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क्या 1977 की कहानी फिर से 2024  के चुनाव में दोहराएगा विपक्ष, वन इज टू वन का फार्मूला अपना कर

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1977 में इंदिरा गाँधी को हराने के लिए विपक्ष ने वन इज टू वन का फार्मूला अपनाया था। उस समय सारा विपक्ष एक साथ हो गया था। आज भी वही कहानी फिर से दोहराई जा रही है। उस समय इंदिरा गाँधी के खिलाप सारा विपक्ष एक साथ खड़ा हो गया था और आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाप।

2024 में लोकसभा के चुनाव होने हैं, विपक्ष उसकी तैयारी में जुट गया है। 2019 के चुनाव में बीजेपी को 45 प्रतिशत वोट मिले थे और बाकी के 55 प्रतिशत वोट और सभी दलों को मिले थे। अब 2024 में इसी 55 प्रतिशत वोट को एकजुट करने की कोशिश की जा रही है। इस मिशन को पूरा करने के लिए पूर्व राज्यपाल सतपाल मालिक ने वन इज टू वन का फार्मूला अपनाने की बात कही है। नितीश कुमार और ममता बैनर्जी ने भी विपक्षी दलों से एकजुट होने की बात कही है।

 क्या है वन इज टू वन फार्मूला

जब किसी मजबूत दल के उम्मीदवार के खिलाप सभी दल एकजुट हो कर अपना एक उम्मीदवार मैदान में उतारते हैं। तो इसे वन इज टू वन का फार्मूला कहते हैं। पूर्व राज्यपाल सतपाल मालिक ने एक इंटरव्यू में कहा कि सभी दल एकजुट हो कर अपना एक उम्मीदवार 2024 के चुनाव में बीजेपी के खिलाप उतारते हैं तो बीजेपी की हार निश्चित है। 1989 में वी पी सिंह के समर्थन में और 1977 में इंदिरा गाँधी के विरोध में यह हो चूका है। और उस समय यह फार्मूला कामयाब भी हुआ था। इससे 2024 में बीजेपी  सत्ता में आने से रोका जा सकता है।

इसे ऐसे समझा जा सकता है कि किसी राज्य में बीजेपी के खिलाप सभी दलों ने अपने अलग अलग उम्मीदवार को उतारा तो बीजेपी के खिलाप पड़ने वाले वोट बट जायेंगे। और यदि उस राज्य में बीजेपी के खिलाप पूरे विपक्ष का एक ही उम्मीदवार मैदान में उतरा तो बीजेपी हो हराना आसान हो सकता है क्योंकि बीजेपी के विपक्ष में पड़ने वाले वोट बटेंगे नहीं।

लेकिन क्या लगता है कि जिस फॉर्मूले को विपक्ष अपनाने की बात कह रहा है क्या यह इतना आसान है। वन इज टू वन फॉर्मूले को अपनाने में कई बड़ी चुनौतियाँ सामने खड़ी हैं

* सबसे बड़ी चुनौती तो विपक्ष के सामने यह है कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन होगा। कई बड़ी बड़ी पार्टियों के नेता खुद को प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार की उम्मीद लगाए बैठे है। तो ऐसे में बहुत मुश्किल होगा कि चुनाव के बाद प्रधानमंत्री कौन होगा।

* दूसरी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सभी पार्टियां यह चाहेंगी कि उसे ज्यादा से ज्यादा सीटें मिलें। जैसे कि बिहार में राजद और जदयू दोनों ही पार्टियां चाहेंगी कि उसे ज्यादा सीटें मिले। उसी तरह यूपी में सपा, बसपा और रालोद तीनों पार्टियों में सीटों को लेकर मतभेद रहेगा क्योंकि तीनों ही पार्टियां सीटों के बटवारे में चाहेंगी कि उसे ज्यादा सीटें मिलें।

*तीसरी बड़ी चुनौती यह आएगी विपक्ष के एकजुट होने में कि मान लीजिये अगर सीटों और प्रधानमंत्री पद को लेकर तालमेल बैठ भी गया तो सरकार में अपनी पार्टी की ज्यादा हिस्सेदारी के लिए पार्टियों में हंगामा होगा। हर पार्टी यह चाहेगी कि उसकी पार्टी से ज्यादा उम्मीदवार सरकार के मत्रिमंडल में शामिल हो। ऐसे में किसी भी दल की हिस्सेदारी उस पार्टी की उम्मीद के मुताबिक नहीं हुयी तो वह गठबंधन से अलग होने की धमकी दे सकता है।

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