों में भी खूनखराबा

राज्य के अन्य जिलों की भी स्थिति कुछ बेहतर नहीं है।

  • 13 जुलाई को सारण जिले के दरियापुर थाना क्षेत्र में शिक्षक संतोष राय की हत्या कर दी गई।
  • 12 जुलाई को नालंदा में ज़मीन विवाद के चलते एक महिला को गोली मार दी गई।
  • 6 जुलाई को नालंदा में ही दो गुटों की हिंसक झड़प में दो लोगों की जान चली गई, जिनमें एक नाबालिग भी शामिल था।

पूर्णिया में डायन के शक में परिवार की सामूहिक हत्या

बिहार के पूर्णिया जिले में 6 जुलाई को मानवता को शर्मसार कर देने वाली घटना सामने आई। डायन के शक में एक ही परिवार के पांच सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया गया। इसमें पुरुष, महिला और बच्चे सभी शामिल थे। इस घटना ने पूरे राज्य को हिला कर रख दिया।

मुजफ्फरपुर, सीवान, भागलपुर और मोतिहारी भी नहीं बचे

  • 6 जुलाई को ही मुजफ्फरपुर में एक इंजीनियर की चाकू से हत्या कर दी गई।
  • 4 जुलाई को पटना के बड़े कारोबारी गोपाल खेमका की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस वारदात ने सरकार की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया और विपक्ष को हमला बोलने का मौका मिल गया।
  • सीवान में भी 4 जुलाई को तीन लोगों की तलवार से काटकर हत्या कर दी गई, वो भी बीच सड़क पर।
  • 8 जुलाई को भागलपुर में सद्दाम नामक व्यक्ति की हत्या हुई।
  • 7 जुलाई को मोतिहारी में अजय यादव को आपसी रंजिश के चलते मार दिया गया।
  • 10 जुलाई को जहानाबाद में एक बुजुर्ग की खेत में हत्या कर दी गई।

क्या कानूनव्यवस्था हो गई है फेल?

इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखें तो सवाल उठना लाज़मी है कि क्या नीतीश कुमार की सरकार में अपराधी पूरी तरह बेखौफ हो गए हैं? जब महज 10 दिनों में हत्या का आंकड़ा 22 को पार कर जाए, और कई मामलों में अपराधी खुलेआम वारदात करके फरार हो जाएं, तो यह केवल आंकड़ा नहीं बल्कि एक सिस्टम की विफलता का संकेत होता है।

प्रशासनिक ढांचे में सुधार की जरूरत है, साथ ही हर जिले में पुलिस की सतर्कता और जवाबदेही बढ़ाने की आवश्यकता है।

बिहार में जुलाई 2025 की शुरुआत हत्याओं के लिहाज से बेहद डरावनी साबित हो रही है। लगातार हो रही हत्या की घटनाएं कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। अगर सरकार और प्रशासन समय रहते इस पर कठोर कदम नहीं उठाता, तो यह हालात और अधिक बिगड़ सकते हैं। जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही भविष्य में और भी भयावह नतीजे दे सकती है।

 

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