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शिवसेना (UBT) में बड़ा राजनीतिक भूचाल: 9 में से 6 सांसद बागी, संजय राउत ने लगाया ₹50 करोड़ की खरीद-फरोख्त का आरोप

शिवसेना नेता संजय राउत का न्यूज़ ग्राफ़िक, जिसमें उद्धव गुट के 6 सांसदों के बागी होने और 50 करोड़ रुपये के ऑफर का दावा किया गया है।
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मुंबई/नई दिल्ली। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा होता दिखाई दे रहा है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसदों के बागी होने की खबरों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि ये सांसद एकनाथ शिंदे गुट के संपर्क में हैं और लोकसभा में अलग गुट बनाने की तैयारी कर रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक, बागी बताए जा रहे सांसद दिल्ली पहुंच चुके हैं और आगामी रणनीति पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। इस घटनाक्रम के बाद उद्धव ठाकरे गुट ने दिल्ली में संसदीय दल की अहम बैठक बुलाई है तथा सभी सांसदों को उपस्थित रहने के निर्देश जारी किए हैं।

किन सांसदों के बागी होने की चर्चा?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार परभणी से संजय जाधव, शिरडी से भाऊसाहेब वाकचौरे, यवतमाल से संजय देशमुख, हिंगोली से नागेश पाटिल अष्टीकर, धाराशिव से ओमराजे निंबालकर और मुंबई नॉर्थ ईस्ट से संजय पाटिल के नाम चर्चा में हैं।

बताया जा रहा है कि ये सांसद लोकसभा में अलग समूह के गठन को लेकर विचार कर रहे हैं। यदि दो-तिहाई सांसद उनके साथ आते हैं तो संसदीय नियमों के तहत उन्हें अलग गुट के रूप में मान्यता मिलने की संभावना बन सकती है।

मातोश्री की बैठक में कम उपस्थिति से बढ़े संकेत

हाल ही में उद्धव ठाकरे द्वारा मुंबई स्थित मातोश्री में बुलाई गई आपात बैठक में अपेक्षित संख्या में सांसदों की अनुपस्थिति ने राजनीतिक अटकलों को और तेज कर दिया। पार्टी नेतृत्व इसे गंभीरता से लेते हुए सांसदों से लगातार संपर्क साध रहा है।

उधर, पार्टी के वरिष्ठ नेता अरविंद सावंत और अनिल देसाई ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र भेजकर पार्टी की आधिकारिक स्थिति से अवगत कराने की कोशिश की है।

संजय राउत का बड़ा आरोप

राज्यसभा सांसद और शिवसेना (UBT) के प्रमुख नेता संजय राउत ने पूरे घटनाक्रम को “ऑपरेशन वुल्फ” बताते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। राउत का दावा है कि कुछ सांसदों को पार्टी छोड़ने के लिए भारी रकम की पेशकश की गई है।

उन्होंने आरोप लगाया कि प्रत्येक सांसद के लिए कथित तौर पर ₹50 करोड़ तक का ऑफर दिया गया, जिसमें एक हिस्सा अग्रिम भुगतान के रूप में दिया गया। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और विपक्षी पक्ष ने ऐसे दावों को खारिज किया है।

राउत ने कहा कि यदि कोई जनप्रतिनिधि पार्टी छोड़ना चाहता है तो उसे पहले सांसद पद से इस्तीफा देकर जनता के बीच जाना चाहिए।

2022 के विद्रोह जैसी स्थिति?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा घटनाक्रम 2022 में हुए उस बड़े राजनीतिक संकट की याद दिलाता है, जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुए विद्रोह के कारण उद्धव ठाकरे सरकार गिर गई थी।

इस बार मामला विधानसभा नहीं बल्कि लोकसभा सांसदों से जुड़ा है। यदि बड़ी संख्या में सांसद शिंदे गुट के साथ जाते हैं तो संसद में उद्धव ठाकरे गुट की ताकत काफी कमजोर हो सकती है।

NDA को मिल सकता है फायदा

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बागी सांसद शिंदे गुट के साथ खुलकर आते हैं तो इसका सीधा राजनीतिक लाभ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को मिल सकता है। इससे महाराष्ट्र में शिंदे-फडणवीस खेमे की स्थिति और मजबूत होगी।

वहीं दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे के लिए यह संगठनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बड़ी चुनौती बन सकती है।

आगे क्या होगा?

अब सबकी नजर दिल्ली में होने वाली बैठकों और लोकसभा अध्यक्ष को सौंपे जाने वाले संभावित पत्र पर टिकी है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह असंतोष केवल दबाव की राजनीति है या फिर शिवसेना (UBT) में वास्तव में एक और बड़ी टूट होने जा रही है।

1. शिवसेना (UBT) में कितने सांसदों के बागी होने की चर्चा है?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पार्टी के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसदों के बागी होने की चर्चा चल रही है।

2. संजय राउत ने क्या आरोप लगाए हैं?

संजय राउत ने दावा किया है कि कुछ सांसदों को पार्टी छोड़ने के लिए ₹50 करोड़ तक के ऑफर दिए गए हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

3. क्या बागी सांसद शिंदे गुट में शामिल हो सकते हैं?

राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक बागी सांसद एकनाथ शिंदे गुट के संपर्क में हैं, लेकिन अंतिम निर्णय अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है।

4. इस घटनाक्रम का उद्धव ठाकरे पर क्या असर पड़ेगा?

यदि बड़ी संख्या में सांसद पार्टी छोड़ते हैं तो संसद में शिवसेना (UBT) की ताकत घट सकती है और उद्धव ठाकरे की राजनीतिक स्थिति कमजोर हो सकती है।

5. क्या यह 2022 के शिवसेना विद्रोह जैसा मामला है?

कई राजनीतिक विश्लेषक मौजूदा संकट की तुलना 2022 के शिंदे विद्रोह से कर रहे हैं, हालांकि इस बार मामला लोकसभा सांसदों से जुड़ा हुआ है।

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